बर्बरीक शीश दान कथा
बर्बरीक शीश दान कथा वह कथा है, जिसमें भीम के पौत्र व घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने भगवान शिव से तीन अमोघ बाणों का वरदान पाकर तथा माता को हारने वाले पक्ष का साथ देने का वचन देकर महाभारत के युद्धक्षेत्र की ओर प्रस्थान किया, तथा मार्ग में ब्राह्मण-वेशधारी भगवान श्रीकृष्ण की परीक्षा में उन्हें पहचानकर बिना संकोच अपना शीश दान कर दिया।

अध्याय १ · जन्म, वरदान, और माता को दिया वचन
बर्बरीक भीमसेन के पुत्र घटोत्कच तथा नागकन्या अहिलवती के पुत्र थे। बाल्यावस्था से ही वे असाधारण पराक्रमी व शूरवीर थे, तथा उन्होंने अल्पायु में ही भगवान शिव की घोर तपस्या कर उनसे तीन अमोघ बाणों का वरदान प्राप्त किया, साथ ही अग्निदेव ने उन्हें एक दिव्य धनुष प्रदान किया। ये तीनों बाण ऐसे थे कि एक ही बाण संपूर्ण शत्रु-सेना का नाश कर पुनः तरकश में लौट आता था, इसी कारण बर्बरीक को तीनों लोकों में विजय पाने में सक्षम माना जाता था।
खाटू श्याम चालीसा पढ़ें →जब महाभारत के युद्ध की घोषणा हुई, तो बर्बरीक भी युद्ध देखने व उसमें भाग लेने हेतु उत्सुक हो उठे। जाने से पूर्व उन्होंने अपनी माता अहिलवती से आज्ञा मांगी। माता ने उन्हें एक ही वचन देने को कहा: कि युद्धक्षेत्र में वे सदैव उसी पक्ष की ओर से लड़ेंगे, जो पक्ष निर्बल व हारता हुआ दिखाई दे। बर्बरीक ने माता के चरणों की धूल मस्तक पर लगाकर यह वचन सहर्ष स्वीकार कर लिया, तथा अपने नीले घोड़े पर सवार होकर तीन बाण व धनुष लेकर कुरुक्षेत्र की ओर चल पड़े।
अध्याय २ · श्रीकृष्ण की परीक्षा, और शीश का दान
मार्ग में सर्वज्ञ भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण का वेश धारण कर बर्बरीक से मिले तथा उनसे पूछा कि वे मात्र तीन बाण लेकर इतने विशाल युद्ध में क्या करेंगे। बर्बरीक ने उत्तर दिया कि ये तीन बाण संपूर्ण सेनाओं का नाश करने में सक्षम हैं। यह सुनकर ब्राह्मण-रूपी श्रीकृष्ण ने उनकी परीक्षा लेने की ठानी तथा समीप खड़े एक पीपल वृक्ष की ओर संकेत कर कहा कि यदि उनके बाण में इतनी शक्ति है, तो वे एक ही बाण से इस वृक्ष के समस्त पत्तों को बींध कर दिखाएं।
बर्बरीक ने भगवान का स्मरण कर एक ही बाण छोड़ दिया, जिसने पीपल वृक्ष के समस्त पत्तों को बींध डाला। किंतु ब्राह्मण-रूपी श्रीकृष्ण ने चुपके से एक पत्ता तोड़कर अपने ही पैर के नीचे दबा लिया था। बाण समस्त पत्तों को बींधता हुआ अंततः ब्राह्मण के पैर के चारों ओर घूमने लगा। बर्बरीक तुरंत समझ गए कि इस ब्राह्मण के वेश में कोई साधारण पुरुष नहीं, अपितु स्वयं भगवान विराजमान हैं, तथा उन्होंने अत्यंत विनम्रता से ब्राह्मण से अपना पैर हटाने का निवेदन किया, क्योंकि उनके बाण को केवल पत्तों को बींधने की आज्ञा दी गई थी।
अपनी असली पहचान प्रकट कर भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से कहा कि उनकी शक्ति ऐसी है कि यदि वे युद्ध में उतरे, तो अकेले ही अपनी माता को दिए वचन के अनुसार बारी-बारी दोनों पक्षों की ओर से लड़ते हुए संपूर्ण महाभारत युद्ध को क्षण भर में समाप्त कर देंगे, जिससे धर्म-युद्ध का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। यह कहकर श्रीकृष्ण ने उनसे दान में उनका शीश मांग लिया। बर्बरीक ने बिना किसी संकोच व विलंब के तुरंत अपना शीश काटकर भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया, जिस कारण वे आगे चलकर 'शीश के दानी' कहलाए। भगवान श्रीकृष्ण ने उनके इस महादान से प्रसन्न होकर उन्हें युद्ध के अंत तक जीवित व सजीव रहने का आशीर्वाद दिया, इस आशीर्वाद व इसके पश्चात मिले वरदान की विस्तृत कथा इसी साइट के एक पृथक पृष्ठ पर दी गई है।
श्याम बाबा वरदान कथा पढ़ें →बर्बरीक शीश दान कथा पाठ विधि
एकादशी अथवा मंगलवार को प्रातः स्नान कर श्याम बाबा का ध्यान करें, दीप जलाकर खाटू श्याम चालीसा व आरती का पाठ करें। इस कथा का श्रवण विशेष रूप से फाल्गुन मेले के अवसर पर शुभ माना जाता है।
बर्बरीक शीश दान कथा के बारे में
यह कथा दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में बर्बरीक के जन्म, शिव से प्राप्त तीन बाणों के वरदान तथा माता को दिए वचन की कथा है। दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण की पीपल-पत्ता परीक्षा तथा शीश दान की कथा दी गई है।
यह कथा खाटू श्याम जी अर्थात बर्बरीक से जुड़ी है। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
महाभारत से जुड़ी लोक-परंपरा के बारे में
बर्बरीक शीश दान कथा का कोई एक प्रामाणिक मुद्रित 'कथा-पाठ' नहीं है, यह महाभारत से जुड़ी मध्यकालीन लोक-परंपरा है, जिसका शब्दांकन यहां मौलिक रूप से किया गया है। ध्यान दें: शीश दान के पश्चात श्रीकृष्ण से प्राप्त 'श्याम' नाम के वरदान तथा पहाड़ी से युद्ध देखने की कथा, तथा शताब्दियों पश्चात खाटू ग्राम में इसी शीश के प्रकट होने की कथा, दोनों इसी साइट पर पृथक पृष्ठों पर दी गई हैं, अतः यहां केवल शीश दान तक की कथा दी गई है, आगे की घटनाएं नहीं दोहराई गई हैं।
सामान्य प्रश्न
बर्बरीक के माता-पिता कौन थे?
बर्बरीक भीमसेन के पुत्र घटोत्कच तथा नागकन्या अहिलवती के पुत्र थे, इसी कारण उन्हें भीम का पौत्र कहा जाता है।
बर्बरीक को तीन बाणों का वरदान किसने दिया?
घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें तीन अमोघ बाणों का वरदान दिया, तथा अग्निदेव ने उन्हें एक दिव्य धनुष प्रदान किया।
बर्बरीक ने अपनी माता को क्या वचन दिया था?
उन्होंने वचन दिया था कि युद्धक्षेत्र में वे सदैव उसी पक्ष की ओर से लड़ेंगे, जो पक्ष निर्बल व हारता हुआ दिखाई दे।
श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से शीश दान में क्यों मांगा?
श्रीकृष्ण जानते थे कि बर्बरीक अपने वचन के अनुसार बारी-बारी दोनों पक्षों की ओर से लड़ते हुए अकेले ही युद्ध को क्षण भर में समाप्त कर देंगे, जिससे धर्म-युद्ध का उद्देश्य विफल हो जाता, अतः उन्होंने उनसे शीश दान में मांग लिया।