अध्याय १ · निर्धन एवं धनी स्त्रियों को सुहाग-रस
कथा के अनुसार भगवान शंकर एक बार माता पार्वती व नारदजी को साथ लेकर पृथ्वी-भ्रमण पर निकले। घूमते-घूमते चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन तीनों एक गांव जा पहुंचे। जैसे ही ग्रामवासियों को उनके आगमन का पता चला, वहां की निर्धन स्त्रियां हल्दी-अक्षत भरी थालियां लेकर तुरंत स्वागत व पूजन के लिए दौड़ी चली आईं।
उनकी श्रद्धा भांपकर पार्वती जी ने अपना संपूर्ण सुहाग-रस उन पर छिड़क दिया, जिससे वे अखंड सौभाग्य लेकर घर लौटीं। इसके कुछ ही समय पश्चात नगर की धनी स्त्रियां भी सोने-चांदी की थालियों में तरह-तरह के पकवान सजाकर वहां आ पहुंचीं।
इन्हें देखकर भगवान शंकर ने पार्वती जी से पूछा: निर्धन स्त्रियों को तो तुमने अपना पूरा सुहाग-रस दे दिया, अब इनके लिए क्या शेष बचा है? पार्वती जी ने उत्तर दिया: हे स्वामी, वह रस बाहरी वस्तुओं से बना था, इसलिए धुलते ही उतर जाएगा। इन धनी स्त्रियों के लिए मैं स्वयं अपनी उंगली काटकर रक्त का सुहाग-रस दूंगी, ताकि इनका सौभाग्य भी मेरे समान अटूट रहे।
स्त्रियों के पूजन समाप्त होते ही पार्वती जी ने वैसा ही किया, उंगली काटकर उस रक्त की बूंदें उन पर छिड़क दीं, और जिस स्त्री पर जितनी बूंद गिरी, उसे उतना ही सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह सब करने के बाद पार्वती जी भगवान शंकर से अनुमति लेकर नदी-स्नान हेतु चली गईं।
अध्याय २ · पार्वती जी का शिव-पूजन एवं वरदान
स्नान के उपरांत उन्होंने वहीं रेत से एक शिवलिंग गढ़ा, उसकी विधिवत पूजा कर भोग अर्पित किया, फिर परिक्रमा करते हुए थोड़ा प्रसाद ग्रहण किया व मस्तक पर तिलक लगाया। इसी क्षण उस रेत के लिंग से साक्षात शिवजी प्रकट हो गए।
उन्होंने पार्वती को आशीर्वाद दिया कि जो भी स्त्री इस तिथि पर उनका पूजन व पार्वती का व्रत रखेगी, उसके पति को दीर्घायु व अंततः मोक्ष की प्राप्ति होगी। इतना कहकर शिवजी वहां से अदृश्य हो गए।
इन सब कार्यों में काफी समय बीत गया। लौटकर वे उसी जगह पहुंचीं जहां शिवजी व नारदजी को छोड़ आई थीं। देर होने का कारण पूछे जाने पर पार्वती जी ने बताया, नदी किनारे मेरे भाई व भाभी मिल गए थे, उन्होंने दूध-भात खिलाकर रोक लिया, इसी वजह से विलंब हो गया।
अध्याय ३ · मायके की माया एवं नारद जी की प्रशंसा
सब जानने वाले शिवजी यह सुनकर स्वयं भी दूध-भात के लोभ में नदी की ओर चल पड़े। पार्वती जी मन-ही-मन शिवजी का ध्यान करते हुए प्रार्थना करने लगीं कि हे नाथ, अपनी इस दासी की प्रतिष्ठा बनाए रखिए, और वे भी उनके पीछे-पीछे चल दीं। कुछ दूर जाकर नदी-तट पर उन्हें माया से रचा हुआ एक भव्य महल दिखाई पड़ा, जहां पार्वती के काल्पनिक भाई-भाभी ने दोनों का भव्य स्वागत किया।
दो दिन वहीं बीत गए। तीसरे दिन पार्वती जी ने प्रस्थान का प्रस्ताव रखा, पर शिवजी वहां से हिलने को राज़ी न हुए। इस पर पार्वती जी नाराज़ होकर अकेली ही निकल पड़ीं, जिस कारण शिवजी को विवश होकर उनके पीछे जाना पड़ा, और नारदजी भी साथ हो लिए।
रास्ते में शिवजी को याद आया कि उनकी माला पार्वती के मायके में ही छूट गई है। पार्वती जी स्वयं जाकर उसे लाने को उद्यत हुईं, किंतु शिवजी ने उनकी जगह नारदजी को भेजने का निर्णय लिया।
किंतु वहां पहुंचकर नारदजी को कोई महल नज़र नहीं आया, चारों तरफ केवल घना जंगल फैला था। ठीक उसी समय बिजली चमकी, जिसके प्रकाश में उन्हें एक पेड़ पर शिवजी की माला लटकी दिखी। माला उतारकर वे लौटे, और शिवजी के सामने अपनी इस विचित्र यात्रा का पूरा वृत्तांत सुनाने लगे।
यह सुनकर शिवजी मुस्कुराते हुए बोले कि यह सब पार्वती की ही रचाई माया है। पार्वती जी ने विनम्रता से कहा कि इसमें उनका कोई सामर्थ्य नहीं, यह तो सब शिवजी की ही कृपा है। इस पूरे प्रसंग को समझकर नारदजी ने पार्वती जी के पातिव्रत्य की भूरि-भूरि सराहना की।
गणगौर व्रत कथा पाठ विधि
चैत्र शुक्ल तृतीया को स्नान कर मिट्टी अथवा बालू से गणगौर (माता गौरी) व ईसर (भगवान शिव) की प्रतिमा बनाकर श्रृंगार व फूलों से सजाएं, तथा हल्दी-अक्षत व भोग से पूजन कर यह कथा पढ़ें अथवा सुनें। सुहाग की सामग्री अर्पित कर अंत में प्रतिमाओं को जलाशय में विसर्जित करें।
गणगौर व्रत कथा के बारे में
गणगौर व्रत कथा माता पार्वती द्वारा चैत्र शुक्ल तृतीया को ग्राम की निर्धन व धनी स्त्रियों को सुहाग-रस देने, बालू के शिवलिंग का पूजन करने पर भगवान शिव द्वारा दिए गए वरदान, तथा उनकी मायके की माया की कथा है। इस पृष्ठ पर तीन अध्याय हैं, पहले में निर्धन व धनी स्त्रियों को सुहाग-रस देने की कथा, दूसरे में पार्वती जी के शिव-पूजन व वरदान की कथा, तथा तीसरे में मायके की माया व नारद जी की प्रशंसा की कथा है।
यह कथा चैत्र मास की शुक्ल तृतीया को, अर्थात गणगौर के दिन, माता गौरी व भगवान ईसर के पूजन के समय सुनी जाती है। इस पृष्ठ पर तीनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
गणगौर व्रत कथा का कोई एक नामित रचयिता अथवा स्वयं-उल्लिखित पौराणिक स्रोत नहीं है, यह भगवान शिव व माता पार्वती से जुड़ी एक लोक-प्रचलित कथा है, जो गणगौर पूजन के अवसर पर मौखिक व मुद्रित दोनों रूपों में प्रचलित है। यहां दी गई कथा इसी प्रचलित वृत्तांत की घटनाओं, पात्रों व क्रम के अनुरूप है, किंतु इसका शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने। ध्यान रहे कि इस पृष्ठ की 'महत्व' अनुभाग में दी गई गणगौर की सामान्य पहचान, होली की अग्नि में भस्म होकर पार्वती जी के पुनर्जन्म व तप की कथा, इस कथा में नहीं मिलती, जो इसके स्थान पर सुहाग-रस व मायके की माया का एक स्वतंत्र वृत्तांत प्रस्तुत करती है। दोनों गणगौर से जुड़ी सुपरिचित परंपराएं हैं, और इस पृष्ठ पर केवल दूसरी परंपरा को कथा-रूप में दिया गया है।
सामान्य प्रश्न
गणगौर व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल तीन अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
माता पार्वती ने निर्धन व धनी स्त्रियों को अलग-अलग सुहाग-रस क्यों दिया?
निर्धन स्त्रियों ने सच्ची भक्ति से पूजन किया, इसलिए पार्वती जी ने उन्हें अपना संपूर्ण सुहाग-रस दे दिया। धनी स्त्रियों के देर से आने पर, जब उनके पास देने के लिए और रस शेष न रहा, तो पार्वती जी ने स्वयं की अंगुली चीरकर रक्त का सुहाग-रस दिया, जिससे वे भी सौभाग्यवती हुईं।
बालू के शिवलिंग पूजन पर भगवान शिव ने क्या वरदान दिया?
पार्वती जी के बालू के शिवलिंग पूजन से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने वरदान दिया कि जो स्त्री उस दिन उनका पूजन व पार्वती जी का व्रत करेगी, उसका पति चिरंजीवी रहेगा तथा अंत में मोक्ष प्राप्त करेगा।
मायके की माया वाली घटना क्या सिखाती है?
यह घटना माता पार्वती की पतिव्रत-शक्ति व माया-सामर्थ्य को दर्शाती है, जब भगवान शिव लालचवश नदी तट की ओर चले, तो पार्वती जी ने अपनी माया से वहां मायके का दृश्य रच दिया, जिसे देखकर नारद जी ने उनकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की।
