अध्याय १ · चारुमति को स्वप्न में मिला वरदान
कथा प्रचलित है कि प्राचीन काल में मगध राज्य के बीचोंबीच कुण्डी नामक एक नगर बसा था, जिसकी रचना स्वर्गिक कृपा से हुई मानी जाती है। यहीं एक ब्राह्मण परिवार में चारुमति नाम की स्त्री रहती थी, जो सास-ससुर व पति की निष्ठापूर्वक सेवा करते हुए तथा माता लक्ष्मी की नित्य आराधना करते हुए एक आदर्श गृहिणी का जीवन बिताती थी।
उसकी भक्ति से संतुष्ट होकर एक रात्रि स्वयं देवी लक्ष्मी उसके स्वप्न में उतरीं, तथा उसे 'वरलक्ष्मी' नामक व्रत की जानकारी दी, यह बताते हुए कि इस व्रत को करने से उसकी हर अभीष्ट कामना पूर्ण होगी।
अध्याय २ · व्रत का पूजन एवं फल-प्राप्ति
अगली सुबह जागते ही चारुमति ने पड़ोस की अन्य स्त्रियों को साथ लेकर देवी के बताए अनुसार वरलक्ष्मी व्रत की विधिवत पूजा की। पूजा पूर्ण होने पर जब सब स्त्रियां कलश के चक्कर लगाने लगीं, तो परिक्रमा करते-करते ही उन सबके शरीर पर स्वयं स्वर्ण-आभूषण प्रकट हो गए।
साथ ही उन सबके घर सोने के हो गए, और उनके आंगन में घोड़े, हाथी व गायों जैसे पशुधन की भरमार हो गई। इस चमत्कार का श्रेय सबने चारुमति को दिया, क्योंकि व्रत-विधि उसी ने बताई थी। आगे चलकर यही कथा भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई, और मान्यता है कि इसे केवल सुन लेने भर से भी देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त हो जाती है।
वरलक्ष्मी व्रत कथा पाठ विधि
श्रावण मास के अंतिम शुक्रवार को स्नान कर कलश की स्थापना करें, उस पर नारियल व वस्त्र रखकर माता वरलक्ष्मी का आवाहन करें, तथा विधिपूर्वक पूजन कर यह कथा सुनें। पूजन के पश्चात कलश की परिक्रमा कर सुहाग की सामग्री अर्पित करें।
वरलक्ष्मी व्रत कथा के बारे में
वरलक्ष्मी व्रत कथा ब्राह्मणी चारुमति को स्वप्न में देवी लक्ष्मी से वरलक्ष्मी व्रत की विधि प्राप्त होने तथा उस व्रत के पूजन से समाज की सभी स्त्रियों को समृद्धि प्राप्त होने की कथा है। इस पृष्ठ पर दो अध्याय हैं, पहले में चारुमति को स्वप्न में मिला वरदान, तथा दूसरे में व्रत के पूजन व फल-प्राप्ति की कथा है।
यह व्रत श्रावण मास के अंतिम शुक्रवार को, विशेषकर दक्षिण भारत में, माता वरलक्ष्मी के पूजन हेतु किया जाता है। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
वरलक्ष्मी व्रत कथा का कोई एक नामित रचयिता नहीं है, यह पारंपरिक रूप से भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को सुनाई गई कथा के रूप में प्रस्तुत की जाती है, तथा दक्षिण भारत में श्रावण मास के अंतिम शुक्रवार को मनाए जाने वाले वरलक्ष्मी व्रत के अवसर पर सुनी जाती है। यहां दी गई कथा इसी प्रचलित वृत्तांत की घटनाओं व क्रम के अनुरूप है, किंतु इसका शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने।
सामान्य प्रश्न
वरलक्ष्मी व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल दो अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
चारुमति को वरलक्ष्मी व्रत की जानकारी कैसे मिली?
माता लक्ष्मी चारुमति की सेवा-भक्ति से प्रसन्न होकर एक रात्रि उसे स्वप्न में दर्शन देने आईं तथा उसे वरलक्ष्मी व्रत की विधि से अवगत कराया।
वरलक्ष्मी व्रत का पूजन करने से क्या फल मिला?
व्रत का पूजन कर कलश की परिक्रमा करने पर सभी स्त्रियों के शरीर स्वर्ण आभूषणों से सज गए, उनके घर स्वर्ण के बन गए, तथा उनके यहां घोड़े, हाथी व गाय जैसे पशु भी आ गए।
वरलक्ष्मी व्रत कब मनाया जाता है?
यह व्रत श्रावण मास के अंतिम शुक्रवार को मनाया जाता है, तथा विशेषकर दक्षिण भारत में सुहागिन स्त्रियां इसे धूमधाम से करती हैं।
