मुख्यकथाराजा विक्रमादित्य की शनि दशा

राजा विक्रमादित्य की शनि दशा

राजा विक्रमादित्य की शनि दशा वह कथा है, जिसमें उज्जयिनी नरेश विक्रमादित्य द्वारा नवग्रहों के विवाद में शनिदेव का अनजाने में अपमान हो जाने पर, शनिदेव ने उन्हें सिंहासन से भिखारी बनाकर अपनी साढ़ेसाती की महिमा का बोध कराया, तथा अंततः राजा ने ही शनिवार व्रत व शनि कथा की परंपरा संपूर्ण राज्य में स्थापित की।

अध्याय/

अध्याय · नवग्रहों का विवाद, और शनिदेव का अपमान

एक बार स्वर्गलोक में नवग्रहों में यह विवाद छिड़ गया कि उन नौ में सबसे बड़ा व शक्तिशाली कौन है। यह विवाद इतना बढ़ गया कि वे इंद्रदेव के पास न्याय हेतु पहुंचे, किंतु इंद्र भी इसका निर्णय न कर सके। अंततः उन्होंने नवग्रहों को परामर्श दिया कि पृथ्वी पर उज्जयिनी के महाराजा विक्रमादित्य अत्यंत न्यायप्रिय व बुद्धिमान शासक हैं, अतः यह विवाद उन्हीं के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

राजा विक्रमादित्य ने नवग्रहों की समस्या सुनकर एक उपाय निकाला। उन्होंने सोना, चांदी, कांसा, तांबा, सीसा, टिन, जस्ता, अभ्रक व लोहे, इन नौ धातुओं से नौ भिन्न सिंहासन बनवाए, तथा उनके मूल्य व गुणों के अनुक्रम में सजाकर प्रत्येक ग्रह को उसके अनुरूप सिंहासन पर आसीन होने को कहा। इस प्रकार सूर्य को स्वर्ण सिंहासन, चंद्रमा को रजत सिंहासन जैसे अन्य ग्रहों को क्रमशः उच्च धातुओं के सिंहासन मिले, किंतु शनिदेव को सबसे अंत में, लोहे के सिंहासन पर बिठाया गया।

अपने आपको सबसे निम्न धातु के सिंहासन पर बिठाए जाने से शनिदेव को गहरा अपमान अनुभव हुआ। क्रोधित होकर उन्होंने राजा से कहा, 'हे राजन! तुमने मेरा अपमान किया है। स्मरण रहे, मैं किसी भी राशि पर साढ़े सात वर्षों तक रहता हूं, इतने दीर्घ समय तक कोई अन्य ग्रह प्रभाव नहीं डालता, तथा मैंने बड़े-बड़े देवताओं व राजाओं तक को अपनी दशा से नहीं बख्शा है।' यह कहकर उन्होंने राजा को अपनी शक्ति का बोध कराने की प्रतिज्ञा ली।

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अध्याय · सिंहासन से भिखारी तक

अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने हेतु शनिदेव एक अश्व-व्यापारी का वेश धारण कर उज्जयिनी पहुंचे तथा राजा विक्रमादित्य के समक्ष एक अत्यंत सुंदर व बलशाली घोड़ा प्रस्तुत किया। राजा उस अश्व की सुंदरता से मुग्ध होकर उस पर सवार हो गए। घोड़ा राजा को लेकर तीव्र गति से दौड़ता हुआ एक सुदूर घने जंगल में जा पहुंचा, तथा वहां अकस्मात अदृश्य हो गया, राजा को अकेला, भूखा-प्यासा व मार्ग से भटका हुआ छोड़कर।

भटकते-भटकते राजा किसी प्रकार एक दूसरे नगर में जा पहुंचे, जहां उन्हें कोई नहीं पहचानता था। भूख से व्याकुल राजा एक सेठ के घर भोजन मांगने पहुंचे। उसी रात्रि सेठ के घर से एक बहुमूल्य नौलखा हार, जो एक खूंटी पर टंगा था, रहस्यमय ढंग से गायब हो गया। संदेह की सुई तुरंत उस अपरिचित अतिथि विक्रमादित्य की ओर घूम गई, तथा नगर के शासक ने बिना किसी जांच के उन्हें चोर घोषित कर उनके दोनों हाथ व पैर काट देने का दंड सुना दिया।

इस भीषण दंड के पश्चात एक तेली (तेल पेरने वाला) को उस अपंग व असहाय पुरुष पर दया आई, तथा उसने उसे अपनी तेल की घानी में काम पर रख लिया। राजा, जो अब अपनी वास्तविक पहचान छुपाए हुए था, प्रतिदिन घानी चलाते हुए करुण स्वर में गीत गाया करता था, जिससे उसकी व्यथा उसके स्वर में झलकती थी।

अध्याय · स्वप्न में शनि का दर्शन, और पुनर्प्रतिष्ठा

उस नगर की राजकुमारी ने एक दिन घानी से आते हुए वह करुण स्वर सुना, तथा उस स्वर में छिपी वेदना व मधुरता से अत्यंत प्रभावित हुई। उसने अपने माता-पिता के समक्ष उसी अपंग तेली से विवाह करने की इच्छा प्रकट की। माता-पिता ने अनेक बार समझाने का प्रयत्न किया, किंतु राजकुमारी के हठ के आगे अंततः उन्हें अनुमति देनी पड़ी, तथा विवाह संपन्न हुआ।

विवाह की उसी रात्रि शनिदेव स्वप्न में राजा विक्रमादित्य के समक्ष प्रकट हुए। राजा ने हाथ जोड़कर अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। शनिदेव प्रसन्न होकर बोले, 'हे राजन! तुमने मेरी शक्ति का बोध पा लिया है, तुम्हारी साढ़ेसाती अब पूर्ण हो चुकी है।' यह कहकर उन्होंने राजा को आशीर्वाद दिया, तथा प्रातः जागने पर राजा के दोनों हाथ व पैर पूर्ववत ज्यों के त्यों हो गए।

जब राजा की वास्तविक पहचान प्रकट हुई, तो सेठ के घर से खोया हुआ नौलखा हार भी उसी खूंटी पर, जहां से वह गायब हुआ था, रहस्यमय ढंग से पुनः प्रकट हो गया। सेठ व नगर के शासक ने राजा से अपने अन्याय हेतु क्षमा मांगी, तथा सम्मान व उपहारों सहित उन्हें विदा किया। उज्जयिनी लौटकर राजा विक्रमादित्य ने संपूर्ण राज्य में शनिदेव की महिमा का बखान किया, तथा प्रत्येक शनिवार को व्रत रखने व यह कथा सुनने-सुनाने की परंपरा स्वयं स्थापित की, जो आज भी शनिवार व्रत के रूप में प्रचलित है।

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राजा विक्रमादित्य की शनि दशा पाठ विधि

शनिवार को प्रातः स्नान कर काले अथवा गहरे नीले वस्त्र धारण करें, शनिदेव की प्रतिमा अथवा चित्र पर सरसों के तेल का दीपक जलाएं, तथा राजा विक्रमादित्य की इस कथा का श्रवण-पठन करें। संध्या समय शनि चालीसा व आरती के साथ पूजन का समापन करें।

पाठ दिवस
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राजा विक्रमादित्य की शनि दशा के बारे में

यह कथा तीन अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में नवग्रहों के विवाद व शनिदेव के अपमान की कथा है। दूसरे अध्याय में राजा के सिंहासन से भिखारी बनने, नौलखा हार की घटना तथा उनके हाथ-पैर काटे जाने की कथा है। तीसरे अध्याय में राजकुमारी के विवाह प्रस्ताव, स्वप्न में शनिदेव के दर्शन, राजा की पुनर्प्रतिष्ठा तथा शनिवार व्रत की परंपरा की स्थापना का वर्णन है।

यह कथा शनिवार व्रत व शनि जयंती से जुड़ी है। इस पृष्ठ पर तीनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

रचनाकार
शनि माहात्म्य से जुड़ी लोक-कथा
पारंपरिक जनश्रुति

शनि माहात्म्य से जुड़ी लोक-कथा के बारे में

राजा विक्रमादित्य की शनि दशा कथा का कोई एक प्रामाणिक मुद्रित 'कथा-पाठ' नहीं है, यह शनि माहात्म्य से जुड़ी एक सुविख्यात व सर्वाधिक सुनाई जाने वाली पारंपरिक लोक-कथा है, जिसका शब्दांकन यहां मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने, तथापि घटनाक्रम प्रचलित परंपरा पर आधारित है।

सामान्य प्रश्न

शनिदेव राजा विक्रमादित्य से क्यों क्रोधित हुए?

नवग्रहों के विवाद को सुलझाने हेतु राजा ने नौ धातुओं के सिंहासन बनवाए, जिनमें शनिदेव को सबसे निम्न, लोहे के सिंहासन पर बिठाया गया, जिससे उन्हें गहरा अपमान अनुभव हुआ।

नौलखा हार की घटना क्या है?

राजा जब भटककर एक अनजान नगर के सेठ के घर पहुंचे, तो उसी रात्रि सेठ का बहुमूल्य नौलखा हार रहस्यमय ढंग से गायब हो गया, जिसका दोष राजा पर मढ़कर उनके हाथ-पैर काटने का दंड दिया गया।

राजा का शनि दशा से उद्धार कैसे हुआ?

राजकुमारी से विवाह की रात्रि शनिदेव ने स्वप्न में प्रकट होकर उनकी साढ़ेसाती पूर्ण होने की घोषणा की, जिसके पश्चात राजा के हाथ-पैर पूर्ववत हो गए तथा नौलखा हार भी वापस मिल गया।

शनिवार व्रत की परंपरा कैसे आरंभ हुई?

अपनी दशा से मुक्त होकर उज्जयिनी लौटने पर राजा विक्रमादित्य ने स्वयं संपूर्ण राज्य में प्रत्येक शनिवार व्रत रखने व यह कथा सुनने-सुनाने की परंपरा स्थापित की।

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पाठ विवरण

रचनाकारशनि माहात्म्य से जुड़ी लोक-कथा
संरचना३ अध्याय
पाठ समय८ मिनट