पाठ विवरण
जय शनि देवा, जय शनि देवा,
जय जय जय शनि देवा॥
अखिल सृष्टि में कोटि-कोटि जन,
करें तुम्हारी सेवा।
जा पर कुपित होउ तुम स्वामी,
घोर कष्ट वह पावे।
धन वैभव और मान-कीर्ति,
सब पलभर में मिट जावे।
राजा नल को लगी शनि दशा,
राजपाट हर लेवा।
जा पर प्रसन्न होउ तुम स्वामी,
सकल सिद्धि वह पावे।
तुम्हारी कृपा रहे तो,
उसको जग में कौन सतावे।
ताँबा, तेल और तिल से जो,
करें भक्तजन सेवा।
हर शनिवार तुम्हारी,
जय-जय कार जगत में होवे।
कलियुग में शनिदेव महात्तम,
दु:ख दरिद्रता धोवे।
करू आरती भक्ति भाव से,
भेंट चढ़ाऊं मेवा।
व्रत में कई बार पाठ किया जाता है: ११, २१ या १०८ बार। इस काउंटर से अपनी पाठ गिनती सहेजें।
शनिवार आरती पाठ विधि
प्रत्येक शनिवार संध्या समय, दीप जलाकर, तांबे के पात्र में सरसों का तेल भरकर शनिदेव की प्रतिमा अथवा पीपल वृक्ष के समक्ष यह आरती गाएं। चूंकि शनिवार हनुमान जी की पूजा का भी दिन है, अनेक भक्त हनुमान पूजन के पश्चात इसी आरती से अपना शनिवार पूजन पूर्ण करते हैं।
शनिवार आरती के बारे में
शनिवार आरती एक परंपरागत रूप से रचित रचना है, जिसमें एक ध्रुव-पंक्ति (जय शनि देवा) के साथ चार पद हैं। इसमें शनि देव के क्रोध व प्रसन्नता दोनों रूपों, राजा नल के दृष्टांत तथा भक्ति के उपायों का वर्णन है।
इस पृष्ठ पर पूरा पाठ शुद्ध देवनागरी में, प्रत्येक पंक्ति के सरल हिंदी अर्थ के साथ दिया गया है।
शनिवार आरती का कोई ज्ञात रचयिता नहीं है, इस कारण इसे परंपरागत रचना माना जाता है। इसमें शनि देव की महिमा, राजा नल पर पड़ी शनि दशा का संदर्भ, तथा तांबे, तेल व तिल से उनकी सेवा करने की परंपरा का वर्णन है। यह आरती शनि देव की अन्य दो लोकप्रिय आरतियों, 'जय जय श्री शनिदेव' व 'ॐ जय जय शनि महाराज', से भिन्न, अपने आप में एक पृथक व सुपरिचित रचना है।
शनिवार आरती के लाभ
मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक इस आरती का नित्य पाठ करने से दुःख व दरिद्रता दूर होती है तथा शनि देव की कृपा से सकल सिद्धि की प्राप्ति होती है; प्रत्येक शनिवार तांबे के पात्र में सरसों का तेल अर्पित कर इसका पाठ विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
सामान्य प्रश्न
शनिवार आरती कब गाई जाती है?
यह आरती विशेष रूप से प्रत्येक शनिवार संध्या समय शनि देव के पूजन में गाई जाती है।
इस आरती में राजा नल का उल्लेख क्यों है?
आरती में यह बताने हेतु राजा नल का दृष्टांत दिया गया है कि शनि देव के कुपित होने पर बड़े से बड़ा राजा भी अपना राजपाट खो सकता है, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।
शनिवार आरती अन्य शनि आरतियों से किस प्रकार भिन्न है?
शनि देव की 'जय जय श्री शनिदेव' आरती से यह आरती अपने बोल व रचना-शैली में पूर्णतः भिन्न है, यद्यपि दोनों ही शनिवार को गाई जाती हैं।
शनिवार आरती के समय क्या भेंट अर्पित करें?
आरती के बोल के अनुसार तांबे के पात्र में सरसों का तेल व तिल अर्पित करने तथा मेवे की भेंट चढ़ाने की परंपरा है।
शनिवार आरती के क्या लाभ हैं?
मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक इस आरती का नित्य पाठ करने से दुःख व दरिद्रता दूर होती है तथा शनि देव की कृपा से सकल सिद्धि की प्राप्ति होती है; प्रत्येक शनिवार तांबे के पात्र में सरसों का तेल अर्पित कर इसका पाठ विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
