शरद पूर्णिमा (कोजागरी पूजन)
शरद पूर्णिमा आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला पर्व है, जिस रात्रि मां लक्ष्मी के पूजन तथा चंद्रमा की अमृत-वर्षा जैसी किरणों का विशेष महत्व माना जाता है।

इसी तिथि को बंगाल व ओडिशा में 'कोजागरी लक्ष्मी पूजा' के नाम से दुर्गा पूजा के तुरंत पश्चात भव्यता से मनाया जाता है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।
शरद पूर्णिमा (कोजागरी पूजन) का महत्व
'कोजागरी' शब्द 'को जागर्ति' से बना है, जिसका अर्थ है 'कौन जाग रहा है'। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि मां लक्ष्मी स्वयं पृथ्वी पर विचरण करती हुई यही प्रश्न पूछती हैं, तथा जो भक्त इस रात्रि जागकर उनकी उपासना करते हैं, उन्हें धन-समृद्धि का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसी कारण इस रात्रि जागरण कर मां लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा है।
मान्यता है कि इसी रात्रि भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के संग महारास की लीला रची थी, जिसमें उन्होंने स्वयं को उतने ही स्वरूपों में विस्तारित किया जितनी गोपियां थीं, ताकि प्रत्येक गोपी को उनका एकांत सान्निध्य अनुभव हो। यह लीला आत्मा की परमात्मा से मिलन की चाह का सबसे उत्कृष्ट प्रतीक मानी जाती है।
शरद पूर्णिमा के चंद्रमा को वर्ष का सर्वाधिक तेजस्वी व अमृत-तुल्य किरणों वाला माना जाता है। इसी मान्यता के अनुसार इस रात्रि खीर बनाकर खुले आकाश के नीचे चांदनी में रखी जाती है, तथा अगली सुबह प्रसाद स्वरूप ग्रहण की जाती है, जिसे स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है।
शरद पूर्णिमा (कोजागरी पूजन) कैसे मनाई जाती है
इस रात्रि भक्त जागरण करते हुए मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं, तथा लक्ष्मी चालीसा व लक्ष्मी सूक्त का पाठ करते हैं। श्वेत वस्त्र धारण कर चंद्रमा की चांदनी में बैठकर भजन-कीर्तन करने की भी परंपरा है।
दूध व चावल से बनी खीर को रात्रिभर चांदनी में रखा जाता है, तथा अगली सुबह परिवार सहित प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है। वृंदावन व ब्रज क्षेत्र में इस रात्रि मंदिरों में विशेष रासलीला का आयोजन होता है।
बंगाल व ओडिशा में इसी तिथि को दुर्गा पूजा के तुरंत पश्चात 'कोजागरी लक्ष्मी पूजा' भव्यता से मनाई जाती है, जिसमें घरों व पंडालों में विशेष रूप से मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है।
शरद पूर्णिमा (कोजागरी पूजन) पूजा विधि
संध्या समय स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण करें। मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करें तथा लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें। दूध-चावल की खीर बनाकर रात्रिभर चांदनी में रखें। रात्रि जागरण करते हुए भजन-कीर्तन करें, तथा अगली सुबह खीर का प्रसाद ग्रहण करें।
शरद पूर्णिमा (कोजागरी पूजन) के बारे में
शरद पूर्णिमा आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला पर्व है, जो मां लक्ष्मी के पूजन तथा चंद्रमा की विशेष किरणों के महत्व से जुड़ा है। इस पृष्ठ पर इस पर्व का महत्व, कोजागरी नाम की कथा, भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला, तथा खीर को चांदनी में रखने की परंपरा की जानकारी दी गई है।
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सामान्य प्रश्न
शरद पूर्णिमा कब मनाई जाती है?
शरद पूर्णिमा प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्यतः अक्टूबर में आती है।
कोजागरी नाम का अर्थ क्या है?
'कोजागरी' का अर्थ है 'कौन जाग रहा है', जो मां लक्ष्मी के इस रात्रि पृथ्वी पर विचरण कर यही प्रश्न पूछने की मान्यता को दर्शाता है।
शरद पूर्णिमा को खीर चांदनी में क्यों रखी जाती है?
मान्यता है कि इस रात्रि चंद्रमा की किरणें अमृत के समान गुणकारी होती हैं, इसीलिए खीर को रात्रिभर चांदनी में रखकर अगली सुबह स्वास्थ्यवर्धक प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है।
कोजागरी लक्ष्मी पूजा कहां विशेष रूप से मनाई जाती है?
कोजागरी लक्ष्मी पूजा बंगाल व ओडिशा में दुर्गा पूजा के तुरंत पश्चात विशेष भव्यता से मनाई जाती है।