मुख्यत्योहारगुड़ी पड़वा (उगादि)
हिंदू नववर्ष का पहला दिन · चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

गुड़ी पड़वा (उगादि)

गुड़ी पड़वा चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाने वाला महाराष्ट्र व गोवा का नववर्ष पर्व है, जिसे आंध्र प्रदेश, तेलंगाना व कर्नाटक में उगादि के नाम से मनाया जाता है।

गुड़ी पड़वा (उगादि)
अगली तिथि
७ अप्रैल २०२७

यही तिथि चैत्र नवरात्रि की प्रतिपदा (घटस्थापना) भी है, तथा इसी दिन से हिंदू नववर्ष अर्थात विक्रम संवत व शालिवाहन शक संवत का आरंभ भी माना जाता है। सटीक मुहूर्त हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।

गुड़ी पड़वा (उगादि) का महत्व

मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना आरंभ की थी, अतः चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि का प्रथम दिवस माना जाता है। इसी तिथि से हिंदू पंचांग का नववर्ष, अर्थात चैत्र मास व विक्रम संवत का आरंभ भी होता है।

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चालीसा · नववर्ष पूजन में पाठ

महाराष्ट्र व गोवा में इसे 'गुड़ी पड़वा' कहा जाता है, जिसमें 'गुड़ी' एक विजय-ध्वज का प्रतीक है, कहा जाता है कि इसी दिन राजा शालिवाहन ने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी, तथा प्रजा ने घर-घर गुड़ी सजाकर उनका स्वागत किया था, जिससे शालिवाहन शक संवत का आरंभ भी इसी दिन माना जाता है।

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना व कर्नाटक में इसे 'उगादि' कहा जाता है, जो संस्कृत के 'युग' (काल) व 'आदि' (आरंभ) शब्दों से बना है, अर्थात नए युग का आरंभ। यही तिथि चैत्र नवरात्रि की प्रतिपदा भी है, अतः अनेक घरों में इसी दिन घटस्थापना भी की जाती है।

गुड़ी पड़वा (उगादि) कैसे मनाई जाती है

महाराष्ट्र व गोवा में घरों के मुख्य द्वार पर बांस की लंबी छड़ी में रेशमी वस्त्र, नीम की पत्तियां, आम के पत्तों की माला, फूलों का हार तथा उल्टा तांबे अथवा चांदी का लोटा बांधकर 'गुड़ी' सजाई जाती है, तथा उसकी पूजा की जाती है।

इस दिन नीम की पत्तियों, गुड़ व अन्य सामग्री से बना प्रसाद ग्रहण किया जाता है, जो जीवन के सुख-दुःख दोनों को सहजता से स्वीकारने का प्रतीक माना जाता है। आंध्र-कर्नाटक में इसी भाव से 'उगादि पचड़ी' बनाई जाती है, जिसमें नीम, गुड़, इमली, कच्चा आम व मिर्च, सभी छह रसों का सम्मिश्रण होता है।

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चालीसा · घटस्थापना के साथ पाठ

घरों में रंगोली सजाई जाती है, नए वस्त्र पहने जाते हैं, तथा पंचांग-श्रवण की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें नए वर्ष के ग्रह-नक्षत्रों व मौसम का फलादेश सुना जाता है। कई स्थानों पर शोभा यात्राएं भी निकाली जाती हैं।

गुड़ी पड़वा (उगादि) पूजा विधि

प्रातःकाल स्नान कर नए वस्त्र धारण करें। घर के मुख्य द्वार पर बांस की छड़ी में रेशमी वस्त्र, नीम की पत्तियां व फूलों की माला बांधकर उल्टा लोटा रखकर गुड़ी सजाएं तथा उसका पूजन करें। नीम की पत्तियों व गुड़ से बना प्रसाद ग्रहण करें, तथा नए वर्ष का पंचांग-श्रवण करें।

गुड़ी पड़वा (उगादि) के बारे में

गुड़ी पड़वा चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाने वाला महाराष्ट्र-गोवा का नववर्ष पर्व है, जिसे आंध्र-तेलंगाना-कर्नाटक में उगादि के नाम से मनाया जाता है। इस पृष्ठ पर इस पर्व का महत्व, गुड़ी सजाने की परंपरा, तथा शालिवाहन शक संवत के आरंभ की जानकारी दी गई है।

इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

सामान्य प्रश्न

गुड़ी पड़वा कब मनाई जाती है?

गुड़ी पड़वा प्रत्येक वर्ष चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है, यही तिथि चैत्र नवरात्रि की प्रतिपदा भी है।

गुड़ी पड़वा व उगादि में क्या अंतर है?

दोनों एक ही तिथि व एक ही अवसर पर मनाए जाते हैं, महाराष्ट्र व गोवा में इसे गुड़ी पड़वा कहा जाता है, जबकि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना व कर्नाटक में इसे उगादि के नाम से मनाया जाता है।

गुड़ी क्या होती है?

गुड़ी बांस की छड़ी पर रेशमी वस्त्र, नीम की पत्तियां, फूलों की माला व उल्टा तांबे अथवा चांदी का लोटा बांधकर बनाई गई एक विजय-ध्वज है, जिसे घर के मुख्य द्वार पर सजाकर पूजा जाता है।

उगादि पचड़ी क्या है?

उगादि पचड़ी नीम, गुड़, इमली, कच्चे आम व मिर्च के मिश्रण से बना एक विशेष व्यंजन है, जो जीवन के छह रसों, मीठा, कड़वा, खट्टा, नमकीन, तीखा व कसैला, का प्रतीक है।

इसी तिथि को यह पर्व भी

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मुख्य जानकारी

देवताब्रह्मा जी, मां दुर्गा
तिथिचैत्र शुक्ल प्रतिपदा
विशेष अनुष्ठानगुड़ी लगाना, उगादि पचड़ी का सेवन
क्षेत्रमहाराष्ट्र, गोवा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक
महत्वहिंदू नववर्ष का शुभारंभ