मुख्यचालीसाश्री सूर्य चालीसा

श्री सूर्य चालीसा

सूर्य चालीसा भगवान सूर्यदेव की स्तुति में रचित चालीसा है, जिसका पूर्ण पाठ यहां अर्थ सहित मिलेगा।

श्री सूर्य चालीसा
चौपाई/४०

पाठ विवरण

रचनाकारअज्ञात
संरचना२ दोहे · ४० चौपाई
पाठ समय७ मिनट
दोहा

कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥

चौपाई

जय सविता जय जयति दिवाकर।
सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥

भानु पतंग मरीची भास्कर।
सविता हंस सुनूर विभाकर॥

विवस्वान आदित्य विकर्तन।
मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥

अम्बरमणि खग रवि कहलाते।
वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥

सहस्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि।
मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥

अरुण सदृश सारथी मनोहर।
हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥

मंडल की महिमा अति न्यारी।
तेज रूप केरी बलिहारी॥

उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते।
देखि पुरन्दर लज्जित होते॥

मित्र मरीचि भानु अरुण भास्कर।
सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥

पूषा रवि आदित्य नाम लै।
हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥

द्वादस नाम प्रेम सों गावैं।
मस्तक बारह बार नवावैं॥

चार पदारथ जन सो पावै।
दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥

नमस्कार को चमत्कार यह।
विधि हरिहर को कृपासार यह॥

सेवै भानु तुमहिं मन लाई।
अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥

बारह नाम उच्चारन करते।
सहस जनम के पातक टरते॥

उपाख्यान जो करते तवजन।
रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥

धन सुत जुत परिवार बढ़तु है।
प्रबल मोह को फंद कटतु है॥

अर्क शीश को रक्षा करते।
रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥

सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत।
कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥

भानु नासिका वासकरहुनित।
भास्कर करत सदा मुखको हित॥

ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे।
रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥

कंठ सुवर्ण रेत की शोभा।
तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥

पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर।
त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥

युगल हाथ पर रक्षा कारन।
भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥

बसत नाभि आदित्य मनोहर।
कटिमंह, रहत मन मुदभर॥

जंघा गोपति सविता बासा।
गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥

विवस्वान पद की रखवारी।
बाहर बसते नित तम हारी॥

सहस्रांशु सर्वांग सम्हारै।
रक्षा कवच विचित्र विचारे॥

अस जोजन अपने मन माहीं।
भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं॥

दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै।
जोजन याको मन मंह जापै॥

अंधकार जग का जो हरता।
नव प्रकाश से आनन्द भरता॥

ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही।
कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥

मंद सदृश सुत जग में जाके।
धर्मराज सम अद्भुत बांके॥

धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा।
किया करत सुरमुनि नर सेवा॥

भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों।
दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥

परम धन्य सों नर तनधारी।
हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥

अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन।
मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥

भानु उदय बैसाख गिनावै।
ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥

यम भादों आश्विन हिमरेता।
कातिक होत दिवाकर नेता॥

अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं।
पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं॥

अंतिम दोहा

भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥

पाठ गणना

व्रत में कई बार पाठ किया जाता है: ११, २१ या १०८ बार। गिनती इस डिवाइस पर सहेजी जाती है।

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श्री सूर्य चालीसा पाठ विधि

रविवार को सूर्योदय के समय स्नान के पश्चात सूर्य को अर्घ्य देकर पाठ करें। तांबे के पात्र से जल अर्पित करना विशेष फलदायी माना जाता है।

पाठ दिवस
रविवार एवं छठ पर्व
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हनुमान चालीसा
स्तोत्र · ८ मिनट
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श्री सूर्य चालीसा के बारे में

सूर्य चालीसा भगवान सूर्यदेव की स्तुति में रचित चालीसा है, जिसमें सूर्य के बारह प्रमुख नामों, शरीर के अंग-अंग में उनके निवास और बारह महीनों में उनके भिन्न-भिन्न नामों का वर्णन है। रचना एक ध्यान-दोहे से आरंभ होकर चालीस चौपाइयों में आगे बढ़ती है और एक दोहे के साथ समाप्त होती है, जहां इसे 'भानु चालीसा' भी कहा गया है।

इस पृष्ठ पर पूरा पाठ शुद्ध देवनागरी में, प्रत्येक चौपाई के सरल हिंदी अर्थ के साथ दिया गया है। अक्षरों का आकार बढ़ाया जा सकता है, ऑडियो के साथ पाठ किया जा सकता है, और पूरा पाठ प्रिंट भी किया जा सकता है।

रचनाकार
अज्ञात
पारंपरिक रचना

अज्ञात के बारे में

सूर्य चालीसा का कोई रचयिता चालीसा में स्वयं नामित नहीं है, इस कारण इसे अज्ञात रचनाकार की परंपरागत रचना माना जाता है। इसके समापन दोहे में इसे 'भानु चालीसा' भी कहा गया है। यह चालीसा भारत भर में सूर्य भक्तों द्वारा रविवार, छठ पर्व और मकर संक्रांति के अवसर पर व्यापक रूप से पढ़ी जाती है।

सामान्य प्रश्न

सूर्य चालीसा की रचना किसने की?

चालीसा में कोई रचयिता स्वयं नामित नहीं है, इसलिए इसे अज्ञात रचनाकार की परंपरागत रचना माना जाता है।

इसमें कुल कितनी चौपाई हैं?

एक आरंभिक ध्यान-दोहा, चालीस चौपाई और एक समापन दोहा है।

पाठ का उत्तम समय क्या है?

रविवार को सूर्योदय के समय, स्नान के पश्चात सूर्य को अर्घ्य देकर पढ़ना उत्तम माना जाता है। छठ पर्व और मकर संक्रांति पर भी विशेष माना जाता है।

क्या अर्थ जानना आवश्यक है?

आवश्यक नहीं, परंतु अर्थ सहित पाठ करने से भाव स्पष्ट होता है। इस पृष्ठ पर प्रत्येक चौपाई का सरल अर्थ साथ में दिया गया है।

क्या इसे बिना स्नान पढ़ा जा सकता है?

हाथ-मुँह धोकर स्वच्छ स्थान पर बैठकर पाठ किया जा सकता है। भाव और स्वच्छता दोनों का महत्व है।

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