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कठिन संकटों से मुक्ति का व्रत · भाद्रपद कृष्ण एकादशी

अजा एकादशी

अजा एकादशी भाद्रपद मास की कृष्ण एकादशी को मनाई जाती है, जिसे कठिन संकटों व पापों से मुक्ति की कामना से रखा जाता है।

अजा एकादशी
अगली तिथि
२८ अगस्त २०२७

यह पर्व श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के कुछ दिन पश्चात, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आता है। इसे 'अन्नदा एकादशी' के नाम से भी जाना जाता है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।

अजा एकादशी का महत्व

पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि पूर्वकाल में हरिश्चंद्र नाम के एक चक्रवर्ती और सत्यप्रतिज्ञ राजा थे। किसी कर्म का फल भोगते हुए उन्हें राज्य से भ्रष्ट होना पड़ा। उन्होंने पत्नी और पुत्र को बेचा, फिर स्वयं को भी बेच दिया, और पुण्यात्मा होते हुए भी उन्हें चांडाल की दासता करनी पड़ी, जहां वे मुर्दों का कफन लिया करते थे। फिर भी वे सत्य से विचलित नहीं हुए।

अजा एकादशी व्रत कथा
कथा · राजा हरिश्चंद्र और गौतम ऋषि की पूरी कथा

अनेक वर्ष इस दासता में बीतने पर, शोक में डूबे राजा के पास महर्षि गौतम आए। राजा ने उन्हें अपना सारा दुःख सुनाया। गौतम ने कहा कि भादों के कृष्ण पक्ष में कल्याणमयी 'अजा' एकादशी आ रही है, जो आज से सातवें दिन है; उस दिन उपवास करके रात में जागरण करना, इससे पाप का अंत होगा।

राजा हरिश्चंद्र ने वह व्रत किया, और उसके प्रभाव से वे सारे दुःखों से पार हो गए: उन्हें पत्नी का साथ फिर मिला और मृत पुत्र को जीवन मिल गया। आकाश में दुंदुभियां बजीं, फूलों की वर्षा हुई, उन्हें निष्कंटक राज्य मिला और अंत में वे पुरजनों व परिजनों सहित स्वर्गलोक गए। पुराण के अनुसार इस माहात्म्य को पढ़ने-सुनने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

अजा एकादशी कैसे मनाई जाती है

भक्तगण इस दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं, तथा दिनभर फलाहार अथवा निर्जला व्रत रखते हैं। भगवान विष्णु का पूजन कर अजा एकादशी की कथा का श्रवण किया जाता है।

रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन किया जाता है, तथा अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में दान-पुण्य कर व्रत का पारण किया जाता है।

ॐ जय जगदीश हरे आरती
आरती · एकादशी पूजन में गाई जाने वाली आरती

यह व्रत विशेष रूप से उन भक्तों द्वारा रखा जाता है जो जीवन के कठिन संकटों, ऋण व दरिद्रता से मुक्ति चाहते हैं, तथा राजा हरिश्चंद्र की भांति सत्य व धैर्य के साथ इस व्रत का पालन करने की प्रेरणा देते हैं।

अजा एकादशी पूजा विधि

प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लें तथा फलाहार अथवा निर्जला व्रत रखें। भगवान विष्णु का पूजन कर अजा एकादशी की कथा सुनें। अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में दान देकर व्रत का पारण करें।

अजा एकादशी व्रत कथा पढ़ें
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अजा एकादशी के बारे में

अजा एकादशी भाद्रपद मास की कृष्ण एकादशी को कठिन संकटों व पापों से मुक्ति की कामना से रखा जाने वाला व्रत है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, राजा हरिश्चंद्र की कथा, तथा व्रत-विधि की जानकारी दी गई है।

सामान्य प्रश्न

अजा एकादशी क्यों मनाई जाती है?

यह एकादशी कठिन संकटों और पापों से मुक्ति की कामना से मनाई जाती है। इसकी कथा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र से जुड़ी है, जिन्होंने महर्षि गौतम के कहने पर यह व्रत रखा और उसके प्रभाव से अपना राज्य व परिवार फिर पाया।

अजा एकादशी कब मनाई जाती है?

यह व्रत प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास की कृष्ण एकादशी तिथि को, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के कुछ दिन पश्चात मनाया जाता है।

राजा हरिश्चंद्र की कथा अजा एकादशी से कैसे जुड़ी है?

राज्य, पत्नी, पुत्र और स्वयं को बेचकर चांडाल की दासता कर रहे राजा हरिश्चंद्र को महर्षि गौतम ने अजा एकादशी का व्रत बताया। व्रत के प्रभाव से उन्हें पत्नी का साथ फिर मिला, मृत पुत्र जीवित हो गया, राज्य लौट आया और अंत में वे स्वर्ग गए।

अजा एकादशी को अन्नदा एकादशी क्यों कहा जाता है?

बंगाल व ओडिशा जैसे कुछ क्षेत्रों में इस एकादशी को 'अन्नदा एकादशी' के नाम से भी जाना जाता है, यद्यपि इसकी तिथि व मूल महत्व अजा एकादशी के समान ही है।

अजा एकादशी व्रत से क्या लाभ होता है?

मान्यता है कि यह व्रत जीवन के कठिन से कठिन संकटों, पापों व दरिद्रता से मुक्ति दिलाता है, तथा श्रद्धापूर्वक पालन करने पर मोक्ष-प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

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मुख्य जानकारी

देवताभगवान विष्णु
तिथिभाद्रपद कृष्ण एकादशी
अन्य नामअन्नदा एकादशी
महत्वकठिन संकटों व पापों से मुक्ति
व्रत प्रकारफलाहार व्रत, द्वादशी को पारण