मुख्य›त्योहार›रमा एकादशी
संकटों से मुक्ति का व्रत · कार्तिक कृष्ण एकादशी

रमा एकादशी

रमा एकादशी कार्तिक मास की कृष्ण एकादशी को, दीपावली से तीन-चार दिन पूर्व मनाई जाती है, तथा इसे संकटों व दरिद्रता से मुक्ति की कामना से रखा जाता है।

रमा एकादशी
अगली तिथि
५ नवम्बर २०२६

यह एकादशी धनतेरस से एक या दो दिन पहले आती है (2026 में एक दिन पहले, 2027 में दो दिन पहले), तथा दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव के आरंभ का संकेत मानी जाती है। 2026 में व्रत 5 नवम्बर को और पारण 6 नवम्बर सुबह 6:37 से 8:48 के बीच है (नई दिल्ली)।

रमा एकादशी का महत्व

'रमा' मां लक्ष्मी का एक नाम है, और दीपावली से ठीक पहले आने वाली इस एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की भी पूजा की जाती है। पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को इसकी कथा सुनाते हैं: राजा मुचुकुंद की पुत्री चंद्रभागा का विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन से हुआ था, जो शरीर से बहुत दुर्बल था।

विष्णु चालीसा
चालीसा · रमा एकादशी पूजन में पाठ

एक बार कार्तिक में शोभन अपने ससुराल आया हुआ था, तभी रमा एकादशी आ गई। मुचुकुंद के राज्य में घोषणा थी कि एकादशी को कोई अन्न न खाए, यहां तक कि पशु भी नहीं। दुर्बल होते हुए भी शोभन ने व्रत रखा। भूख से दिन भर कष्ट पाते हुए रात बीती, और सूर्योदय होते-होते उसके प्राण चले गए। राजा ने उसका दाह-संस्कार कराया, और चंद्रभागा पति का पारलौकिक कर्म करके पिता के घर ही रहने लगी।

व्रत के पुण्य से शोभन को मंदराचल पर्वत के शिखर पर एक दिव्य नगर मिला, किंतु वह अस्थिर था, क्योंकि उसने व्रत श्रद्धा से नहीं, विवशता में रखा था। तीर्थयात्रा पर निकले ब्राह्मण सोमशर्मा ने उसे वहां देखा और लौटकर चंद्रभागा को बताया। चंद्रभागा सोमशर्मा के साथ वामदेव ऋषि के आश्रम पहुंची, और आठ वर्ष की आयु से किए अपने एकादशी व्रतों का पुण्य पति को अर्पित किया। इससे शोभन का नगर स्थिर हो गया, और दोनों वहां सुखपूर्वक रहने लगे।

रमा एकादशी कैसे मनाई जाती है

भक्तगण इस दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं, तथा दिनभर फलाहार व्रत रखते हैं। भगवान विष्णु का पूजन कर रमा एकादशी की कथा का श्रवण किया जाता है।

चूंकि यह एकादशी धनतेरस से एक-दो दिन पूर्व आती है, अनेक घरों में इसी दिन से दीपावली की सफाई व सजावट की तैयारियां भी आरंभ हो जाती हैं। अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में व्रत का पारण किया जाता है।

ॐ जय जगदीश हरे आरती
आरती · एकादशी पूजन में गाई जाने वाली आरती

यह व्रत विशेष रूप से जीवन के संकटों, दरिद्रता व अस्थिरता से मुक्ति की कामना से रखा जाता है, तथा शोभन-चंद्रभागा की कथा इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि पति-पत्नी के संयुक्त व्रत-पुण्य से जीवन में स्थायित्व आता है।

रमा एकादशी पूजा विधि

प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लें तथा फलाहार व्रत रखें। भगवान विष्णु का पूजन कर रमा एकादशी की कथा सुनें। अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में दान देकर व्रत का पारण करें।

रमा एकादशी व्रत कथा पढ़ें
कथा पढ़ें →

रमा एकादशी के बारे में

रमा एकादशी कार्तिक मास की कृष्ण एकादशी को, धनतेरस से एक-दो दिन पूर्व, संकटों व दरिद्रता से मुक्ति की कामना से रखा जाने वाला व्रत है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, शोभन-चंद्रभागा की कथा, तथा व्रत-विधि की जानकारी दी गई है।

सामान्य प्रश्न

रमा एकादशी कब मनाई जाती है?

यह व्रत प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की कृष्ण एकादशी तिथि को, धनतेरस से एक-दो दिन पूर्व मनाया जाता है।

2026 में रमा एकादशी कब है और पारण कब करें?

2026 में रमा एकादशी का व्रत गुरुवार, 5 नवम्बर को है। एकादशी तिथि 4 नवम्बर सुबह 11:03 से 5 नवम्बर सुबह 10:35 तक है। पारण शुक्रवार, 6 नवम्बर को सुबह 6:37 से 8:48 के बीच करें; द्वादशी उस दिन सुबह 10:30 पर समाप्त होती है (नई दिल्ली)।

इसे 'रमा' एकादशी क्यों कहते हैं?

'रमा' मां लक्ष्मी का नाम है। दीपावली से पहले आने वाली इस एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की पूजा होती है, इसलिए इसे रमा एकादशी कहा जाता है।

शोभन व चंद्रभागा की कथा क्या है?

दुर्बल राजकुमार शोभन ने ससुर मुचुकुंद के राज्य में रमा एकादशी का व्रत रखा और अगली सुबह होते-होते उसके प्राण चले गए। व्रत के पुण्य से उसे मंदराचल पर्वत पर दिव्य नगर मिला, जो अस्थिर था। उसकी पत्नी चंद्रभागा ने अपने एकादशी व्रतों का पुण्य उसे अर्पित किया, जिससे वह नगर स्थिर हो गया।

रमा एकादशी दीपावली से कैसे जुड़ी है?

रमा एकादशी धनतेरस से एक-दो दिन पूर्व आती है, और इस पर मां लक्ष्मी (रमा) की भी पूजा होती है, अतः इसे दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव के आरंभ का संकेत भी माना जाता है।

रमा एकादशी व्रत से क्या लाभ होता है?

मान्यता है कि यह व्रत जीवन के संकटों, दरिद्रता व अस्थिरता से मुक्ति दिलाता है, तथा घर-परिवार में स्थायित्व व समृद्धि लाता है।

संबंधित खोज

मुख्य जानकारी

देवताभगवान विष्णु
तिथिकार्तिक कृष्ण एकादशी
महत्वसंकटों व दरिद्रता से मुक्ति
साथ मेंधनतेरस से एक-दो दिन पूर्व
व्रत प्रकारफलाहार व्रत, द्वादशी को पारण