हनुमान जन्म कथा
हनुमान जन्म कथा वह कथा है, जिसमें एक शाप के कारण वानरी रूप में जन्मीं अप्सरा अंजना ने घोर तपस्या कर पवनदेव व भगवान शिव की कृपा से पुत्र-प्राप्ति का वरदान पाया, तथा बालक हनुमान ने सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास किया, जिसके पश्चात देवताओं ने उन्हें अनेक दिव्य शक्तियों का वरदान दिया, इसी जन्म-तिथि की स्मृति में हनुमान जयंती मनाई जाती है।

अध्याय १ · अंजना का शाप, तपस्या, और पवनपुत्र की उत्पत्ति
अंजना पूर्वजन्म में इंद्र की सभा की अप्सरा पुंजिकस्थला थीं। बाल्यस्वभाव में उन्होंने एक तपस्यारत ऋषि पर खेल-खेल में फल फेंककर उनकी तपस्या भंग कर दी, जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें वानरी रूप में जन्म लेने का शाप दे दिया। पुंजिकस्थला के अत्यंत विनती करने पर ऋषि ने यह भी कहा कि उनके गर्भ से एक ऐसा तेजस्वी पुत्र जन्म लेगा, जो उनके नाम को सदा के लिए अमर कर देगा।
वानरी रूप में पृथ्वी पर जन्म लेकर अंजना का विवाह वानरराज केसरी से हुआ, जो स्वयं भी अत्यंत पराक्रमी व तपस्वी थे। पुत्र-प्राप्ति की कामना से अंजना ने ऋषि मतंग के मार्गदर्शन में नारायण पर्वत पर बारह वर्षों तक कठोर तपस्या की। इस तपस्या से प्रसन्न होकर पवनदेव ने उन्हें एक तेजस्वी, वेदज्ञ व अपार बलशाली पुत्र का वरदान दिया, तथा साथ ही भगवान शिव ने भी उन्हें वचन दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र रूप में अवतरित होंगे।
हनुमान चालीसा पढ़ें →उन्हीं दिनों अयोध्या नरेश राजा दशरथ पुत्रेष्टि यज्ञ कर रहे थे, जिसमें अग्निदेव ने प्रकट होकर एक स्वर्ण-पात्र में दिव्य खीर प्रदान की, जिसे रानियों में बांटा जाना था। कथा के अनुसार उसी खीर का एक अंश एक पक्षी झपटकर उड़ा ले गया तथा तपस्यारत अंजना के हाथों में जा गिराया। इसे शिव-कृपा का ही प्रसाद मानकर अंजना ने वह खीर ग्रहण कर ली, तथा उचित समय पर चैत्र पूर्णिमा को उनके गर्भ से बालक हनुमान का जन्म हुआ।
अध्याय २ · सूर्य को निगलने का प्रयास, और देवताओं का वरदान
जन्म के कुछ ही समय पश्चात, एक प्रातःकाल भूख से व्याकुल बालक हनुमान ने उदय होते सूर्य को एक पका हुआ लाल फल समझ लिया। पवनदेव से प्राप्त उड़ने की शक्ति के बल पर वे आकाश में छलांग लगाकर सूर्य की ओर झपटे। उसी क्षण राहु भी सूर्यग्रहण हेतु सूर्य के समीप पहुंचा हुआ था, तथा बालक हनुमान को अपनी ओर आता देख भयभीत होकर इंद्र के पास जा पहुंचा और शिकायत की कि कोई दूसरा राहु उसका ग्रास छीनने आ रहा है।
इंद्र व राहु दोनों बालक हनुमान के समक्ष जा पहुंचे। हनुमान ने राहु पर भी आक्रमण कर दिया, जिससे क्रोधित होकर इंद्र ने अपने वज्र से बालक हनुमान पर प्रहार कर दिया। इस प्रहार से बालक की ठुड्डी (हनु) पर गहरी चोट लगी, तथा वे मूर्छित होकर एक पर्वत पर जा गिरे। अपने पुत्र पर हुए इस आघात से अत्यंत क्रोधित होकर पवनदेव ने संपूर्ण सृष्टि में वायु का प्रवाह ही रोक दिया, जिससे समस्त प्राणी श्वास लेने में असमर्थ होकर तड़पने लगे।
संपूर्ण सृष्टि के संकट में पड़ने पर देवता, असुर व यक्ष सभी ब्रह्मा जी की शरण में पहुंचे। ब्रह्मा जी ने मूर्छित बालक हनुमान को पुनः चेतन किया तथा वरदान दिया कि कोई भी ब्रह्मास्त्र उन्हें हानि नहीं पहुंचा सकेगा। इंद्र ने पश्चाताप स्वरूप बालक के गले में पुष्पमाला पहनाई तथा घोषणा की कि चूंकि उनकी हनु (ठुड्डी) पर प्रहार हुआ, अतः वे 'हनुमान' कहलाएंगे, तथा भविष्य में उनका वज्र भी हनुमान जी के समक्ष निष्प्रभावी रहेगा। सूर्यदेव ने उन्हें अपने तेज का अंश तथा शस्त्र-शास्त्र में निपुणता का वरदान दिया, तथा अन्य समस्त देवताओं ने भी अपनी-अपनी दिव्य शक्तियों का आशीर्वाद देकर उन्हें अजेय व अमर बना दिया। इस प्रकार समस्त देवताओं के संयुक्त वरदान से संतुष्ट होकर पवनदेव ने पुनः वायु का प्रवाह आरंभ किया, तथा सृष्टि का संकट टल गया।
बजरंग बाण पढ़ें →इन्हीं दिव्य वरदानों के कारण बालक हनुमान 'पवनपुत्र', 'अंजनिपुत्र', 'मारुति' व 'रुद्रावतार' जैसे नामों से पूजे जाने लगे। आगे चलकर श्रीराम की सेवा व लंका-विजय में उनके अतुलनीय योगदान की कथा, जिसमें स्वयं श्रीराम ने भी उन्हें चिरंजीवी होने का वरदान दिया, इसी साइट के अन्य पृष्ठों पर विस्तार से दी गई है। इसी जन्म-तिथि की स्मृति में हनुमान जयंती मनाई जाती है, जब भक्तगण हनुमान चालीसा व बजरंग बाण का पाठ कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
हनुमान जयंती के बारे में पढ़ें →हनुमान जन्म कथा पाठ विधि
हनुमान जयंती अथवा प्रत्येक मंगलवार व शनिवार को प्रातः स्नान कर हनुमान जी की प्रतिमा पर सिंदूर व चमेली के तेल का लेप करें, दीप जलाकर हनुमान चालीसा व बजरंग बाण का पाठ करें, तथा इस जन्म कथा का श्रवण करें। बूंदी अथवा बेसन के लड्डू का भोग अर्पित करना विशेष फलदायी माना जाता है।
हनुमान जन्म कथा के बारे में
यह कथा दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में अंजना के शाप, तपस्या तथा हनुमान जी के जन्म की कथा है। दूसरे अध्याय में बालक हनुमान द्वारा सूर्य को निगलने के प्रयास, इंद्र के वज्र-प्रहार तथा देवताओं से मिले वरदानों का वर्णन है।
यह कथा हनुमान जयंती से जुड़ी है। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
वाल्मीकि रामायण की परंपरा से जुड़ी लोक-कथा के बारे में
हनुमान जन्म कथा का कोई एक प्रामाणिक मुद्रित 'कथा-पाठ' नहीं है, यह वाल्मीकि रामायण की परंपरा से जुड़ी सुविख्यात पौराणिक कथा है, जिसका शब्दांकन यहां मौलिक रूप से किया गया है। ध्यान दें: हनुमान जयंती के पृष्ठ पर भी इसी जन्म-प्रसंग की एक संक्षिप्त झलक दी गई है, जबकि यहां इसे विस्तार से बताया गया है। इसके अतिरिक्त, श्रीराम की सेवा, लंका-दहन, संजीवनी पर्वत जैसे उनके बाल्यकाल-पश्चात के प्रसंगों की पूर्ण कथाएं इसी साइट पर अपने पृथक पृष्ठों पर पहले से उपलब्ध हैं, अतः यहां उन्हें विस्तार से नहीं दोहराया गया है।
सामान्य प्रश्न
हनुमान जी के माता-पिता कौन थे?
हनुमान जी माता अंजना व वानरराज केसरी के पुत्र थे, तथा पवनदेव व भगवान शिव की कृपा से उनका जन्म हुआ, इसी कारण उन्हें पवनपुत्र भी कहा जाता है।
अंजना को वानरी रूप में जन्म क्यों लेना पड़ा?
पूर्वजन्म में अप्सरा पुंजिकस्थला ने खेल-खेल में एक तपस्यारत ऋषि की तपस्या भंग कर दी थी, जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें वानरी रूप में जन्म लेने का शाप दिया।
हनुमान जी को यह नाम कैसे मिला?
सूर्य को फल समझकर निगलने के प्रयास में इंद्र के वज्र-प्रहार से उनकी ठुड्डी (हनु) पर चोट लगी थी, इसी कारण इंद्र ने उन्हें 'हनुमान' नाम दिया।
सूर्य को निगलने के प्रयास के बाद देवताओं ने क्या किया?
पवनदेव के क्रोधवश वायु रोक देने पर, संपूर्ण सृष्टि को संकट से बचाने हेतु ब्रह्मा, इंद्र, सूर्य व अन्य देवताओं ने बालक हनुमान को अनेक दिव्य वरदान देकर उन्हें अजेय व अमर बना दिया।