मुख्यत्योहारशीतला अष्टमी (बसोड़ा)
शीतलता व आरोग्य की देवी का पूजन · चैत्र कृष्ण अष्टमी

शीतला अष्टमी (बसोड़ा)

शीतला अष्टमी होली के आठ दिन पश्चात चैत्र मास की कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है, जिस दिन माता शीतला का पूजन कर उन्हें एक दिन पूर्व बनाया गया बासी भोजन अर्पित किया जाता है।

शीतला अष्टमी (बसोड़ा)
अगली तिथि
३० मार्च २०२७

यह पर्व होली के ठीक आठ दिन पश्चात मनाया जाता है, तथा इसे 'बसोड़ा' भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन बासी (एक दिन पूर्व बना) भोजन ग्रहण किया जाता है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।

शीतला अष्टमी (बसोड़ा) का महत्व

माता शीतला को शीतलता, स्वच्छता व आरोग्य की देवी माना जाता है, तथा विशेष रूप से चेचक, खसरा व अन्य त्वचा संबंधी रोगों से रक्षा हेतु उनका पूजन किया जाता है। मान्यता है कि उनकी कृपा से इन रोगों का प्रकोप शांत होता है तथा शरीर को शीतलता प्राप्त होती है।

शीतला अष्टमी व्रत कथा
कथा · कुम्हारन की सेवा व वरदान की कथा

माता शीतला को गधे की सवारी करते हुए, एक हाथ में झाड़ू, दूसरे में सूप (अनाज फटकने का पात्र) व शीतल जल से भरा कलश धारण किए हुए दर्शाया जाता है। झाड़ू व सूप स्वच्छता के प्रतीक हैं, जो रोगों से बचाव में स्वच्छता के महत्व को दर्शाते हैं।

इस दिन भोजन एक दिन पूर्व, अर्थात सप्तमी को ही बना लिया जाता है, तथा अष्टमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता, केवल बासी व ठंडा भोजन ही ग्रहण किया जाता है, यह परंपरा शीतलता के भाव को जीवन में उतारने का प्रतीक मानी जाती है।

शीतला अष्टमी (बसोड़ा) कैसे मनाई जाती है

स्त्रियां सप्तमी की संध्या को अगले दिन हेतु पूड़ी, पुए, मीठे चावल, राबड़ी जैसे व्यंजन बना लेती हैं, तथा अष्टमी की प्रातःकाल स्नान कर बिना चूल्हा जलाए उसी बासी भोजन को माता शीतला को अर्पित करती हैं।

गांव व मोहल्लों में स्थित शीतला माता के मंदिर अथवा स्थान पर स्त्रियां समूह में जाकर पूजन करती हैं, शीतल जल व बासी भोजन अर्पित करती हैं, तथा माता शीतला की कथा सुनती हैं।

दुर्गा आरती
आरती · माता शीतला पूजन में गाई जाने वाली आरती

पूजा के पश्चात प्रसाद स्वरूप वही बासी भोजन परिवार सहित ग्रहण किया जाता है। कुछ स्थानों पर बच्चों को स्वस्थ रहने की कामना से माता शीतला के चरणों में विशेष प्रार्थना भी की जाती है।

शीतला अष्टमी (बसोड़ा) पूजा विधि

सप्तमी की संध्या को अगले दिन हेतु भोजन पहले से बना लें। अष्टमी को प्रातःकाल स्नान कर बिना चूल्हा जलाए माता शीतला का पूजन करें, उन्हें बासी भोजन व शीतल जल अर्पित करें, तथा कथा सुनकर प्रसाद स्वरूप वही भोजन ग्रहण करें।

शीतला अष्टमी व्रत कथा पढ़ें
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शीतला अष्टमी (बसोड़ा) के बारे में

शीतला अष्टमी (बसोड़ा) होली के आठ दिन पश्चात चैत्र कृष्ण अष्टमी को मनाई जाने वाला पर्व है, जिसमें माता शीतला का पूजन कर बासी भोजन अर्पित किया जाता है। इस पृष्ठ पर इस पर्व का महत्व, माता शीतला के स्वरूप, तथा बासी भोजन की परंपरा की जानकारी दी गई है।

इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

सामान्य प्रश्न

शीतला अष्टमी कब मनाई जाती है?

शीतला अष्टमी प्रत्येक वर्ष चैत्र मास की कृष्ण अष्टमी तिथि को, होली के ठीक आठ दिन पश्चात मनाई जाती है।

इसे बसोड़ा क्यों कहा जाता है?

इस दिन भोजन एक दिन पूर्व बनाकर रखा जाता है तथा घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता, केवल बासी भोजन ही ग्रहण किया जाता है, इसीलिए इसे बसोड़ा कहा जाता है।

माता शीतला किसकी देवी हैं?

माता शीतला को शीतलता, स्वच्छता व आरोग्य की देवी माना जाता है, तथा विशेष रूप से चेचक, खसरा व त्वचा संबंधी रोगों से रक्षा हेतु उनका पूजन किया जाता है।

शीतला अष्टमी पर चूल्हा क्यों नहीं जलाया जाता?

माता शीतला के शीतलता के भाव का सम्मान करते हुए, इस दिन घर में अग्नि (चूल्हा) नहीं जलाई जाती, तथा एक दिन पूर्व बनाया गया ठंडा व बासी भोजन ही ग्रहण किया जाता है।

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मुख्य जानकारी

देवतामाता शीतला
तिथिचैत्र कृष्ण अष्टमी
विशेष अनुष्ठानबासी भोजन का भोग, चूल्हा न जलाना
क्षेत्रउत्तर भारत, विशेषकर राजस्थान व उत्तर प्रदेश
महत्वरोगों, विशेषकर चेचक-खसरा से रक्षा