गौरी-शिव पूजन का पर्व · चैत्र शुक्ल तृतीया

गणगौर

गणगौर चैत्र मास की शुक्ल तृतीया को संपन्न होने वाला पर्व है, जो होली के अगले दिन से आरंभ होकर लगभग सोलह-अठारह दिनों तक चलता है, तथा माता गौरी व भगवान शिव के मिलन के स्मरण में मनाया जाता है।

गणगौर
अगली तिथि
९ अप्रैल २०२७

गणगौर का अनुष्ठान होली के अगले दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से आरंभ होकर चैत्र शुक्ल तृतीया, अर्थात गुड़ी पड़वा व चैत्र नवरात्रि के आरंभ के कुछ दिन पश्चात, संपन्न होता है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।

गणगौर का महत्व

गणगौर नाम 'गण' (भगवान शिव का एक नाम) और 'गौर' (माता पार्वती का एक स्वरूप) से मिलकर बना है। मान्यता है कि होली की अग्नि में भस्म होकर माता पार्वती ने पुनः जन्म लिया, तथा भगवान शिव से मिलन हेतु कठोर तप किया, जिसके पश्चात दोनों का पुनर्मिलन हुआ, इसी मिलन के उत्सव के रूप में गणगौर मनाई जाती है।

गणगौर व्रत कथा
कथा · सुहाग-रस व शिव-वरदान की कथा

अविवाहित कन्याएं एक सुयोग्य वर की कामना से तथा विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु व सुखी दांपत्य जीवन की कामना से यह व्रत रखती हैं, तथा माता गौरी को अपना आदर्श मानते हुए उनकी भांति अटूट सुहाग की प्रार्थना करती हैं।

यह पर्व राजस्थान में सबसे अधिक भव्यता से मनाया जाता है, विशेषकर जयपुर व उदयपुर में, जहां गणगौर की शोभा यात्रा राजसी परंपरा के अनुरूप निकाली जाती है, तथा इसे राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का एक प्रमुख अंग माना जाता है।

गणगौर कैसे मनाई जाती है

होली के अगले दिन से स्त्रियां व कन्याएं मिट्टी से गणगौर (माता गौरी) व ईसर (भगवान शिव) की प्रतिमाएं बनाती हैं, तथा प्रतिदिन उन्हें नए वस्त्र, श्रृंगार व फूलों से सजाकर पूजा जाता है। इस दौरान प्रतिदिन गणगौर के विशेष गीत भी गाए जाते हैं।

अंतिम दिनों में गणगौर व ईसर की प्रतिमाओं को शृंगारित कर भव्य शोभा यात्रा में नगर भ्रमण कराया जाता है, तथा अंत में किसी जलाशय अथवा बावड़ी में विसर्जित किया जाता है। कुंवारी कन्याएं मिट्टी के छोटे घड़ों (घुड़लिया) में दीप जलाकर घर-घर घुमाती हैं।

दुर्गा आरती
आरती · संध्या पूजन में गाई जाने वाली आरती

जयपुर की गणगौर शोभा यात्रा विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसमें राजपरिवार की परंपरा अनुसार गणगौर की प्रतिमा को हाथी व पालकी में सजाकर सिटी पैलेस से लेकर नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए यात्रा निकाली जाती है, जिसे देखने देश-विदेश से पर्यटक आते हैं।

गणगौर पूजा विधि

होली के अगले दिन से मिट्टी की गणगौर व ईसर प्रतिमाएं बनाकर प्रतिदिन श्रृंगार व फूलों से सजाकर पूजा करें। गणगौर गीत गाएं। अंतिम दिनों में प्रतिमाओं को शोभा यात्रा में नगर भ्रमण कराकर जलाशय में विसर्जित करें।

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गणगौर के बारे में

गणगौर चैत्र शुक्ल तृतीया को संपन्न होने वाला पर्व है, जो माता गौरी व भगवान शिव के मिलन के स्मरण में मनाया जाता है, तथा राजस्थान में सबसे अधिक भव्यता से मनाया जाता है। इस पृष्ठ पर इस पर्व का महत्व, मिट्टी की प्रतिमाओं के पूजन की परंपरा, तथा शोभा यात्रा की जानकारी दी गई है।

सामान्य प्रश्न

गणगौर कब मनाई जाती है?

गणगौर होली के अगले दिन से आरंभ होकर चैत्र मास की शुक्ल तृतीया को संपन्न होती है, अर्थात यह लगभग सोलह-अठारह दिनों का पर्व है।

गणगौर क्यों मनाई जाती है?

यह माता गौरी व भगवान शिव के पुनर्मिलन की स्मृति में मनाई जाती है, अविवाहित कन्याएं सुयोग्य वर हेतु तथा विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु व सुखी दांपत्य जीवन हेतु यह व्रत रखती हैं।

गणगौर सबसे अधिक कहां मनाई जाती है?

यह पर्व राजस्थान में सर्वाधिक भव्यता से मनाया जाता है, विशेषकर जयपुर व उदयपुर में, जहां गणगौर की भव्य शोभा यात्रा निकाली जाती है।

घुड़लिया क्या है?

घुड़लिया एक छेददार मिट्टी का घड़ा है, जिसमें दीपक जलाकर कुंवारी कन्याएं गणगौर के दिनों में घर-घर घुमाती हैं तथा विशेष गीत गाती हैं।

संबंधित खोज

मुख्य जानकारी

देवतामाता गौरी, भगवान ईसर (शिव)
तिथिचैत्र शुक्ल तृतीया (होली के अगले दिन से आरंभ)
विशेष अनुष्ठानगणगौर व ईसर की मिट्टी प्रतिमा पूजन, शोभा यात्रा
क्षेत्रराजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात
व्रत करने वालीअविवाहित कन्याएं व विवाहित स्त्रियां