शुम्भ-निशुम्भ वध कथा
शुम्भ-निशुम्भ वध कथा वह कथा है, जिसमें माता पार्वती के शरीर से देवी कौशिकी प्रकट हुईं, तथा उनके क्रोध से उत्पन्न माँ काली ने रक्तबीज जैसे दुर्धर्ष असुर का वध कर अंततः शुम्भ व निशुम्भ का भी अंत कर तीनों लोकों को उनके अत्याचार से मुक्त कराया।
अध्याय १ · देवी कौशिकी का प्राकट्य व चंड-मुंड वध
शुम्भ व निशुम्भ नामक दो असुर भाइयों ने कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर यह वरदान प्राप्त किया कि उन्हें कोई भी पुरुष कभी पराजित न कर सके। इस वरदान के बल पर उन्होंने तीनों लोकों पर आक्रमण कर दिया, इंद्रादि समस्त देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया, तथा स्वयं सूर्य, चंद्र, अग्नि व वायु के अधिकारों पर भी अधिकार जमा लिया।
स्वर्ग से निष्कासित देवता हिमालय पर्वत पर जाकर देवी की स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति सुनकर स्नान करने आईं माता पार्वती के शरीर के कोश (आवरण) से एक अत्यंत तेजस्विनी व सुंदर देवी प्रकट हुईं, जो 'कौशिकी' कहलाईं। कोश के पृथक होने पर माता पार्वती स्वयं श्याम वर्ण की हो गईं, तथा तभी से 'कालिका' भी कहलाने लगीं। देवी कौशिकी हिमालय पर निवास करने लगीं।
शुम्भ के सेवक चंड व मुंड ने देवी कौशिकी के अनुपम सौंदर्य को देखकर शुम्भ को उनके विषय में बताया। मोहित शुम्भ ने अपने दूत सुग्रीव को देवी के पास विवाह-प्रस्ताव लेकर भेजा, किंतु देवी ने उत्तर दिया कि उन्होंने प्रण लिया है कि जो भी उन्हें युद्ध में पराजित करेगा, वे केवल उसी से विवाह करेंगी। क्रुद्ध शुम्भ ने पहले सेनापति धूम्रलोचन को सेना सहित भेजा, जिसे देवी ने मात्र 'हुंकार' से भस्म कर दिया।
दुर्गा चालीसा पढ़ें →अपने सेनापति की मृत्यु से क्रुद्ध होकर शुम्भ ने चंड व मुंड को विशाल सेना सहित देवी पर आक्रमण हेतु भेजा। इतनी बड़ी असुर-सेना को देखकर देवी कौशिकी का मुख क्रोध से काला पड़ गया, तथा उनके ललाट से अत्यंत भयंकर व काले रंग की देवी काली प्रकट हुईं। माँ काली ने चंड व मुंड दोनों का वध कर उनके सिर देवी कौशिकी के समक्ष प्रस्तुत किए, जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें 'चामुंडा' नाम प्रदान किया।
अध्याय २ · रक्तबीज वध व शुम्भ-निशुम्भ का अंत
चंड-मुंड की मृत्यु से क्षुब्ध होकर शुम्भ ने अपनी संपूर्ण सेना रक्तबीज नामक असुर के नेतृत्व में युद्ध हेतु भेजी। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की जो भी बूंद भूमि पर गिरेगी, उससे उसके समान बलशाली एक नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाएगा। जब देवी व अन्य देवताओं की शक्तियों से उत्पन्न मातृकाओं (ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी आदि) ने उसे घायल करना आरंभ किया, तो उसके रक्त की प्रत्येक बूंद से सैकड़ों नए रक्तबीज उत्पन्न होने लगे, जिससे युद्धभूमि असंख्य रक्तबीजों से भर गई।
इस विकट समस्या को देखकर देवी कौशिकी ने माँ काली को आदेश दिया कि वे अपनी विशाल जिह्वा फैलाकर रक्तबीज के रक्त की एक भी बूंद भूमि पर गिरने से पहले ही पी जाएं। इसके पश्चात मातृकाओं ने रक्तबीज पर वार करना जारी रखा, तथा माँ काली उसका समस्त रक्त पीती गईं, जिससे कोई नया रक्तबीज उत्पन्न नहीं हो सका। अंततः रक्तहीन हुआ रक्तबीज भूमि पर गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुआ।
अम्बे तू है जगदम्बे काली आरती पढ़ें →रक्तबीज की मृत्यु से क्रुद्ध निशुम्भ स्वयं युद्ध में उतरा, किंतु देवी कौशिकी ने उसका भी वध कर दिया। अपने भाई की मृत्यु देखकर शुम्भ ने देवी पर आरोप लगाया कि वे अन्य देवियों (मातृकाओं) के बल पर युद्ध जीत रही हैं, अकेले नहीं। इस पर देवी ने कहा, 'एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा', अर्थात यह समस्त मातृकाएं मेरी ही शक्तियां हैं, संसार में मेरे अतिरिक्त अन्य कोई नहीं। ऐसा कहकर उन्होंने समस्त मातृकाओं को अपने में समाहित कर लिया, तथा अकेले ही शुम्भ से युद्ध कर अपने त्रिशूल से उसका वध कर दिया। इस प्रकार तीनों लोक पुनः देवताओं को प्राप्त हुए, तथा संसार में शांति स्थापित हुई।
शुम्भ-निशुम्भ वध कथा पाठ विधि
नवरात्रि की सप्तमी अथवा अष्टमी तिथि को, जो कालरात्रि स्वरूप की पूजा से जुड़ी है, माँ काली व चामुंडा स्वरूप का ध्यान करते हुए दुर्गा सप्तशती के उत्तम चरित्र (अध्याय ५ से १३) का पाठ करने की परंपरा है। इस दिन तंत्र-साधना व शक्ति-उपासना का विशेष महत्व माना जाता है।
शुम्भ-निशुम्भ वध कथा के बारे में
यह कथा दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में शुम्भ-निशुम्भ के वरदान व अत्याचार, माता पार्वती के शरीर से देवी कौशिकी के प्राकट्य, तथा चंड-मुंड के वध से माँ काली के 'चामुंडा' नाम प्राप्त करने की कथा है। दूसरे अध्याय में रक्तबीज के वरदान, माँ काली द्वारा उसके रक्त-पान, तथा निशुम्भ व अंततः शुम्भ के वध की कथा दी गई है।
यह कथा दुर्गा सप्तशती के उत्तम चरित्र तथा नवरात्रि की कालरात्रि उपासना से जुड़ी है। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
मार्कण्डेय पुराण (दुर्गा सप्तशती) के बारे में
शुम्भ-निशुम्भ वध कथा का कोई एक प्रामाणिक मुद्रित 'कथा-पाठ' नहीं है, यह मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत आने वाली दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के उत्तम चरित्र (अध्याय ५ से १३) में वर्णित एक सुविख्यात व सर्वाधिक सुनाई जाने वाली पौराणिक कथा है। यहां दिया गया शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने, तथापि घटनाक्रम पुराण की सुस्थापित परंपरा पर आधारित है। ध्यान दें: माँ दुर्गा के प्राकट्य व महिषासुर-वध की कथा, जो दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित्र में वर्णित एक पृथक प्रसंग है, इसी साइट पर अलग पृष्ठ पर पहले से दी गई है, अतः यहां दोहराई नहीं गई है।
सामान्य प्रश्न
देवी कौशिकी कैसे प्रकट हुईं?
स्वर्ग से निष्कासित देवताओं की स्तुति सुनकर माता पार्वती के शरीर के कोश से एक अत्यंत तेजस्विनी देवी प्रकट हुईं, जो 'कौशिकी' कहलाईं। कोश अलग होने पर पार्वती स्वयं 'कालिका' कहलाने लगीं।
माँ काली को चामुंडा नाम कैसे मिला?
शुम्भ की विशाल सेना सहित आए चंड व मुंड को देखकर देवी कौशिकी के ललाट से माँ काली प्रकट हुईं। उन्होंने दोनों असुरों का वध कर उनके सिर देवी के समक्ष प्रस्तुत किए, जिससे प्रसन्न होकर उन्हें 'चामुंडा' नाम मिला।
रक्तबीज को किस प्रकार पराजित किया गया?
रक्तबीज के रक्त की हर बूंद से एक नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाता था। देवी के आदेश पर माँ काली ने उसका समस्त रक्त भूमि पर गिरने से पहले ही पी लिया, जिससे नए रक्तबीज उत्पन्न नहीं हो सके, और वह रक्तहीन होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ।
देवी ने शुम्भ को क्या उत्तर दिया था?
शुम्भ के यह कहने पर कि देवी अन्य देवियों के बल पर युद्ध जीत रही हैं, देवी ने कहा कि वे समस्त मातृकाएं उन्हीं की शक्तियां हैं, संसार में उनके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं, तथा उन्हें अपने में समाहित कर अकेले ही शुम्भ का वध किया।