महालक्ष्मी व्रत कथा
महालक्ष्मी व्रत कथा एक ब्राह्मण को मिले वरदान से महालक्ष्मी व्रत के प्रारंभ होने की कथा है, जो भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से आरंभ होने वाले सोलह दिवसीय व्रत के अवसर पर सुनी जाती है और जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

अध्याय १ · ब्राह्मण को मिला वरदान
बहुत पुरानी बात है। किसी गांव में एक ब्राह्मण निवास करता था, जो प्रतिदिन नियम से भगवान विष्णु की उपासना किया करता था। उसकी अटूट भक्ति देखकर एक दिन भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उससे कोई भी मनचाहा वर मांगने को कहा।
ब्राह्मण ने अपने घर में देवी लक्ष्मी का सदा वास रहने का वरदान चाहा। इस पर विष्णु भगवान ने रहस्य खोला, मंदिर में हर रोज़ एक स्त्री आकर कंडे थापती है, वस्तुतः वही स्वयं देवी लक्ष्मी हैं; उसे ही अपने घर बुला लो, उनके पदार्पण से तुम्हारा घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाएगा। इतना कहकर भगवान विष्णु वहीं अदृश्य हो गए।
अध्याय २ · महालक्ष्मी व्रत का प्रारंभ
दूसरे दिन भोर से ही ब्राह्मण मंदिर के आगे देवी की राह देखने बैठ गया। जैसे ही वह स्त्री कंडे थापने आई, उसने आगे बढ़कर उनसे अपने घर पधारने की प्रार्थना की।
यह सुनते ही लक्ष्मी जी भांप गईं कि यह अनुरोध विष्णु भगवान के इशारे पर ही किया जा रहा है। तब उन्होंने ब्राह्मण को सलाह दी कि वह महालक्ष्मी का व्रत रखे, सोलह दिन तक इस व्रत का पालन करने के बाद, अंतिम दिन चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करने से व्रत सम्पूर्ण माना जाएगा।
ब्राह्मण ने ठीक उसी विधि से व्रत संपन्न किया, और देवी ने भी उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण कर दीं। तभी से यह महालक्ष्मी व्रत श्रद्धापूर्वक मनाया जाने लगा।
अध्याय ३ · कुंती व गांधारी की द्वितीय कथा
महाभारत के समय की एक और घटना है, हस्तिनापुर में महालक्ष्मी व्रत के दिन रानी गांधारी ने नगरभर की स्त्रियों को अपने यहां पूजन हेतु बुलाया, किंतु कुंती को निमंत्रण नहीं भेजा। गांधारी के पुत्रों ने पूजा-सामग्री के लिए माता को मिट्टी ला दी, जिससे एक बड़ा-सा हाथी गढ़कर महल के आंगन में रख दिया गया।
नगर की स्त्रियां जब पूजा के लिए निकल पड़ीं, कुंती का मन उदास हो गया। पुत्रों के पूछने पर उन्होंने पूरी बात कह सुनाई। यह सुनकर अर्जुन बोले: माता, आप पूजा की व्यवस्था कीजिए, हाथी का प्रबंध मैं करता हूं। यह कहकर वे इंद्र देवता के पास पहुंचे और उनसे ऐरावत हाथी लेकर लौटे, जिसके बाद कुंती ने विधिवत पूजा संपन्न की।
यह खबर फैलते ही कि स्वयं इंद्र का ऐरावत कुंती के द्वार पर पूजन हेतु पहुंचा है, नगर की अन्य स्त्रियां भी वहीं उमड़ आईं और सबने मिलकर विधिपूर्वक पूजा पूर्ण की।
महालक्ष्मी व्रत कथा पाठ विधि
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से आरंभ कर सोलह दिनों तक प्रतिदिन देवी महालक्ष्मी का पूजन करें तथा सूत का सोलह गांठों वाला डोरा (मौली) बांधें। सोलहवें दिन विधिपूर्वक पूजन कर रात्रि को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।
महालक्ष्मी व्रत कथा के बारे में
महालक्ष्मी व्रत कथा एक ब्राह्मण को भगवान विष्णु से मिले वरदान, देवी लक्ष्मी को अपने घर आमंत्रित करने, तथा उनके निर्देशानुसार सोलह दिवसीय व्रत प्रारंभ होने की कथा है, साथ ही इसमें कुंती व गांधारी से जुड़ी एक दूसरी कथा भी दी गई है। इस पृष्ठ पर तीन अध्याय हैं, पहले में ब्राह्मण को मिला वरदान, दूसरे में महालक्ष्मी व्रत के प्रारंभ की कथा, तथा तीसरे में कुंती-गांधारी की द्वितीय कथा है।
यह व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल अष्टमी से आरंभ होकर सोलह दिनों तक चलता है, और अंतिम दिन चंद्रमा को अर्घ्य देकर पूर्ण किया जाता है। इस पृष्ठ पर दोनों कथाओं का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
महालक्ष्मी व्रत कथा का कोई एक नामित रचयिता नहीं है, यह पारंपरिक रूप से भविष्योत्तर पुराण से संबद्ध मानी जाती है, तथा भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से आरंभ होने वाले सोलह दिवसीय महालक्ष्मी व्रत के अवसर पर सुनी जाती है। इस पृष्ठ पर दी गई कथा इसी प्रचलित वृत्तांत की घटनाओं व क्रम के अनुरूप है, किंतु इसका शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने। इसी वृत्तांत में ब्राह्मण-वरदान की कथा के साथ कुंती-गांधारी से जुड़ी एक दूसरी कथा भी 'द्वितीय कथा' के नाम से प्रचलित है, जिसे यहां तीसरे अध्याय के रूप में रखा गया है।
सामान्य प्रश्न
महालक्ष्मी व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल तीन अध्याय हैं, ब्राह्मण को मिला वरदान, महालक्ष्मी व्रत का प्रारंभ, तथा कुंती-गांधारी की द्वितीय कथा, जो एक साथ पढ़े या सुने जाते हैं।
महालक्ष्मी व्रत कब आरंभ होता है?
यह व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल अष्टमी से आरंभ होकर सोलह दिनों तक चलता है, तथा अंतिम दिन चंद्रमा को अर्घ्य देकर पूर्ण किया जाता है।
ब्राह्मण ने देवी लक्ष्मी को कैसे पहचाना?
भगवान विष्णु ने ब्राह्मण को बताया था कि जो स्त्री प्रतिदिन मंदिर में गोबर के उपले थापने आती है, वही स्वयं देवी लक्ष्मी हैं, इसी पहचान के आधार पर ब्राह्मण ने उन्हें अपने घर आमंत्रित किया।
कुंती की द्वितीय कथा में अर्जुन ने क्या किया?
जब गांधारी ने कुंती को महालक्ष्मी पूजन में आमंत्रित नहीं किया, तो कुंती की उदासी दूर करने के लिए अर्जुन इंद्रदेव के पास गए और अपनी माता के पूजन हेतु ऐरावत हाथी को ले आए, जिससे कुंती ने विधिपूर्वक पूजन संपन्न किया।