छठ पूजा
छठ पूजा कार्तिक मास की शुक्ल षष्ठी के इर्द-गिर्द मनाया जाने वाला चार दिवसीय पर्व है, जिसमें भगवान सूर्य व छठी मैया की उपासना कर संतान व परिवार के कल्याण की कामना की जाती है।

यह मुख्य 'संध्या अर्घ्य' दिवस की तिथि है, पर्व वास्तव में इससे दो दिन पूर्व नहाय खाय से आरंभ होकर, अगले दिन उषा अर्घ्य के साथ संपन्न होता है। इसी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय की स्कंद षष्ठी भी मनाई जाती है।
छठ पूजा का महत्व
छठ पूजा भगवान सूर्य की उपासना का पर्व है, जो सृष्टि में जीवन व ऊर्जा के स्रोत के रूप में पूजे जाते हैं। इसके साथ ही छठी मैया, जिन्हें देवी उषा (सूर्य की बहन अथवा शक्ति) माना जाता है, की भी आराधना की जाती है, जो संतान की रक्षा व कल्याण की देवी मानी जाती हैं। यही एकमात्र प्रमुख पर्व है जिसमें उगते सूर्य के साथ-साथ अस्त होते सूर्य को भी अर्घ्य दिया जाता है।
मान्यता है कि महाभारत काल में सूर्यपुत्र कर्ण ने कमर तक जल में खड़े होकर प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य दिया था, जिसे छठ व्रत का प्रारंभिक स्वरूप माना जाता है। एक अन्य कथा में राजा प्रियव्रत की संतान के मृत जन्म लेने पर देवी षष्ठी के आशीर्वाद से संतान पुनः जीवित हुई, जिसके स्मरण में यह व्रत रखा जाता है।
छठ व्रत को अत्यंत कठोर व शुद्धता की दृष्टि से सबसे सख्त व्रतों में गिना जाता है, इसमें 36 घंटे तक निर्जला उपवास रखा जाता है, तथा व्रती नदी अथवा तालाब के जल में खड़े होकर स्वयं अर्घ्य अर्पित करते हैं।
छठ पूजा कैसे मनाई जाती है
पहले दिन 'नहाय खाय' को व्रती पवित्र नदी में स्नान कर, घर की सफाई के पश्चात कद्दू-भात जैसा सात्विक भोजन एक समय ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन 'खरना' को दिनभर निर्जला उपवास रखकर संध्या समय गुड़ की खीर व रोटी का प्रसाद ग्रहण कर 36 घंटे के निर्जला व्रत का आरंभ किया जाता है।
तीसरे दिन, मुख्य दिवस, संध्या समय नदी अथवा तालाब में कमर तक जल में खड़े होकर, बांस की टोकरी में ठेकुआ, फल व गन्ना सजाकर अस्त होते सूर्य को 'संध्या अर्घ्य' दिया जाता है।
चौथे व अंतिम दिन, ब्रह्म मुहूर्त में पुनः नदी तट पर जाकर उगते सूर्य को 'उषा अर्घ्य' अर्पित किया जाता है, जिसके पश्चात ही 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारण किया जाता है, तथा प्रसाद का वितरण किया जाता है।
छठ पूजा पूजा विधि
पहले दिन नदी स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण करें। दूसरे दिन दिनभर उपवास रखकर संध्या को गुड़ की खीर का प्रसाद ग्रहण करें। तीसरे दिन दिनभर निर्जला उपवास रखते हुए संध्या समय जल में खड़े होकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दें। चौथे दिन प्रातः उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।
छठ पूजा के बारे में
छठ पूजा भगवान सूर्य व छठी मैया की उपासना का चार दिवसीय पर्व है, जो कार्तिक मास की शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक मनाया जाता है। इस पृष्ठ पर छठ पूजा का महत्व, कर्ण व राजा प्रियव्रत की कथाएं, तथा नहाय खाय, खरना, संध्या अर्घ्य व उषा अर्घ्य के चार दिनों की जानकारी दी गई है।
इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
छठ पूजा कब मनाई जाती है?
छठ पूजा प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक, चार दिनों के लिए मनाई जाती है, जिसका मुख्य दिन षष्ठी तिथि होता है।
छठ पूजा में डूबते सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?
छठ पूजा इस विश्वास पर आधारित है कि सूर्य की उपासना उनके उदय व अस्त, दोनों रूपों में की जानी चाहिए, जो जीवन के हर पक्ष, आरंभ व अंत दोनों, के प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है।
क्या छठ व्रत में जल ग्रहण किया जा सकता है?
नहीं, खरना के प्रसाद के पश्चात से लेकर उषा अर्घ्य तक लगभग 36 घंटे तक पूर्ण निर्जला व्रत रखा जाता है, जो इसे अत्यंत कठोर व्रतों में गिनता है।
छठ पूजा किन क्षेत्रों में विशेष रूप से मनाई जाती है?
छठ पूजा बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश व नेपाल के तराई क्षेत्र में विशेष रूप से मनाई जाती है, तथा इन क्षेत्रों से बाहर बसे समुदायों द्वारा भी श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है।