देवी कवच

मार्कण्डेय ऋषि के पूछने पर ब्रह्मा जी देवी का गोपनीय कवच बताते हैं। पहले नवदुर्गा के नौ नाम आते हैं, फिर मातृकाओं के वाहन और आयुध। इसके बाद देवी के अलग-अलग नामों से दसों दिशाओं, शरीर के हर अंग, प्राण, इन्द्रियों, आयु, धन और परिवार की रक्षा की प्रार्थना है। अन्त में इसके पाठ का फल बताया गया है, और यह भी कि सप्तशती का पाठ कवच पढ़कर ही आरम्भ करें।

देवी कवच

विनियोग

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।

इस चण्डी कवच के ऋषि ब्रह्मा हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता चामुण्डा हैं। अंगन्यास में कही गई माताएँ इसका बीज हैं और दिशाओं की रक्षा करने वाले देवता इसका तत्त्व। श्री जगदम्बा की प्रसन्नता के लिये, सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसका जप किया जाता है।

ॐ नमश्चण्डिकायै

मूल पाठ

  1. मार्कण्डेय उवाच(मार्कण्डेय जी बोले)

    ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥ १ ॥

    हे पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय है, जो मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करता है और जो आपने अब तक किसी को नहीं बताया, वह मुझे बताइये।

  2. ब्रह्मोवाच(ब्रह्मा जी बोले)

    अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥ २ ॥

    हे ब्राह्मण! एक अत्यन्त गोपनीय साधन है, जो सब प्राणियों का उपकार करता है: देवी का पवित्र कवच। हे महामुने, उसे सुनो।

  3. प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥ ३ ॥

    पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघण्टा और चौथी कूष्माण्डा हैं।

  4. पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥ ४ ॥

    पाँचवीं स्कन्दमाता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि और आठवीं महागौरी हैं।

  5. नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥ ५ ॥

    नौवीं सिद्धिदात्री हैं। ये नवदुर्गा कहलाती हैं। ये नाम स्वयं महात्मा ब्रह्मा ने बताए हैं।

  6. अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥ ६ ॥

    जो आग में जल रहा हो, युद्ध में शत्रुओं के बीच घिर गया हो, या किसी विषम और दुर्गम संकट में हो, ऐसे भय से पीड़ित लोग जब देवी की शरण में जाते हैं,

  7. न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥ ७ ॥

    तो युद्ध के संकट में भी उनका कोई अनिष्ट नहीं होता। ऐसे व्यक्ति पर मुझे कोई विपत्ति नहीं दिखती, उसे शोक, दुःख और भय नहीं होता।

  8. यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥ ८ ॥

    जो भक्ति से देवी का स्मरण करते हैं, उनकी निश्चय ही उन्नति होती है। हे देवेश्वरि! जो तुम्हारा स्मरण करते हैं, उनकी तुम निःसंदेह रक्षा करती हो।

  9. प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥ ९ ॥

    चामुण्डा शव पर विराजती हैं, वाराही भैंसे पर, ऐन्द्री हाथी पर और वैष्णवी गरुड़ पर।

  10. माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥ १० ॥

    माहेश्वरी बैल पर सवार हैं और कौमारी मोर पर। विष्णु की प्रिया लक्ष्मी देवी कमल पर विराजती हैं और हाथ में कमल लिये हैं।

  11. श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥ ११ ॥

    श्वेत रूप वाली ईश्वरी देवी बैल पर सवार हैं, और सब आभूषणों से सजी ब्राह्मी हंस पर।

  12. इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥ १२ ॥

    ये सभी माताएँ सब प्रकार की योग-शक्तियों से सम्पन्न हैं और अनेक आभूषणों व रत्नों से सुशोभित हैं।

  13. दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥ १३ ॥

    ये देवियाँ क्रोध से भरी, रथों पर सवार दिखाई देती हैं। वे शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल,

  14. खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥ १४ ॥

    ढाल, तोमर, फरसा, पाश, भाला, त्रिशूल और उत्तम शार्ङ्ग धनुष,

  15. दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥ १५ ॥

    ऐसे आयुध दैत्यों के शरीर का नाश करने, भक्तों को अभय देने और देवताओं के हित के लिये धारण करती हैं।

  16. नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥ १६ ॥

    हे अत्यन्त रौद्र रूप वाली, महाघोर पराक्रम वाली, महाबलशालिनी, महान उत्साह वाली और महाभय का नाश करने वाली देवी! तुम्हें नमस्कार है।

  17. त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥ १७ ॥

    हे देवि! तुम्हारी ओर देख पाना कठिन है, तुम शत्रुओं का भय बढ़ाती हो, मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऐन्द्री मेरी रक्षा करें और अग्निकोण (दक्षिण-पूर्व) में अग्निदेवता।

  18. दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥ १८ ॥

    दक्षिण में वाराही, नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में खड्गधारिणी, पश्चिम में वारुणी और वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) में मृगवाहिनी रक्षा करें।

  19. उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥ १९ ॥

    उत्तर में कौमारी, ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में शूलधारिणी, ऊपर ब्रह्माणी और नीचे वैष्णवी मेरी रक्षा करें।

  20. एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥ २० ॥

    इस प्रकार शव पर सवार चामुण्डा दसों दिशाओं में रक्षा करें। जया आगे से और विजया पीछे से मेरी रक्षा करें।

  21. अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥ २१ ॥

    बायीं ओर अजिता और दायीं ओर अपराजिता रक्षा करें। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करें और उमा सिर पर विराजकर।

  22. मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥ २२ ॥

    मालाधरी ललाट की, यशस्विनी भौंहों की, त्रिनेत्रा भौंहों के बीच की और यमघण्टा नासिका की रक्षा करें।

  23. शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥ २३ ॥

    शंखिनी दोनों आँखों के बीच, द्वारवासिनी दोनों कानों की, कालिका गालों की और शांकरी कानों की जड़ की रक्षा करें।

  24. नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥ २४ ॥

    सुगन्धा नासिका में, चर्चिका ऊपर के होंठ में, अमृतकला नीचे के होंठ में और सरस्वती जीभ में रक्षा करें।

  25. दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥ २५ ॥

    कौमारी दाँतों की, चण्डिका कण्ठ की, चित्रघण्टा गले की घाँटी की और महामाया तालु की रक्षा करें।

  26. कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥ २६ ॥

    कामाक्षी ठोड़ी की, सर्वमंगला मेरी वाणी की, भद्रकाली गर्दन की और धनुर्धरी रीढ़ की रक्षा करें।

  27. नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥ २७ ॥

    नीलग्रीवा गले के बाहरी भाग की, नलकूबरी गले की नली की, खड्गिनी दोनों कंधों की और वज्रधारिणी मेरी भुजाओं की रक्षा करें।

  28. हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥ २८ ॥

    दण्डिनी हाथों की, अम्बिका उँगलियों की, शूलेश्वरी नखों की और कुलेश्वरी पेट की रक्षा करें।

  29. स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥ २९ ॥

    महादेवी स्तनों की, शोकविनाशिनी मन की, ललिता देवी हृदय की और शूलधारिणी उदर की रक्षा करें।

  30. नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥ ३० ॥

    कामिनी नाभि की, गुह्येश्वरी गुप्त अंग की, पूतना और कामिका जननेन्द्रिय की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें।

  31. कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥ ३१ ॥

    भगवती कमर की, विन्ध्यवासिनी घुटनों की और सब कामनाएँ पूरी करने वाली महाबला पिंडलियों की रक्षा करें।

  32. गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥ ३२ ॥

    नारसिंही टखनों की, तैजसी पैरों के ऊपरी भाग की, श्री पैरों की उँगलियों की और तलवासिनी तलवों की रक्षा करें।

  33. नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥ ३३ ॥

    दंष्ट्राकराली नखों की, ऊर्ध्वकेशिनी बालों की, कौबेरी रोमछिद्रों की और वागीश्वरी त्वचा की रक्षा करें।

  34. रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥ ३४ ॥

    पार्वती रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डियों और मेद की, कालरात्रि आँतों की और मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें।

  35. पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥ ३५ ॥

    पद्मावती पद्मकोश की, चूडामणि कफ की, ज्वालामुखी नखों की दीप्ति की और अभेद्या सब जोड़ों की रक्षा करें।

  36. शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥ ३६ ॥

    ब्रह्माणी मेरे वीर्य की, छत्रेश्वरी छाया की, और धर्मधारिणी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करें।

  37. प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥ ३७ ॥

    वज्रहस्ता प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करें, और कल्याणशोभना मेरे प्राणों की।

  38. रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥ ३८ ॥

    योगिनी रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श में मेरी रक्षा करें, और नारायणी सदा सत्त्व, रज और तम की रक्षा करें।

  39. आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥ ३९ ॥

    वाराही आयु की, वैष्णवी धर्म की, और चक्रिणी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन और विद्या की रक्षा करें।

  40. गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥ ४० ॥

    इन्द्राणी मेरे कुल की रक्षा करें। हे चण्डिके, मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की और भैरवी पत्नी की रक्षा करें।

  41. पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥ ४१ ॥

    सुपथा मेरे पथ की और क्षेमकरी मार्ग की रक्षा करें। राजद्वार पर महालक्ष्मी रक्षा करें, और सब ओर स्थित विजया।

  42. रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥ ४२ ॥

    जो स्थान रक्षा से रहित रह गया है और इस कवच में नहीं आया, हे पापों का नाश करने वाली जयन्ती देवि, उस सबकी रक्षा करो।

  43. पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥ ४३ ॥

    जो अपना कल्याण चाहे, वह कवच के बिना एक पग भी न चले। कवच से सदा ढका रहकर वह जहाँ-जहाँ जाता है,

  44. तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥ ४४ ॥

    वहाँ-वहाँ उसे धन का लाभ और सब कामनाएँ पूरी करने वाली विजय मिलती है। वह जिस-जिस कामना का चिन्तन करता है, उसे निश्चय ही पाता है, और इस पृथ्वी पर अतुलनीय परम ऐश्वर्य प्राप्त करता है।

  45. निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥ ४५ ॥

    कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है, युद्धों में कभी पराजित नहीं होता और तीनों लोकों में पूजनीय होता है।

  46. इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्।यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥ ४६ ॥

    देवी का यह कवच देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। जो इसे संयम और श्रद्धा के साथ प्रतिदिन तीनों संध्याओं में पढ़ता है,

  47. दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥ ४७ ॥

    उसे दिव्य शक्ति प्राप्त होती है, वह तीनों लोकों में अपराजित रहता है और अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष से भी अधिक जीता है।

  48. नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥ ४८ ॥

    मकड़ी के विष से होने वाले रोग, फोड़े-फुंसी आदि सब व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। पौधों और खनिजों का, जीवों का और बनाया हुआ, जो भी विष है,

  49. अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥ ४९ ॥

    पृथ्वी पर के सब अभिचार (दूसरों का अहित करने के प्रयोग), मन्त्र और यन्त्र, भूमि पर, आकाश में और जल में विचरने वाले, और सिखाकर भेजे गए (उपद्रव),

  50. सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥ ५० ॥

    सहजा, कुलजा, माला, डाकिनी, शाकिनी, आकाश में घूमने वाली भयानक और महाबली डाकिनियाँ,

  51. ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥ ५१ ॥

    ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि,

  52. नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥ ५२ ॥

    ये सब, हृदय में कवच धारण किये हुए उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। राजा से उसे सम्मान और उन्नति मिलती है। यह कवच तेज बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।

  53. यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥ ५३ ॥

    वह पृथ्वी पर यश से बढ़ता है और कीर्ति से शोभित होता है। पहले कवच का पाठ करके फिर सप्तशती चण्डी का जप करना चाहिये।

  54. यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥ ५४ ॥

    जब तक पर्वतों, वनों और उपवनों सहित यह भूमण्डल टिका है, तब तक पृथ्वी पर उसकी पुत्र-पौत्र आदि संतति बनी रहती है।

  55. देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥ ५५ ॥

    देह छूटने पर वह मनुष्य महामाया की कृपा से उस परम धाम को पाता है, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है।

  56. लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ ॐ॥ ५६ ॥

    वह परम दिव्य रूप पाकर भगवान शिव के साथ आनन्द करता है।

इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।