षटतिला एकादशी
षटतिला एकादशी माघ मास की कृष्ण एकादशी को मनाई जाती है, जिसमें तिल के छह प्रकार से प्रयोग करने की विशेष परंपरा है, तथा इसे दान के महत्व की शिक्षा देने वाला व्रत माना जाता है।

यह एकादशी सकट चौथ के कुछ दिन पश्चात व वसंत पंचमी से कुछ दिन पूर्व आती है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।
षटतिला एकादशी का महत्व
पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को षटतिला की वह पापहारिणी कथा सुनाते हैं, जो मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्य ने दाल्भ्य को सुनाई थी। दाल्भ्य ने पूछा था कि मृत्युलोक में आए प्राणी प्रायः पाप करते हैं, उन्हें नरक में न जाना पड़े, इसका क्या उपाय है। पुलस्त्य जी ने माघ कृष्ण एकादशी का यह व्रत बताया।
पुलस्त्य जी के अनुसार माघ आने पर काम, क्रोध, अहंकार, लोभ और चुगली छोड़कर, भूमि पर पड़े गोबर में तिल और कपास मिलाकर एक सौ आठ पिंडिकाएं बनाई जाती हैं। आर्द्रा या मूल नक्षत्र आने पर व्रत का नियम लिया जाता है, भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेते हुए कुम्हड़े, नारियल या बिजौरे से अर्घ्य दिया जाता है, रात में जागरण और होम होता है, और ब्राह्मण को जल का घड़ा, छाता, जूता, वस्त्र, काली गौ और तिल से भरा पात्र दान किया जाता है।
इस व्रत का नाम तिल के छह उपयोगों से पड़ा: तिल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से होम, तिल मिला जल पीना, तिल का दान और तिल का भोजन। इसके बाद नारद के पूछने पर श्रीकृष्ण एक ब्राह्मणी की कथा सुनाते हैं, जो बहुत व्रत करती थी पर अन्न दान नहीं करती थी। भगवान स्वयं कपाली बनकर उससे भिक्षा मांगने गए, तो उसने मिट्टी का ढेला दे दिया। स्वर्ग पहुंचकर उसे अन्न से खाली घर मिला, और देवियों से षट्तिला व्रत जानकर करने पर ही वह घर धन-धान्य से भरा।
षटतिला एकादशी कैसे मनाई जाती है
इस व्रत में तिल का छह प्रकार से प्रयोग करने की विशेष परंपरा है, तिल मिश्रित जल से स्नान, शरीर पर तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल मिश्रित जल का पान, तिल का दान, तथा तिल से बने पदार्थों का सेवन।
भक्तगण प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं, भगवान विष्णु का पूजन कर षटतिला एकादशी की कथा का श्रवण करते हैं, तथा निर्धनों को यथाशक्ति अन्न, वस्त्र व तिल का दान करते हैं।
अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में व्रत का पारण किया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से इस शिक्षा को स्मरण कराता है कि केवल पूजा-भक्ति ही नहीं, अपितु दान भी धर्म का एक अनिवार्य अंग है।
षटतिला एकादशी पूजा विधि
प्रातःकाल तिल मिश्रित जल से स्नान करें तथा व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु का पूजन कर षटतिला एकादशी की कथा सुनें। तिल का हवन करें, तिल मिश्रित जल पीएं, तथा निर्धनों को अन्न-वस्त्र व तिल का दान करें। अगले दिन द्वादशी को व्रत का पारण करें।
षटतिला एकादशी के बारे में
षटतिला एकादशी माघ मास की कृष्ण एकादशी को तिल के छह प्रकार के प्रयोग व दान के महत्व की शिक्षा हेतु रखा जाने वाला व्रत है। इस पृष्ठ पर पद्म पुराण के अनुसार इस व्रत का महत्व, पुलस्त्य-दाल्भ्य संवाद में बताई गई विधि, तिल के छह उपयोग और ब्राह्मणी की कथा दी गई है।
सामान्य प्रश्न
षटतिला एकादशी कब मनाई जाती है?
यह व्रत प्रत्येक वर्ष माघ मास की कृष्ण एकादशी तिथि को मनाया जाता है।
षटतिला एकादशी में तिल के कौन-से छह प्रयोग किए जाते हैं?
तिल मिश्रित जल से स्नान, शरीर पर तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल मिश्रित जल का पान, तिल का दान, तथा तिल से बने पदार्थों का सेवन, ये छह प्रयोग इस व्रत में किए जाते हैं।
षटतिला एकादशी की कथा किसने सुनाई थी?
पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि इसकी विधि मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्य ने दाल्भ्य को बताई थी, जब दाल्भ्य ने पूछा कि पापी प्राणी नरक से कैसे बचें। फिर नारद के पूछने पर श्रीकृष्ण स्वयं दान न करने वाली ब्राह्मणी की कथा सुनाते हैं।
षटतिला एकादशी व्रत की मुख्य शिक्षा क्या है?
यह व्रत सिखाता है कि केवल पूजा-भक्ति करना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु यथाशक्ति दान करना भी धर्म का एक अनिवार्य व अभिन्न अंग है।