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कार्यों में विजय-प्राप्ति का व्रत · फाल्गुन कृष्ण एकादशी

विजया एकादशी

विजया एकादशी फाल्गुन मास की कृष्ण एकादशी को मनाई जाती है, तथा इसे कार्यों में विजय-प्राप्ति की कामना से रखा जाता है।

विजया एकादशी
अगली तिथि
४ मार्च २०२७

यह एकादशी महाशिवरात्रि से कुछ दिन पूर्व आती है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।

विजया एकादशी का महत्व

पद्म पुराण में यह कथा ब्रह्मा जी नारद को सुनाते हैं। सीता हरण के बाद जब श्रीराम वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुंचे, तो उन्होंने लक्ष्मण से पूछा कि इस अगाध और भयंकर जलजंतुओं से भरे समुद्र को किस पुण्य से पार किया जा सकता है। लक्ष्मण ने बताया कि यहां से आधे योजन पर, द्वीप के भीतर, बकदाल्भ्य मुनि का आश्रम है, उन्हीं से उपाय पूछना चाहिए।

राम चालीसा
चालीसा · विजया एकादशी पूजन में पाठ

बकदाल्भ्य मुनि ने श्रीराम को पहचान लिया और फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का व्रत बताया। इसकी विधि यह है: दशमी को सोने, चांदी, तांबे या मिट्टी का कलश जल और पल्लव से भरकर स्थापित करें, उस पर भगवान नारायण की स्वर्ण प्रतिमा रखें। एकादशी को कलश पर सप्तधान्य और जौ रखकर गंध, धूप, दीप और नैवेद्य से पूजन करें, दिन कथा-वार्ता में बिताएं और रात को जागरण करें। द्वादशी को सूर्योदय पर कलश को नदी, झरने या पोखर के तट पर ले जाकर पूजें और प्रतिमा सहित वेदवेत्ता ब्राह्मण को दान कर दें।

मुनि के कहने पर श्रीराम ने अपने यूथपतियों के साथ यह व्रत किया, और उसके प्रभाव से वे विजयी हुए: उन्होंने संग्राम में रावण को मारा, लंका पर विजय पाई और सीता जी को प्राप्त किया। इसी कारण इस एकादशी का नाम 'विजया' है। पुराण के अनुसार इस प्रसंग को पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।

विजया एकादशी कैसे मनाई जाती है

भक्तगण इस दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं, तथा दिनभर फलाहार अथवा निर्जला व्रत रखते हैं। भगवान विष्णु का पूजन कर विजया एकादशी की कथा का श्रवण किया जाता है।

इस व्रत की विशेष विधि कलश पूजन है: दशमी को जल भरा कलश स्थापित कर उस पर भगवान नारायण की प्रतिमा रखी जाती है, एकादशी को उसका पूजन और रात में जागरण होता है, और द्वादशी को कलश किसी जलाशय के तट पर पूजकर ब्राह्मण को दान कर दिया जाता है।

ॐ जय जगदीश हरे आरती
आरती · एकादशी पूजन में गाई जाने वाली आरती

अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में व्रत का पारण किया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से उन भक्तों द्वारा रखा जाता है जो किसी महत्वपूर्ण कार्य, परीक्षा अथवा प्रतियोगिता में विजय-प्राप्ति की कामना रखते हैं।

विजया एकादशी पूजा विधि

दशमी को जल, पल्लव और भगवान नारायण की प्रतिमा सहित कलश स्थापित करें। एकादशी को प्रातः स्नान कर कलश पर सप्तधान्य व जौ रखें, गंध, धूप, दीप व नैवेद्य से पूजन करें, कथा सुनें और रात में जागरण करें। द्वादशी को सूर्योदय पर कलश को जलाशय के तट पर पूजकर ब्राह्मण को दान करें, फिर व्रत का पारण करें।

विजया एकादशी व्रत कथा पढ़ें
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विजया एकादशी के बारे में

विजया एकादशी फाल्गुन मास की कृष्ण एकादशी को कार्यों में विजय-प्राप्ति की कामना से रखा जाने वाला व्रत है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, भगवान श्रीराम की लंका विजय की कथा, तथा व्रत-विधि की जानकारी दी गई है।

सामान्य प्रश्न

विजया एकादशी कब मनाई जाती है?

यह व्रत प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण एकादशी तिथि को, महाशिवरात्रि से कुछ दिन पूर्व मनाया जाता है।

विजया एकादशी भगवान श्रीराम से कैसे जुड़ी है?

समुद्र पार करने का उपाय न मिलने पर, लक्ष्मण के सुझाव पर श्रीराम बकदाल्भ्य मुनि के आश्रम गए। मुनि के बताने पर उन्होंने अपने यूथपतियों के साथ विजया एकादशी का व्रत किया, और उसके प्रभाव से रावण को मारकर लंका पर विजय पाई व सीता जी को प्राप्त किया।

विजया एकादशी को यह नाम क्यों दिया गया?

इस व्रत के प्रभाव से भगवान श्रीराम को लंका पर विजय प्राप्त हुई थी, इसी कारण इस एकादशी का नाम 'विजया' अर्थात 'विजय देने वाली' एकादशी पड़ा।

विजया एकादशी व्रत किसे रखना चाहिए?

यह व्रत विशेष रूप से वे भक्त रखते हैं जो किसी महत्वपूर्ण कार्य, परीक्षा, प्रतियोगिता अथवा जीवन के बड़े लक्ष्य में विजय-प्राप्ति की कामना रखते हैं।

संबंधित खोज

मुख्य जानकारी

देवताभगवान विष्णु, भगवान श्रीराम
तिथिफाल्गुन कृष्ण एकादशी
महत्वकार्यों में विजय-प्राप्ति
संबंधित प्रसंगश्रीराम की लंका विजय
व्रत प्रकारफलाहार व्रत, द्वादशी को पारण