पूजा प्रायः संध्या समय की जाती है, क्योंकि भगवान नृसिंह गोधूलि बेला (दिन व रात्रि के संधिकाल) में प्रकट हुए थे। सटीक मुहूर्त हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।
नृसिंह जयंती का महत्व
असुरराज हिरण्यकश्यप ने कठोर तप कर ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त किया था कि उसकी मृत्यु न तो मनुष्य से हो, न पशु से, न दिन में, न रात्रि में, न घर के भीतर, न बाहर, न भूमि पर, न आकाश में, तथा न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से, इस वरदान से वह स्वयं को अजेय समझने लगा।
हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद बाल्यकाल से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था, जिससे क्रुद्ध होकर हिरण्यकश्यप ने उसे अनेक यातनाएं दीं, किंतु प्रह्लाद की भक्ति अडिग रही। अंततः क्रोधित हिरण्यकश्यप ने पूछा कि उसका विष्णु कहां है, तो प्रह्लाद ने कहा कि वे कण-कण में विद्यमान हैं, यहां तक कि इस खंभे में भी।
हिरण्यकश्यप ने क्रोध में खंभे पर प्रहार किया, और उसी क्षण भगवान विष्णु ने नर-सिंह (आधा मनुष्य, आधा सिंह) के रूप में उस खंभे से प्रकट होकर, गोधूलि बेला (न दिन, न रात्रि) में, द्वार की देहली पर (न घर के भीतर, न बाहर) बैठकर, अपनी जांघों पर रखकर (न भूमि पर, न आकाश में), अपने नखों से (न किसी अस्त्र-शस्त्र से) हिरण्यकश्यप का वध किया, तथा वरदान की हर शर्त को इस प्रकार पूर्ण करते हुए भी उसका अंत कर दिया।
नृसिंह जयंती कैसे मनाई जाती है
भक्तगण इस दिन प्रातःकाल से संध्या तक व्रत रखते हैं, तथा संध्या समय भगवान नृसिंह की प्रतिमा अथवा चित्र का पूजन कर नृसिंह स्तोत्र व नृसिंह कवच का पाठ करते हैं, जिन्हें भय व संकट का नाश करने वाला माना जाता है।
मंदिरों में विशेष अभिषेक व आरती का आयोजन किया जाता है, तथा भक्त प्रह्लाद की भक्ति व भगवान की रक्षक शक्ति के स्मरण में कथा-श्रवण भी किया जाता है। दक्षिण भारत, विशेषकर आंध्र प्रदेश व तेलंगाना में यह पर्व विशेष भव्यता से मनाया जाता है।
व्रत का पारण संध्या पूजन के पश्चात किया जाता है, तथा भगवान नृसिंह को समर्पित प्रसाद परिवार सहित ग्रहण किया जाता है। यह दिन विशेष रूप से भय, शत्रु-बाधा व संकट से मुक्ति की कामना हेतु मनाया जाता है।
नृसिंह जयंती पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर दिनभर व्रत रखें। संध्या समय भगवान नृसिंह की प्रतिमा अथवा चित्र का पूजन करें, नृसिंह स्तोत्र व नृसिंह कवच का पाठ करें। पूजा के पश्चात आरती कर प्रसाद ग्रहण करते हुए व्रत का पारण करें।
नृसिंह जयंती के बारे में
नृसिंह जयंती वैशाख मास की शुक्ल चतुर्दशी को भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। इस पृष्ठ पर इस दिवस का महत्व, भक्त प्रह्लाद व हिरण्यकश्यप की कथा, तथा पूजन विधि की जानकारी दी गई है।
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सामान्य प्रश्न
नृसिंह जयंती कब मनाई जाती है?
नृसिंह जयंती प्रत्येक वर्ष वैशाख मास की शुक्ल चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है।
भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध कैसे किया?
हिरण्यकश्यप को वरदान था कि उसकी मृत्यु न मनुष्य से, न पशु से, न दिन में, न रात्रि में, न घर के भीतर, न बाहर, न भूमि पर, न आकाश में, तथा न किसी अस्त्र-शस्त्र से हो, भगवान नृसिंह ने आधा मनुष्य-आधा सिंह रूप में, गोधूलि बेला में, देहली पर, अपनी जांघों पर रखकर, नखों से उसका वध कर इस वरदान की हर शर्त पूर्ण करते हुए भी उसका अंत कर दिया।
नृसिंह अवतार दशावतार में किस क्रम पर है?
नृसिंह अवतार भगवान विष्णु के दस अवतारों (दशावतार) में चौथा अवतार है, जो वराह अवतार के पश्चात व वामन अवतार से पूर्व आता है।
नृसिंह जयंती की पूजा संध्या समय ही क्यों की जाती है?
भगवान नृसिंह गोधूलि बेला, अर्थात दिन व रात्रि के संधिकाल में प्रकट हुए थे, इसीलिए उनकी पूजा भी परंपरागत रूप से संध्या समय की जाती है।
