मुख्यत्योहारमकर संक्रांति
सूर्य उपासना एवं फसल पर्व · सूर्य का मकर राशि में प्रवेश

मकर संक्रांति

मकर संक्रांति भगवान सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला पर्व है, जो प्रतिवर्ष एक निश्चित सौर तिथि, 14 अथवा 15 जनवरी को आता है।

मकर संक्रांति
अगली तिथि
१५ जनवरी २०२७

मकर संक्रांति एकमात्र प्रमुख हिंदू पर्व है जो चंद्र तिथि की बजाय सौर गणना पर आधारित है, इसलिए यह प्रतिवर्ष लगभग एक ही ग्रेगोरियन तिथि (14 अथवा 15 जनवरी) को आता है। यह पर्व भारत के विभिन्न राज्यों में पोंगल (तमिलनाडु), लोहड़ी (पंजाब), बिहू (असम) व उत्तरायण (गुजरात) जैसे भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है।

मकर संक्रांति का महत्व

मकर संक्रांति भगवान सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। इसी दिन से सूर्य उत्तर की ओर गमन आरंभ करते हैं, जिसे 'उत्तरायण' कहा जाता है, और दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं। उत्तरायण काल को देवताओं का दिन तथा शुभ कार्यों हेतु विशेष रूप से उत्तम माना जाता है।

सूर्य चालीसा
चालीसा · मकर संक्रांति पूजन में पाठ

यह पर्व फसल पर्व के रूप में भी मनाया जाता है, क्योंकि इसी समय रबी की फसल की कटाई का मौसम होता है। इसीलिए यह पंजाब में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल, असम में माघ बिहू, तथा गुजरात व राजस्थान में उत्तरायण के नाम से हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

मान्यता है कि इस दिन गंगासागर सहित पवित्र नदियों में स्नान व दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। भीष्म पितामह ने भी इच्छामृत्यु का वरदान होते हुए उत्तरायण काल की प्रतीक्षा कर, इसी अवधि में देहत्याग किया था, जो इस काल के महत्व को दर्शाता है।

मकर संक्रांति कैसे मनाई जाती है

इस दिन प्रातःकाल पवित्र नदियों में स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। तिल, गुड़, खिचड़ी व कंबल का दान करना विशेष पुण्यदायी माना जाता है, इसीलिए उत्तर भारत में इसे 'खिचड़ी' के नाम से भी जाना जाता है।

तिल व गुड़ से बने लड्डू व अन्य व्यंजन बनाकर एक-दूसरे को बांटे जाते हैं, तथा 'तिल-गुड़ लो, मीठा बोलो' कहकर आपसी स्नेह व मधुर संबंधों की कामना की जाती है।

गुजरात व राजस्थान में इस दिन भव्य पतंगबाज़ी उत्सव मनाया जाता है, जबकि तमिलनाडु में चार दिन के पोंगल पर्व में सूर्य, पशुधन व भूमि की पूजा की जाती है, और पंजाब में एक रात पूर्व लोहड़ी का अलाव जलाया जाता है।

मकर संक्रांति पूजा विधि

प्रातःकाल पवित्र नदी अथवा घर पर स्नान कर सूर्य देव को जल का अर्घ्य दें। तिल, गुड़, खिचड़ी अथवा कंबल का यथाशक्ति दान करें। घर में तिल-गुड़ के व्यंजन बनाकर परिवार व पड़ोसियों को बांटें तथा सूर्य चालीसा का पाठ करें।

मकर संक्रांति के बारे में

मकर संक्रांति भगवान सूर्य के मकर राशि में प्रवेश तथा उत्तरायण काल के आरंभ का पर्व है, जो प्रतिवर्ष लगभग निश्चित सौर तिथि को मनाया जाता है। इस पृष्ठ पर इस पर्व का महत्व, खिचड़ी-दान की परंपरा, तथा भारत के विभिन्न राज्यों में इसके भिन्न रूपों, पोंगल, लोहड़ी, बिहू व उत्तरायण, की जानकारी दी गई है।

इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

सामान्य प्रश्न

मकर संक्रांति कब मनाई जाती है?

मकर संक्रांति प्रतिवर्ष 14 अथवा 15 जनवरी को मनाई जाती है, जिस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं।

मकर संक्रांति की तिथि प्रतिवर्ष लगभग एक ही क्यों रहती है?

अधिकांश हिंदू त्योहार चंद्र तिथि पर आधारित होते हैं, जो प्रतिवर्ष बदलती है, परंतु मकर संक्रांति सूर्य की गति पर आधारित है, इसलिए यह ग्रेगोरियन कैलेंडर में लगभग स्थिर तिथि पर आती है।

उत्तरायण क्या है?

उत्तरायण सूर्य के उत्तर दिशा की ओर गमन की अवधि है, जो मकर संक्रांति से आरंभ होती है, और इसे शुभ कार्यों हेतु विशेष रूप से उत्तम माना जाता है।

मकर संक्रांति को खिचड़ी क्यों कहा जाता है?

उत्तर भारत में इस दिन खिचड़ी दान करने व खाने की परंपरा प्रमुख है, इसीलिए इस पर्व को कई क्षेत्रों में 'खिचड़ी' के नाम से भी जाना जाता है।

क्षेत्रीय रूप

Regional Forms

संबंधित पाठ

Related Readings

संबंधित खोज

मुख्य जानकारी

देवताभगवान सूर्य
आधारसौर संक्रांति (मकर राशि प्रवेश)
विशेष अनुष्ठानखिचड़ी दान, तिल-गुड़ भोग, पतंगबाज़ी
अन्य नामपोंगल, लोहड़ी, बिहू, उत्तरायण
महत्वउत्तरायण काल का आरंभ