यह एकादशी मकर संक्रांति से कुछ दिन पूर्व आती है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।
सफला एकादशी का महत्व
पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि चंपावती नगरी के राजर्षि माहिष्मत के पांच पुत्र थे। उनमें सबसे बड़ा सदा पापकर्मों में लगा रहता था, पिता का धन कुकर्मों में उड़ाता था और देवताओं, ब्राह्मणों व वैष्णवों की निंदा करता था। इसलिए राजा ने उसका नाम लुम्पक रख दिया, और पिता व भाइयों ने मिलकर उसे राज्य से निकाल दिया।
लुम्पक वन में रहकर नगर का धन लूटने लगा, और मांस व वृक्षों के फल खाकर जीता था। उसका ठिकाना एक बहुत पुराने पीपल के वृक्ष के पास था, जिसे उस वन में महान देवता माना जाता था। पौष कृष्ण दशमी को उसने फल खाए और वस्त्र न होने के कारण रात भर जाड़े में ठिठुरता रहा। एकादशी को वह दोपहर तक बेहोश पड़ा रहा, फिर लड़खड़ाता हुआ वन से फल लेकर लौटा, तब तक सूर्यास्त हो गया।
उसने वे सब फल पीपल की जड़ में रखकर कहा, 'इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान विष्णु संतुष्ट हों', और रात भर जागता रहा। इस तरह अनायास ही उससे सफला एकादशी का उपवास और जागरण हो गया। आकाशवाणी हुई कि सफला के प्रसाद से उसे राज्य और पुत्र मिलेंगे। उसका रूप दिव्य हो गया, उसने पंद्रह वर्ष निष्कंटक राज्य किया, फिर पुत्र को राज्य सौंपकर वह भगवान श्रीकृष्ण के धाम चला गया।
सफला एकादशी कैसे मनाई जाती है
भक्तगण इस दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं, तथा दिनभर फलाहार व्रत रखते हैं। भगवान विष्णु का पूजन कर सफला एकादशी की कथा का श्रवण किया जाता है।
रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन किया जाता है, तथा भगवान विष्णु को बेर, नारियल, सुपारी व अन्य फलों का भोग अर्पित करने की परंपरा है। अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में व्रत का पारण किया जाता है।
यह व्रत विशेष रूप से नए कार्यों के आरंभ, व्यापार में उन्नति अथवा किसी महत्वपूर्ण प्रयास में सफलता की कामना से रखा जाता है, तथा राजकुमार लुम्पक की कथा इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि श्रद्धा भाव से किया गया प्रयास अनजाने में भी सफल होता है।
सफला एकादशी पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लें तथा फलाहार व्रत रखें। भगवान विष्णु का पूजन कर सफला एकादशी की कथा सुनें, तथा बेर व अन्य फलों का भोग अर्पित करें। रात्रि जागरण करें, तथा अगले दिन द्वादशी को व्रत का पारण करें।
सफला एकादशी के बारे में
सफला एकादशी पौष मास की कृष्ण एकादशी को कार्यों में सफलता की कामना से रखा जाने वाला व्रत है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, राजकुमार लुम्पक की कथा, तथा व्रत-विधि की जानकारी दी गई है।
सामान्य प्रश्न
सफला एकादशी कब मनाई जाती है?
यह व्रत प्रत्येक वर्ष पौष मास की कृष्ण एकादशी तिथि को, मकर संक्रांति से कुछ दिन पूर्व मनाया जाता है।
राजकुमार लुम्पक की कथा क्या है?
पिता द्वारा निकाला गया दुराचारी राजकुमार लुम्पक जाड़े और दुर्बलता के कारण एकादशी पर कुछ खा न सका, संध्या को फल पीपल की जड़ में भगवान विष्णु को अर्पित किए और रात भर जागता रहा। इस अनजाने व्रत के फल से उसे दिव्य रूप, राज्य और पुत्र मिला।
सफला एकादशी को यह नाम क्यों दिया गया?
'सफला' का अर्थ है 'फलदायी', इस व्रत को कार्यों में सफलता व समस्त प्रयासों को फलदायी बनाने वाला माना जाता है, इसीलिए इसका नाम सफला एकादशी पड़ा।
क्या अनजाने में किया गया व्रत भी फलदायी होता है?
राजकुमार लुम्पक की कथा के अनुसार, परिस्थितिवश अनजाने में हुआ एकादशी व्रत व जागरण भी भगवान विष्णु को प्रसन्न कर सकता है, जिससे इस व्रत की महिमा और भी विशेष मानी जाती है।
