मुख्यत्योहारस्कंद षष्ठी
सूर संहारम् का पर्व · कार्तिक शुक्ल षष्ठी (सूर संहारम्)

स्कंद षष्ठी

स्कंद षष्ठी कार्तिक मास की शुक्ल षष्ठी को मनाया जाने वाला पर्व है, जो भगवान कार्तिकेय द्वारा असुर सूरपद्म के वध और बुराई पर विजय का स्मरण कराता है।

स्कंद षष्ठी
अगली तिथि
१५ नवम्बर २०२६

षष्ठी तिथि प्रत्येक चंद्र मास में आती है, तथा 'मासिक षष्ठी' के रूप में स्थानीय रूप से मनाई जाती है, परंतु कार्तिक मास (तमिल ऐप्पसी मास) की यह षष्ठी सबसे बड़ी व मुख्य 'स्कंद षष्ठी' मानी जाती है। यही तिथि उत्तर भारत में छठ पूजा के मुख्य संध्या अर्घ्य दिवस से भी मेल खाती है।

स्कंद षष्ठी का महत्व

पौराणिक कथा के अनुसार, असुर सूरपद्म व उसके भाई तारकासुर व सिंहमुख के अत्याचारों से त्रस्त होकर देवताओं ने भगवान शिव से सहायता मांगी। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न छह चिंगारियों से मां पार्वती ने भगवान कार्तिकेय को जन्म दिया, जो युद्ध कला में निपुण देवसेनापति बने और असुरों का संहार करने हेतु प्रकट हुए।

छह दिनों के भीषण युद्ध के पश्चात, षष्ठी तिथि को भगवान कार्तिकेय ने अपने वेल (भाले) से सूरपद्म का वध किया, जिसे 'सूर संहारम्' कहा जाता है। मान्यता है कि अंत में सूरपद्म ने आम के वृक्ष का रूप धारण किया, जिसे कार्तिकेय ने दो भागों में विभाजित कर, उन्हें अपने वाहन मोर व मुर्गे के रूप में परिवर्तित कर, अपने साथ रख लिया।

शिव चालीसा
चालीसा · कार्तिकेय के पिता भगवान शिव का पाठ

यह पर्व तमिलनाडु व दक्षिण भारत में भगवान मुरुगन (कार्तिकेय का तमिल नाम) के भक्तों द्वारा विशेष श्रद्धा से मनाया जाता है, तथा तिरुचेंदूर के मुरुगन मंदिर में सूर संहारम् का नाट्य-रूपांतरण विशेष भव्यता से प्रस्तुत किया जाता है।

स्कंद षष्ठी कैसे मनाई जाती है

भक्त षष्ठी से छह दिन पूर्व, अर्थात प्रतिपदा से, व्रत आरंभ करते हैं, जिसमें फलाहार अथवा एक समय भोजन ग्रहण किया जाता है। इन छह दिनों में भगवान मुरुगन के मंदिरों में विशेष अभिषेक व पूजा होती है।

षष्ठी के दिन मंदिरों में 'सूर संहारम्' का नाट्य-रूपांतरण प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें भगवान कार्तिकेय व असुर सूरपद्म के युद्ध तथा सूरपद्म के मोर व मुर्गे में रूपांतरण के दृश्य दिखाए जाते हैं।

सप्तमी तिथि को भगवान मुरुगन व देवसेना के विवाह का उत्सव 'तिरु कल्याणम्' मनाया जाता है, जो स्कंद षष्ठी व्रत के समापन का प्रतीक है।

स्कंद षष्ठी पूजा विधि

प्रतिपदा से षष्ठी तक छह दिन फलाहार अथवा एक समय भोजन का व्रत रखें। षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय की विशेष पूजा व अभिषेक करें, तथा संभव हो तो मुरुगन मंदिर में सूर संहारम् उत्सव में सम्मिलित हों। सप्तमी को तिरु कल्याणम् उत्सव के साथ व्रत का पारण करें।

स्कंद षष्ठी के बारे में

स्कंद षष्ठी कार्तिक मास की शुक्ल षष्ठी को मनाया जाने वाला पर्व है, जो भगवान कार्तिकेय की असुर सूरपद्म पर विजय का स्मरण कराता है। इस पृष्ठ पर इस पर्व का महत्व, छह दिन के युद्ध की कथा, तथा सूर संहारम् व तिरु कल्याणम् उत्सवों की जानकारी दी गई है।

इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

सामान्य प्रश्न

स्कंद षष्ठी कब मनाई जाती है?

मुख्य वार्षिक स्कंद षष्ठी कार्तिक मास (तमिल ऐप्पसी मास) की शुक्ल षष्ठी तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्यतः अक्टूबर-नवंबर में आती है।

सूर संहारम् क्या है?

सूर संहारम् भगवान कार्तिकेय द्वारा छह दिनों के युद्ध के पश्चात षष्ठी तिथि को असुर सूरपद्म के वध की घटना है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

भगवान कार्तिकेय के अन्य नाम क्या हैं?

भगवान कार्तिकेय को दक्षिण भारत में मुरुगन व सुब्रमण्यम्, तथा उत्तर भारत में स्कंद व षडानन (छह मुख वाले) के नाम से भी जाना जाता है।

स्कंद षष्ठी व्रत कितने दिनों का होता है?

यह व्रत षष्ठी से छह दिन पूर्व, अर्थात प्रतिपदा से आरंभ होकर, षष्ठी तिथि तक चलता है, तथा सप्तमी को तिरु कल्याणम् के साथ इसका समापन होता है।

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मुख्य जानकारी

देवताभगवान कार्तिकेय, मुरुगन, सुब्रमण्यम्
तिथिकार्तिक शुक्ल षष्ठी
विशेष अनुष्ठानछह दिन का व्रत, सूर संहारम् उत्सव
व्रत प्रकारछह दिन का फलाहार अथवा एक समय भोजन व्रत
प्रमुख स्थानतमिलनाडु (विशेषकर तिरुचेंदूर)