मुख्यकथागंगा दशहरा व्रत कथा

गंगा दशहरा व्रत कथा

गंगा दशहरा व्रत कथा राजा सगर के पुत्रों के भस्म होने तथा उनके वंशज भगीरथ की तपस्या से मां गंगा के स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण की कथा है, जो ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को सुनी जाती है और जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

गंगा दशहरा व्रत कथा
अध्याय/

अध्याय · राजा सगर का यज्ञ एवं पुत्रों का भस्म होना

प्राचीन काल में अयोध्या के राजा सगर ने एक भव्य अश्वमेध यज्ञ करवाया, और उसकी संपूर्ण व्यवस्था अपने पौत्र अंशुमान को सौंप दी। यज्ञ में विघ्न डालने की मंशा से देवराज इंद्र यज्ञ के अश्व को चुराकर पाताल लोक ले गए, और उसे वहां तपस्यारत कपिल मुनि के आश्रम के निकट बांध आए।

अश्व को ढूंढते हुए राजा सगर के हज़ारों पुत्र पृथ्वी खोदते-खोदते अंततः पाताल लोक जा पहुंचे, जहां उन्हें अपना घोड़ा कपिल मुनि के आश्रम के पास बंधा मिला। इस पर उन्होंने बिना सोचे-समझे मुनि पर ही चोरी का आरोप लगाकर उन्हें अपमानित करने का प्रयास किया, जिससे उनकी गहन तपस्या भंग हो गई। क्रोध में भरकर जैसे ही मुनि ने अपनी आंखें खोलीं, उनकी क्रोधाग्नि से सगर के वे सभी हज़ारों पुत्र क्षणभर में जलकर भस्म हो गए।

इधर, घोड़े की तलाश में स्वयं अंशुमान भी पाताल लोक पहुंचे, जहां भगवान गरुड़ ने उन्हें अपने चाचाओं की इस दुर्दशा की सूचना दी। साथ ही गरुड़जी ने यह भी स्पष्ट किया कि उन भस्म हो चुकी आत्माओं को मुक्ति केवल स्वर्गलोक की गंगा के पवित्र जल से स्पर्श होने पर ही मिल सकती है। यह सुनकर अंशुमान यज्ञ का घोड़ा लेकर लौट आए और सारा वृत्तांत राजा सगर को कह सुनाया।

अध्याय · अंशुमान व दिलीप के असफल प्रयास

यज्ञ पूर्ण होने के बाद राजा सगर ने स्वयं गंगा को पृथ्वी पर लाने का भरसक प्रयत्न किया, किंतु सफलता न मिली। उनके बाद पौत्र अंशुमान और फिर अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी इस दिशा में कठिन प्रयास किए, परंतु वे भी अपने पूर्वजों को यह मुक्ति नहीं दिला सके।

अध्याय · भगीरथ की तपस्या एवं गंगा का अवतरण

अंततः राजा दिलीप के पुत्र भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के संकल्प के साथ वर्षों तक अत्यंत कठोर तप किया। इस तपस्या से प्रसन्न होकर देवी गंगा प्रकट हुईं और भगीरथ से वरदान मांगने को कहा। भगीरथ ने उनसे पृथ्वी पर पधारकर अपने पूर्वजों की आत्माओं को तार देने की प्रार्थना की, जिसे गंगा ने स्वीकार तो कर लिया, परंतु यह चेतावनी भी दी कि यदि वे सीधे स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरीं, तो उनके प्रचंड वेग को यह धरती सहन नहीं कर पाएगी।

इस कठिनाई के समाधान हेतु गंगा ने भगीरथ को भगवान शिव की आराधना करने की सलाह दी। भगीरथ पुनः शिव-भक्ति में लीन हो गए, जिससे प्रसन्न होकर स्वयं महादेव ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और वर मांगने को कहा। भगीरथ ने अपनी समस्या उनके समक्ष रखी, तो महादेव ने गंगा को अपनी विशाल जटाओं में समेट लेने का उपाय सुझाया। उनकी जटाओं में उतरकर गंगा का वेग शांत हो गया, और फिर शिवजी ने अपनी एक जटा खोलकर उन्हें सात धाराओं में विभाजित कर पृथ्वी पर प्रवाहित कर दिया।

इस प्रकार भगीरथ के अथक प्रयास व तप से मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं, तथा राजा सगर के हज़ारों पुत्रों की आत्माओं को अंततः मुक्ति प्राप्त हुई। भगीरथ के इसी अद्वितीय पुरुषार्थ के कारण गंगा को पृथ्वी पर 'भागीरथी' नाम से भी जाना जाता है।

इसी देवता की आरती
श्री गंगा आरती
आरती पढ़ें

गंगा दशहरा व्रत कथा पाठ विधि

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को संभव हो तो गंगा तट पर जाकर स्नान करें, अन्यथा घर पर जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। मां गंगा की आरती व पूजा कर यह कथा सुनें, दस वस्तुओं का दान करें, तथा दिनभर फलाहार व्रत रखें।

पाठ दिवस
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (गंगा दशहरा)
आगे पढ़ें · Next
गंगा आरती
आरती
पाठ खोलें →

गंगा दशहरा व्रत कथा के बारे में

गंगा दशहरा व्रत कथा राजा सगर के हज़ारों पुत्रों के कपिल मुनि के क्रोध से भस्म होने, अंशुमान व दिलीप के असफल प्रयासों, तथा अंततः भगीरथ की कठोर तपस्या से मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा है। इस पृष्ठ पर तीन अध्याय हैं, पहले में राजा सगर का यज्ञ व पुत्रों का भस्म होना, दूसरे में अंशुमान व दिलीप के असफल प्रयास, तथा तीसरे में भगीरथ की तपस्या व गंगा के अवतरण की कथा है।

यह कथा ज्येष्ठ मास की शुक्ल दशमी, अर्थात गंगा दशहरा के दिन, मां गंगा के स्नान-पूजन के समय सुनी जाती है। इस पृष्ठ पर तीनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

गंगा दशहरा व्रत कथा का कोई एक नामित रचयिता नहीं है, यह राजा सगर के पुत्रों के भस्म होने तथा भगीरथ की तपस्या से गंगावतरण की सुपरिचित पौराणिक कथा है, जो रामायण, महाभारत तथा अनेक पुराणों में वर्णित है, और गंगा दशहरा के अवसर पर सुनी जाती है। यहां दी गई कथा इसी सुपरिचित वृत्तांत की घटनाओं व क्रम के अनुरूप है, किंतु इसका शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने।

रचनाकार
अज्ञात
पौराणिक कथा (गंगावतरण की परंपरा)

सामान्य प्रश्न

गंगा दशहरा व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?

इसमें कुल तीन अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।

राजा सगर के पुत्र भस्म क्यों हुए?

यज्ञ के चुराए गए अश्व की खोज में सगर के पुत्रों ने पाताल लोक में तपस्यारत कपिल मुनि पर ही चोरी का आरोप लगाकर उनकी तपस्या भंग कर दी, जिससे क्रोधित मुनि की क्रोधाग्नि से वे सभी भस्म हो गए।

भगीरथ को गंगा लाने में सफलता कैसे मिली?

भगीरथ ने पहले देवी गंगा को, फिर भगवान शिव को अपनी कठोर तपस्या से प्रसन्न किया। शिवजी ने गंगा को अपनी जटाओं में समेटकर उनके प्रचंड वेग को शांत किया, तथा फिर सात धाराओं में विभाजित कर पृथ्वी पर प्रवाहित कर दिया।

गंगा को 'भागीरथी' नाम से क्यों जाना जाता है?

राजा भगीरथ के अथक प्रयास व तपस्या से ही मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं, इसीलिए उनके सम्मान में गंगा को 'भागीरथी' नाम से भी जाना जाता है।

संबंधित खोज

पाठ विवरण

रचनाकारअज्ञात
संरचना३ अध्याय
पाठ समय४ मिनट