श्री चित्रगुप्त यम द्वितीया व्रत कथा
चित्रगुप्त यम द्वितीया व्रत कथा भगवान चित्रगुप्त के जन्म, कायस्थ जाति की उत्पत्ति तथा भाई दूज के दिन बहन के घर भोजन करने की परंपरा की मूल कथा है, जो कार्तिक शुक्ल द्वितीया को पढ़ी-सुनी जाती है और जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

अध्याय १ · कायस्थ उत्पत्ति एवं चित्रगुप्त जी का जन्म
श्री भीष्मजी ने पूछा: हे महामुने! इस लोक में जो पुरुष 'कायस्थ' नाम से विख्यात हैं, वे किस वंश में उत्पन्न हुए हैं और किस वर्ण के कहे जाते हैं? यह कथा सुनने की मेरी बड़ी इच्छा है, अतः इस संदेह को दूर करने में समर्थ आप ही कृपा करके यह पुनीत कथा वर्णन कीजिए।
इस प्रकार पूछे जाने पर मुनि पुलस्त्यजी प्रसन्न मन से गंगापुत्र भीष्म से बोले: हे गांगेय! कायस्थ की उत्पत्ति का वर्णन तुमसे करता हूं, सुनो।
जो कुछ तुमने पहले नहीं सुना, वह मुझसे सुनो। अव्यक्त, शांत, लोकपितामह ब्रह्मा ने इस चराचरात्मक जगत को उत्पन्न कर पालन किया और अंत में इसका नाश भी करेंगे। पूर्वकाल में उन्होंने जिस भांति इस संसार की रचना की, वह कहता हूं, मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न किए। इसी प्रकार दो, चार, छह पैरों वाले आदि समस्त सर्पादि जीवों को, तथा एक ही काल में चंद्र-सूर्य आदि ग्रहों व अन्यान्य बहुत जीवों को उत्पन्न करके, हे भारत! ब्रह्मा ने सूर्य के समान तेजस्वी अपने ज्येष्ठ पुत्र को बुलाकर आज्ञा दी, हे सुव्रत! यत्नपूर्वक इस जगत की रक्षा करो।
सृष्टि-पालन हेतु ज्येष्ठ पुत्र को आज्ञा देकर ब्रह्माजी ने जो किया, वह सुनिए। एकाग्रचित्त होकर ब्रह्मा दस हजार दस सौ वर्ष समाधि में लीन रहे, अंत में विश्रांत-चित्त हुए। तब उन्हीं के शरीर से बड़ी-बड़ी भुजाओं वाला, श्यामवर्ण, कमल-नेत्र, शंख के समान गर्दन, चंद्रमा के समान मुख वाला, तेजस्वी, अति बुद्धिमान, हाथ में कलम और दावात लिए हुए, विचित्र अंगों वाला तथा ध्यानस्थ नेत्रों वाला एक पुरुष प्रकट हुआ। हे गांगेय! ब्रह्माजी ने समाधि छोड़कर सामने खड़े उस पुरुष को ऊपर-नीचे देखकर पूछा: आप हमारे सामने कौन खड़े हैं? यह प्रश्न सुनकर वह पुरुष बोला: हे नाथ! हे विधे! मैं आपके ही शरीर से उत्पन्न हुआ हूं, इसमें कोई संदेह नहीं। अब आप ही मेरा नामकरण करें, और मेरे करने योग्य कार्य भी बताएं।
यह सुनकर ब्रह्माजी अपने ही शरीर से उत्पन्न उस पुरुष से प्रसन्न होकर हंसते हुए बोले: मेरे शरीर (काया) से उत्पन्न होने के कारण तुम्हारी संज्ञा 'कायस्थ' होगी, और पृथ्वी पर तुम 'चित्रगुप्त' नाम से विख्यात होगे। हे वत्स! धर्म-अधर्म के निर्णय हेतु तुम्हारा निवास धर्मराज की शुभ पुरी में सुनिश्चित होगा। अपने वर्ण के उचित धर्म का विधिपूर्वक पालन करो और पुत्रों को उत्पन्न करो। ऐसा भारयुक्त वर देकर ब्रह्माजी वहीं अंतर्ध्यान हो गए।
पुलस्त्यजी बोले: हे कुरुवंश के वर्धक भीष्म! चित्रगुप्त से जो प्रजा उत्पन्न हुई, उनके नाम सुनिए, गौड़, माथुर, भटनागर, सेनक (सक्सेना), अहिगण, श्रीवास्तव्य, अंबष्ठ, करण आदि, जो सभी शास्त्रों में निपुण उत्पन्न हुए। तब महामति चित्रगुप्त ने अपने पुत्रों को पृथ्वी पर भेजा और उन्हें धर्म-साधन की शिक्षा दी, देवताओं का पूजन, पितरों का श्राद्ध-तर्पण, ब्राह्मणों का भरण-पोषण, तथा अतिथियों की सदैव सेवा करना।
हे पुत्रो! तीनों लोकों के हित के लिए यत्न करना, और स्वर्ग की कामना करते हुए महिषासुरमर्दिनी देवी का अवश्य पूजन करना, जो माया-स्वरूपा, प्रकृति-स्वरूपा तथा चंड-मुंड की नाशक हैं और समस्त सिद्धियां देने वाली हैं। उन्हीं के प्रभाव से देवता सिद्धि पाकर स्वर्गलोक गए और सदा यज्ञ-भाग के अधिकारी हुए। अतः तुम सब भी उत्तम मिष्ठान्न से उनका पूजन करना, जिससे तुम्हें भी सिद्धि प्राप्त हो। वैष्णव धर्म का आश्रय लेकर मेरी इस आज्ञा का पालन करना, यह कहकर चित्रगुप्तजी अपने पुत्रों को यह आदेश देकर स्वर्ग चले गए, और सदैव धर्मराज के अधिकार में स्थित हो गए। हे भीष्म! इस प्रकार कायस्थों की उत्पत्ति और चित्रगुप्तजी की व्यवस्था मैंने आपसे कही। अब मैं उनसे जुड़ा एक विचित्र इतिहास कहता हूं, कि चित्रगुप्तजी का प्रभाव किस प्रकार प्रकट हुआ।
अध्याय २ · राजा सौदास की कथा एवं चित्रगुप्त पूजन विधि
पुलस्त्यजी ने कहा: पृथ्वीमंडल पर सौदास नामक एक राजा हुआ, जो धर्म-अधर्म को न जानते हुए सदा पाप-कर्म में रत रहता था। वह पापी, दुराचारी, धर्म-कर्म से रहित राजा जिस प्रकार स्वर्ग जाकर पुण्य-फल का भोग कर पाया, वह कथा सुनिए। राजनीति को भी न जानते हुए उस राजा ने अपने राज्य में यह मुनादी करवा दी कि उसके राज्य में कोई भी दान, धर्म, हवन, श्राद्ध, तर्पण, अतिथि-सत्कार, जप, नियम अथवा तपस्या का साधन न करे।
देवी-भक्ति में तत्पर ब्राह्मण उस राजा का देश छोड़कर अन्य देशों में चले गए, और जो शेष रह गए, वे यज्ञ, हवन, श्राद्ध व तर्पण कभी नहीं करते थे। हे गांगेय! तभी से उस राज्य में कोई भी यज्ञ-हवन आदि पुण्य-कर्म नहीं करता था, और उस देश से पुण्य जाता रहा।
कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया की शुभ तिथि पर, पवित्र होकर कायस्थ लोग भक्तिभाव से धूप-दीप आदि शुभ सामग्री से चित्रगुप्तजी का पूजन कर रहे थे। संयोगवश राजा सौदास वहीं से गुजर रहे थे और उन्होंने पूछा कि यह किसका पूजन हो रहा है? कायस्थों ने उत्तर दिया: हे राजन्! हम श्री चित्रगुप्तजी की यह शुभ पूजा कर रहे हैं। यह सुनकर राजा ने कहा: मैं भी चित्रगुप्तजी का पूजन करूंगा। तत्पश्चात विधिपूर्वक स्नान कर, श्रद्धायुक्त मन से राजा ने भी वह पूजन किया। भक्तियुक्त उस पूजन के करने मात्र से राजा सौदास तत्काल पापरहित हो गए और चित्रगुप्तजी के प्रसाद से देवलोक को प्राप्त हुए। हे राजश्रेष्ठ! चित्रगुप्तजी के प्रभाव से जुड़ा यह विचित्र वृत्तांत मैंने आपसे कहा।
यह सुनकर भीष्मजी महर्षि पुलस्त्यजी से बोले: हे मुनिश्रेष्ठ! उस राजा ने किस विधि व किस मंत्र से वहां पूजन किया, जिससे सौदास स्वर्ग को प्राप्त हुए? पुलस्त्यजी बोले: हे भीष्म! चित्रगुप्तजी के पूजन की विधि आपसे कहता हूं। घी से बने नैवेद्य, ऋतुफल, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, अनेक प्रकार के नैवेद्य तथा रेशमी वस्त्र से पूजन करके, भेरी, शंख, मृदंग व अन्य वाद्यों को बजाते हुए भक्तियुक्त होकर चित्रगुप्तजी का पूजन करना चाहिए। जल से भरे कलश के ऊपर शक्कर से भरा एक पात्र रखें, और पूजन के समय यत्नपूर्वक ब्राह्मण को दान दें, तथा भक्तियुक्त मन से चित्रगुप्तजी को नमस्कार करने वाले मंत्रों का पाठ करें।
इसी विधि से संकल्पपूर्वक हे कुरुवंशवर्धक भीष्म! चित्रगुप्तजी का पूजन करना चाहिए। इस प्रकार राजा सौदास ने भक्तिभाव से विधिवत पूजन करते हुए अपना राज्य चलाया, और कुछ काल बाद उनकी मृत्यु हो गई।
अध्याय ३ · यम द्वितीया की उत्पत्ति एवं भीष्म का वरदान
हे भारत! उसी क्षण यमदूत राजा सौदास को भयानक यमलोक ले गए। तब धर्मराज ने चित्रगुप्तजी से पूछा: यह सौदास सदा पाप-कर्म में रत, दुराचारी राजा है, जिसने अपनी प्रजा से भी पाप करवाया। धर्म-अधर्म के ज्ञाता महामति चित्रगुप्तजी ने हंसते हुए कहा: हे सूर्यपुत्र! यह राजा यद्यपि पृथ्वी पर पापकर्मी के रूप में विख्यात है, किंतु आपकी कृपा से पृथ्वी पर पूज्य मैं हूं, और इस राजा ने भक्तिभाव से मेरी पूजा की है। अतः हे देव! मैं इससे संतुष्ट हूं, यह राजा विष्णुपद (वैकुंठ) को जाए। यमराज की आज्ञा से राजा सौदास वैकुंठधाम को चला गया।
पुलस्त्यजी बोले: जो भी अन्य पुरुष अथवा कायस्थ पृथ्वी पर चित्रगुप्तजी की पूजा करेगा, वह पाप से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त करेगा। अतः हे गांगेय! तुम भी विधिपूर्वक इनकी पूजा करो, जिससे दुर्लभ लोक को प्राप्त करोगे। मुनि के इस वचन को सुनकर प्रसन्नचित्त भीष्मजी ने भी वहां भक्तिपूर्वक चित्रगुप्तजी का पूजन किया।
कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया को अपनी बहन यमुना के घर यमराज ने भोजन किया था, जिस कारण इस तिथि का नाम लोक में 'यमद्वितीया' पड़ा। बहन के प्रेम से प्रसन्न होकर यमुना ने यमराज को आयु बढ़ाने का वर दिया। इसीलिए इस तिथि को बहन के हाथ से भोजन करने से धन, यश और आयु भली-भांति बढ़ते हैं।
इस तिथि पर भाई अपनी सामर्थ्य के अनुसार बहन को विधिपूर्वक दक्षिणा दे, और कायस्थ लोग बहन के घर पर ही चित्रगुप्तजी का पूजन करें, रंग-बिरंगे पुष्पों, रक्त चंदन, काले धतूरे के फूल तथा शमी के पत्तों से पूजन करके गुड़-मिश्रित लड्डुओं का नैवेद्य अर्पित करें।
इस प्रकार पूजित होकर प्रसन्न चित्रगुप्तजी ने भीष्म को वर दिया, हे महाबाहो! मेरे प्रसाद से तुम्हारी मृत्यु तब तक नहीं होगी, जब तक तुम स्वयं मृत्यु का स्मरण न करो। ऐसा वर देकर चित्रगुप्तजी स्वर्ग को चले गए। जो बुद्धिमान पुरुष इस विधि से चित्रगुप्तजी का पूजन करेंगे, वे इस लोक में मनोहर सुखों का भोग कर अंततः अविनाशी विष्णुलोक को निःसंदेह प्राप्त होंगे। तथा जो श्रेष्ठ पुरुष भक्तियुक्त मन से कायस्थ-उत्पत्ति की इस दिव्य चित्रगुप्त-कथा को सुनते हैं, वे समस्त रोगों से मुक्त होकर दीर्घायु होंगे, और अंत में तपस्वीजनों के समान विष्णुलोक को प्राप्त करेंगे।
श्री चित्रगुप्त यम द्वितीया व्रत कथा पाठ विधि
कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन स्नान कर, कलम-दावात को स्वच्छ करके भगवान चित्रगुप्त का घी-निर्मित नैवेद्य, ऋतुफल, चंदन, पुष्प, धूप-दीप व रेशमी वस्त्र से पूजन करें। जल से भरे कलश के ऊपर शक्कर से भरा पात्र रखें तथा यथाशक्ति ब्राह्मण को दान दें। बहन के घर जाकर रंग-बिरंगे पुष्पों, रक्त चंदन, काले धतूरे व शमी-पत्र से पुनः चित्रगुप्तजी का पूजन कर गुड़ के लड्डुओं का भोग अर्पित करें, तथा भाई अपनी सामर्थ्य अनुसार बहन को दक्षिणा भेंट करे।
श्री चित्रगुप्त यम द्वितीया व्रत कथा के बारे में
श्री चित्रगुप्त यमद्वितीया व्रत कथा भगवान चित्रगुप्त के जन्म व कायस्थ जाति की उत्पत्ति, राजा सौदास के चित्रगुप्त-पूजन से मुक्ति पाने, तथा यमराज के अपनी बहन यमुना के घर भोजन करने से 'यम द्वितीया' नाम पड़ने की कथा है। इस पृष्ठ पर तीन अध्याय हैं, पहले में चित्रगुप्तजी का जन्म व कायस्थ वंशों की उत्पत्ति, दूसरे में राजा सौदास की कथा व पूजन विधि, तथा तीसरे में यम द्वितीया की उत्पत्ति व भीष्म पितामह को मिले वरदान की कथा है।
यह कथा कार्तिक मास की शुक्ल द्वितीया अर्थात भाई दूज के दिन भगवान चित्रगुप्त के पूजन के समय सुनी जाती है। इस पृष्ठ पर तीनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
श्री चित्रगुप्त यमद्वितीया व्रत कथा स्वयं अपने अंत में स्वयं को श्रीपद्मपुराण के उत्तरखण्ड की कथा बताती है। यहां प्रस्तुत पाठ सन् १९४४ में काशी से प्रकाशित एक संस्कृत-हिंदी पुस्तिका ('श्री चित्रगुप्त पूजन विधि, श्री चित्रगुप्त यमद्वितीया व्रतकथा सहित', संपादक ज्ञानचन्द्र) में दी गई कथा का यथावत रूपांतरण है, जिसमें मूल संस्कृत श्लोकों को न देकर केवल पुस्तिका में साथ दिए गए हिंदी अर्थ को ही आधार बनाया गया है, तथा केवल स्पष्ट मुद्रण-त्रुटियां सुधारी गई हैं। ध्यान रहे कि इसी स्रोत में भीष्म पितामह को इच्छा-मृत्यु का वरदान स्वयं चित्रगुप्तजी से मिलना बताया गया है, जबकि महाभारत की सुप्रसिद्ध कथा में यह वरदान भीष्म को उनके पिता शांतनु से मिला था, यह इसी पुस्तिका की अपनी विशेष परंपरा है, अन्य प्रचलित कथाओं में भिन्नता हो सकती है।
सामान्य प्रश्न
चित्रगुप्त यमद्वितीया व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?
इसमें कुल तीन अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।
कायस्थ जाति की उत्पत्ति कैसे हुई?
कथा के अनुसार दीर्घ समाधि के बाद ब्रह्माजी के शरीर से कलम-दावात लिए एक तेजस्वी पुरुष प्रकट हुआ, जिसे ब्रह्माजी ने 'काया' से उत्पन्न होने के कारण 'कायस्थ' संज्ञा तथा 'चित्रगुप्त' नाम दिया, और धर्मराज की पुरी में धर्म-अधर्म के निर्णय का दायित्व सौंपा।
यम द्वितीया नाम क्यों पड़ा?
कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमराज ने अपनी बहन यमुना के घर भोजन किया था, और बहन के स्नेह से प्रसन्न होकर उन्हें आयु बढ़ाने का वर दिया था, इसी कारण इस तिथि को 'यम द्वितीया' कहा जाता है।
राजा सौदास को चित्रगुप्त पूजन से क्या फल मिला?
पापकर्मी राजा सौदास ने कायस्थों को चित्रगुप्तजी की पूजा करते देख भक्तिभाव से वही पूजन किया, जिससे वे तत्काल पापमुक्त हुए, तथा मृत्यु के पश्चात स्वयं चित्रगुप्तजी की अनुशंसा पर उन्हें वैकुंठ (विष्णुलोक) की प्राप्ति हुई।