मुख्यत्योहारअक्षय तृतीया
अक्षय पुण्य का पर्व · वैशाख शुक्ल तृतीया

अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया वैशाख मास की शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला पर्व है, जिस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य, दान अथवा क्रय कभी क्षीण न होने वाला फल देता है, ऐसी मान्यता है।

अक्षय तृतीया
अगली तिथि
९ मई २०२७

अक्षय तृतीया साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक पूर्ण शुभ मुहूर्त मानी जाती है, अर्थात संपूर्ण दिन शुभ कार्यों हेतु उपयुक्त होता है, पृथक मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। तथापि स्वर्ण-खरीद का सर्वाधिक शुभ समय शहर अनुसार बदलता है, इसलिए नज़दीकी पंचांग देखें।

अक्षय तृतीया का महत्व

'अक्षय' का अर्थ है 'जिसका कभी क्षय अर्थात नाश न हो', तथा 'तृतीया' तिथि के नाम से जुड़कर यह पर्व इस मान्यता को दर्शाता है कि इस दिन किया गया जप, यज्ञ, दान अथवा क्रय कभी समाप्त न होने वाला फल देता है। इसीलिए इस दिन स्वर्ण व अन्य मूल्यवान वस्तुओं की खरीद को समृद्धि व सौभाग्य लाने वाला माना जाता है।

विष्णु चालीसा
चालीसा · अक्षय तृतीया पूजन में पाठ

मान्यता है कि इसी तिथि को भगवान विष्णु के छठे अवतार, भगवान परशुराम का जन्म हुआ था, इसीलिए इस दिन को 'परशुराम जयंती' के रूप में भी मनाया जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार, इसी दिन सुदामा अपने बाल सखा भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे थे, और मुट्ठीभर चावल भेंट करने पर भी श्रीकृष्ण की कृपा से उन्हें अपार धन-संपत्ति प्राप्त हुई थी।

अक्षय तृतीया को साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक पूर्ण शुभ मुहूर्त माना जाता है, जिस दिन बिना पंचांग में मुहूर्त देखे भी विवाह, गृह-प्रवेश, नई दुकान अथवा व्यापार का शुभारंभ किया जा सकता है। उत्तराखंड में इसी दिन से चार धाम यात्रा के अंतर्गत गंगोत्री व यमुनोत्री मंदिर के कपाट भी खुलते हैं।

अक्षय तृतीया कैसे मनाई जाती है

इस दिन बाज़ारों में सोना, चांदी अथवा नई संपत्ति की विशेष खरीदारी होती है, जिसे भविष्य में समृद्धि लाने वाला माना जाता है। अनेक व्यापारी इसी दिन नए व्यापार अथवा दुकान का शुभारंभ करते हैं।

प्रातःकाल स्नान कर भगवान विष्णु व मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है, तथा अन्न, जल से भरे घड़े, पंखा, छाता व चप्पल जैसी वस्तुओं का दान किया जाता है, जो गर्मी के मौसम में जरूरतमंदों के लिए विशेष उपयोगी होता है। पितरों के निमित्त तर्पण भी इसी दिन किया जाता है।

लक्ष्मी आरती
आरती · अक्षय तृतीया पूजन में गाई जाने वाली आरती

वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में वर्षभर वस्त्रों से ढके रहने वाले भगवान के चरण, केवल इसी एक दिन भक्तों के दर्शनार्थ खोले जाते हैं। अनेक स्थानों पर विवाह भी इसी शुभ दिन आयोजित किए जाते हैं।

अक्षय तृतीया पूजा विधि

प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु व मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करें तथा पितरों के निमित्त तर्पण करें। यथाशक्ति स्वर्ण अथवा नई वस्तु की खरीद करें, तथा अन्न, जल व वस्त्र का दान कर जरूरतमंदों की सहायता करें।

अक्षय तृतीया के बारे में

अक्षय तृतीया वैशाख मास की शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला पर्व है, जो साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक पूर्ण शुभ दिन माना जाता है। इस पृष्ठ पर इस पर्व का महत्व, परशुराम जन्म व सुदामा-कृष्ण मिलन की कथाएं, तथा स्वर्ण-खरीद व दान-पुण्य की परंपरा की जानकारी दी गई है।

इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

सामान्य प्रश्न

अक्षय तृतीया कब मनाई जाती है?

अक्षय तृतीया प्रत्येक वर्ष वैशाख मास की शुक्ल तृतीया तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्यतः अप्रैल-मई में आती है।

अक्षय तृतीया को स्वर्ण खरीदना शुभ क्यों माना जाता है?

मान्यता है कि इस दिन की गई कोई भी खरीद अथवा शुभ कार्य कभी क्षीण न होने वाला फल देता है, इसीलिए स्वर्ण जैसी स्थायी व मूल्यवान वस्तु की खरीद को समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

अक्षय तृतीया को परशुराम जयंती भी क्यों कहा जाता है?

मान्यता है कि भगवान विष्णु के छठे अवतार, भगवान परशुराम का जन्म इसी तिथि को हुआ था, इसीलिए यह दिन परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

साढ़े तीन मुहूर्त क्या हैं?

साढ़े तीन मुहूर्त वर्ष के वे साढ़े तीन दिन हैं जिन्हें पूर्ण रूप से शुभ माना जाता है, अक्षय तृतीया, गुड़ी पड़वा (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा), दशहरा (विजयादशमी), तथा दिवाली की आधी शुभ रात्रि, जिन पर बिना मुहूर्त देखे शुभ कार्य किए जा सकते हैं।

संबंधित खोज

मुख्य जानकारी

देवताभगवान विष्णु, भगवान परशुराम, कुबेर
तिथिवैशाख शुक्ल तृतीया
विशेष अनुष्ठानस्वर्ण-खरीद, दान-पुण्य, नए कार्य का शुभारंभ
शुभ समयसंपूर्ण दिवस शुभ (साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक)
अन्य नामआखा तीज