अध्याय १ · सकट चौथ व्रत विधान
माघ कृष्ण चतुर्थी को सकट का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन सकट हरण गणपति गणेश जी का पूजन होता है। इस व्रत को करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और समस्त इच्छाओं व कामनाओं की पूर्ति होती है।
इस दिन स्त्रियां दिनभर निर्जल व्रत रखकर शाम को फलाहार लेती हैं। दूसरे दिन सुबह सकट माता को चढ़ाये गये पूरी-पकवानों को प्रसाद रूप में ग्रहण करती हैं। तिल को भूनकर गुड़ के साथ कूट लिया जाता है। तिलकुट का बकरा भी बनाया जाता है। उसकी पूजा करके घर का कोई बच्चा तिलकुट के बकरे की गर्दन काट देता है। सबको इसका प्रसाद दिया जाता है। पूजा के बाद कथा सुनते हैं।
अध्याय २ · कुम्हार व बुढ़िया की कथा
किसी नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार उसने बर्तन बनाकर आंवा लगाया तो आंवा पका ही नहीं। हारकर वह राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगा। राजा ने राजपंडित को बुलाकर कारण पूछा तो राजपंडित ने कहा कि हर बार आंवा लगाते समय बच्चे की बलि देने से आंवा पक जाएगा।
राजा का आदेश हो गया। बलि आरम्भ हुई। जिस परिवार की बारी होती, वह परिवार अपने बच्चों में से एक बच्चा बलि के लिए भेज देता। इसी तरह कुछ दिनों बाद सकट के दिन एक बुढ़िया के लड़के की बारी आई। बुढ़िया के लिए वही जीवन का सहारा था, परन्तु राजा की आज्ञा के आगे किसी का कुछ वश नहीं था। दुःखी बुढ़िया सोच रही थी कि मेरा तो एक ही बेटा है, वह भी सकट के दिन मुझसे जुदा हो जाएगा।
बुढ़िया ने लड़के को सिंदूर और दूब का बीड़ा देकर कहा: 'भगवान् का नाम लेकर आंवा में बैठ जाना, सकट माता रक्षा करेंगी।' बालक आंवा में बिठा दिया गया, और बुढ़िया सकट माता के सामने बैठकर पूजा करने लगी। पहले तो आंवा पकने में कई दिन लग जाते थे, पर इस बार सकट माता की कृपा से एक ही रात में आंवा पक गया।
सवेरे कुम्हार ने देखा तो हैरान रह गया, आंवा पक गया था, और बुढ़िया का बेटा तथा अन्य बालक भी जीवित एवं सुरक्षित थे। नगरवासियों ने सकट माता की महिमा स्वीकार की, तथा उस लड़के को भी धन्य माना। सकट माता की कृपा से नगर के अन्य बालक भी बच गए।
सकट चौथ व्रत कथा पाठ विधि
सकट चौथ के दिन दिनभर निर्जला व्रत रखें, शाम को फलाहार लें। दूसरे दिन प्रातः सकट माता को अर्पित पूरी-पकवान प्रसाद रूप में ग्रहण करें। तिल-गुड़ का तिलकुट बनाकर उसका बकरा बनाएं, पूजा कर उसे अर्पित करें, तथा कथा सुनें। पूर्ण विधि इस पृष्ठ के पहले अध्याय में दी गई है।
सकट चौथ व्रत कथा के बारे में
सकट चौथ व्रत कथा उस बुढ़िया के इकलौते पुत्र की कथा है, जिसकी बलि की बारी आने पर सकट माता ने उसे कुम्हार के जलते आंवे में सुरक्षित रखा। इस पृष्ठ पर दो अध्याय हैं, पहले में व्रत का विधान दिया गया है, तथा दूसरे में कुम्हार व बुढ़िया की पूरी कथा है।
यह व्रत मुख्यतः उत्तर भारत में माताओं द्वारा अपनी संतान के कल्याण की कामना से किया जाता है। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सकट चौथ व्रत कथा का कोई एक नामित रचयिता नहीं है। भारत में इस व्रत की कई अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं, जैसे राजा हरिश्चंद्र से जुड़ी कथा, एक साहूकार-साहूकारनी की कथा, तथा भगवान महादेव-पार्वती की कथा, जो इस पृष्ठ पर सम्मिलित नहीं हैं। यहां प्रस्तुत पाठ एक प्रकाशित हिंदी व्रत-कथा संग्रह पुस्तिका में छपी कुम्हार व बुढ़िया की कथा का यथावत रूपांतरण है, जिसमें केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं, कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। अन्य मुद्रित संस्करणों में शब्दों का हेरफेर मिल सकता है।
सामान्य प्रश्न
सकट चौथ व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल दो अध्याय हैं, व्रत विधान, तथा कुम्हार व बुढ़िया की कथा, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
सकट चौथ कब मनाई जाती है?
यह व्रत प्रत्येक वर्ष माघ मास की कृष्ण चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।
क्या सकट चौथ की केवल एक ही कथा प्रचलित है?
नहीं, भारत में सकट चौथ की कई कथाएं प्रचलित हैं, जैसे राजा हरिश्चंद्र से जुड़ी कथा तथा महादेव-पार्वती की कथा। इस पृष्ठ पर कुम्हार व बुढ़िया की व्यापक रूप से प्रचलित कथा दी गई है।
तिलकुट का बकरा क्यों बनाया जाता है?
सकट चौथ के दिन तिल व गुड़ से बकरे का आकार बनाकर उसकी पूजा की जाती है, तथा घर का कोई बच्चा उसकी गर्दन काटकर सबको प्रसाद देता है, जैसा इस कथा के व्रत-विधान अध्याय में बताया गया है।
