अध्याय १ · राजा प्रियव्रत एवं देवी षष्ठी का प्राकट्य
प्राचीन काल में प्रियव्रत नामक एक राजा राज्य करते थे, जिनकी पत्नी का नाम मालिनी था। दोनों दंपति संतान-सुख से वंचित थे, और वर्षों की यह पीड़ा उन्हें भीतर ही भीतर कचोटती रहती थी। संतान-प्राप्ति की कामना से राजा ने महर्षि कश्यप के मार्गदर्शन में पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया, जिसके प्रभाव से रानी मालिनी गर्भवती हुईं।
नौ मास पूर्ण होने पर जब प्रसव का समय आया, तो रानी ने एक मृत पुत्र को जन्म दिया। अपनी संतान को इस प्रकार खोकर राजा शोक में डूब गए, और अपने प्राणों को त्यागने का विचार करने लगे। ठीक उसी क्षण, एक अलौकिक तेज से युक्त देवी वहां प्रकट हुईं, तथा राजा को इस अनर्थ से रोक लिया।
देवी ने राजा से कहा: हे राजन, मैं सृष्टि की मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हूं, इसीलिए षष्ठी के नाम से जानी जाती हूं। मैं संतानों की रक्षा करने वाली देवी हूं, तथा जो कोई श्रद्धापूर्वक मेरा पूजन करता है, उसकी संतान संबंधी समस्त कामनाएं मैं पूर्ण करती हूं। तुम शोक त्याग कर मेरी आराधना करो।
देवी के इस आश्वासन से राजा प्रियव्रत का साहस लौट आया। उन्होंने रानी मालिनी के साथ कार्तिक मास की शुक्ल षष्ठी को विधि-विधानपूर्वक देवी षष्ठी का पूजन किया। इस पूजन के फलस्वरूप उन्हें पुनः एक स्वस्थ व दीर्घायु पुत्र की प्राप्ति हुई। इसी घटना के स्मरण में तभी से कार्तिक शुक्ल षष्ठी को देवी षष्ठी के पूजन की परंपरा आरंभ हुई, जो आगे चलकर छठ पर्व के नाम से जानी जाने लगी।
अध्याय २ · सूर्यपुत्र कर्ण की अर्घ्य-परंपरा
छठ पर्व में सूर्यदेव की उपासना की परंपरा का एक प्रसंग महाभारत काल से भी जुड़ा है। सूर्यपुत्र कर्ण अपने पिता भगवान सूर्य के परम भक्त थे, और प्रतिदिन कमर भर जल में खड़े होकर उन्हें अर्घ्य अर्पित करते थे। कहा जाता है कि उनकी यह नित्य साधना ही आगे चलकर जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा का आधार बनी, जो आज छठ पर्व का सबसे प्रमुख अनुष्ठान माना जाता है।
अध्याय ३ · द्रौपदी का छठ व्रत
छठ व्रत से जुड़ी एक अन्य कथा महाभारत के ही एक अन्य प्रसंग से संबंधित है। जब पांडव जुए में अपना संपूर्ण राजपाट हार बैठे, तो द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण के परामर्श पर छठ का व्रत रखकर सूर्यदेव व षष्ठी माता की आराधना की। इस व्रत के प्रभाव से पांडवों को अंततः अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हुआ। इसी कारण यह व्रत परिवार व राज्य, दोनों के सुख-समृद्धि की पुनर्प्राप्ति का प्रतीक भी माना जाता है।
अध्याय ४ · व्रत का माहात्म्य
छठ व्रत को अत्यंत कठोर व फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि षष्ठी माता, जिन्हें देवी उषा अथवा सूर्य की बहन भी माना जाता है, संतान की दीर्घायु व स्वास्थ्य की रक्षा करती हैं। इसी कारण यह व्रत मुख्यतः संतान के कल्याण की कामना से रखा जाता है, यद्यपि परिवार में सुख-समृद्धि चाहने वाला कोई भी श्रद्धालु इसे रख सकता है।
व्रत विधिपूर्वक रखने वाले को अस्ताचल व उदयाचल, दोनों ओर के सूर्य को अर्घ्य देने का सुयोग प्राप्त होता है, जो जीवन के प्रत्येक पक्ष के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। इसी श्रद्धा व कठोर संयम के कारण छठ को महापर्व की संज्ञा दी गई है।
छठ पूजा व्रत कथा पाठ विधि
छठ व्रत चार दिनों में संपन्न होता है, पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन संध्या समय अस्त होते सूर्य को अर्घ्य, तथा चौथे दिन प्रातःकाल उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। तीसरे व चौथे दिन के बीच लगभग 36 घंटे का निर्जला उपवास रखा जाता है।
छठ पूजा व्रत कथा के बारे में
छठ पूजा व्रत कथा चार अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में राजा प्रियव्रत व रानी मालिनी की संतान-प्राप्ति तथा देवी षष्ठी के प्राकट्य की मुख्य कथा है। दूसरे अध्याय में सूर्यपुत्र कर्ण की अर्घ्य-परंपरा, तथा तीसरे अध्याय में द्रौपदी के छठ व्रत की कथा दी गई है। चौथा अध्याय व्रत के माहात्म्य का वर्णन करता है।
यह व्रत कार्तिक मास की शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक, चार दिनों में मनाया जाता है। इस पृष्ठ पर चारों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
छठ पूजा व्रत कथा का कोई प्राचीन मुद्रित मूल पाठ archive.org पर नहीं मिला, वहां मिला एकमात्र सुसंगत स्रोत वास्तव में एक आधुनिक वेबसाइट-लेख की प्रति निकला, तथा एक अन्य उपलब्ध स्रोत केवल संस्कृत पूजन-मंत्रों की पुस्तिका थी, जिसमें कोई कथा-अंश नहीं था। अतः यहां दी गई कथा राजा प्रियव्रत-मालिनी व देवी षष्ठी की सुपरिचित पौराणिक कथा, तथा सूर्यपुत्र कर्ण व द्रौपदी से जुड़े महाभारतकालीन प्रसंगों पर आधारित है, जो अनेक हिंदी वेबसाइटों पर सुनी-सुनाई जाती है। इन्हीं प्रचलित वृत्तांतों की घटनाओं, पात्रों व क्रम के अनुरूप यह कथा है, किंतु इसका शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने।
सामान्य प्रश्न
छठ पूजा व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल चार अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
छठ पूजा व्रत कथा में देवी षष्ठी कौन हैं?
जैसा कथा में बताया गया है, देवी षष्ठी सृष्टि की मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, तथा संतानों की रक्षा करने वाली देवी मानी जाती हैं।
क्या छठ पूजा से जुड़ी एक से अधिक कथाएं हैं?
हां, राजा प्रियव्रत व देवी षष्ठी की कथा मुख्य कथा मानी जाती है, जबकि सूर्यपुत्र कर्ण की अर्घ्य-परंपरा तथा द्रौपदी के छठ व्रत की कथाएं महाभारत काल से जुड़े अतिरिक्त प्रसंग हैं, जो इसी पृष्ठ पर अलग-अलग अध्यायों में दी गई हैं।
छठ पूजा कब मनाई जाती है?
यह कार्तिक मास की शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक, चार दिनों के लिए मनाई जाती है, जिसका मुख्य दिन षष्ठी तिथि होता है।
