एक अन्य 'पुत्रदा एकादशी' श्रावण मास की शुक्ल पक्ष में भी आती है, जो इससे भिन्न तिथि है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।
पौष पुत्रदा एकादशी का महत्व
पद्म पुराण के अनुसार, भद्रावती नगरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे, जिनकी रानी का नाम चंपका था। बहुत समय तक कोई वंशधर पुत्र न होने से दोनों चिंता और शोक में डूबे रहते थे, और राजा के पितर भी यह सोचकर दुखी रहते थे कि राजा के बाद उनका तर्पण कौन करेगा।
एक दिन राजा अकेले घोड़े पर सवार होकर घने वन में चले गए। दोपहर में भूख-प्यास से व्याकुल होकर वे जल खोजते हुए एक सरोवर के पास पहुंचे, जिसके तट पर मुनियों के आश्रम थे और मुनि वेद-पाठ कर रहे थे। ये विश्वेदेव थे, जो माघ स्नान के लिए आए थे, क्योंकि पांच दिन बाद माघ स्नान आरंभ होने वाला था। उन्होंने राजा को बताया कि आज ही पुत्रदा एकादशी है।
मुनियों के कहने पर राजा ने उसी दिन विधिपूर्वक पुत्रदा एकादशी का व्रत किया, द्वादशी को पारण करके मुनियों को प्रणाम किया और घर लौट आए। इसके बाद रानी ने गर्भ धारण किया और समय आने पर तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसने अपने गुणों से पिता को संतुष्ट किया और प्रजा का पालक बना। पुराण के अनुसार इस माहात्म्य को पढ़ने-सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।
पौष पुत्रदा एकादशी कैसे मनाई जाती है
भक्त दंपत्ति इस दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं, तथा दिनभर फलाहार व्रत रखते हैं। भगवान विष्णु की प्रतिमा अथवा चित्र का पूजन कर विष्णु सहस्रनाम व पुत्रदा एकादशी की कथा का पाठ किया जाता है।
रात्रि में भजन-कीर्तन व जागरण करने की परंपरा है, तथा अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में ब्राह्मण भोज व दान के पश्चात व्रत का पारण किया जाता है।
यह व्रत विशेष रूप से उन दंपत्तियों द्वारा रखा जाता है जो संतान-सुख की कामना रखते हैं, तथा इसे भगवान विष्णु की कृपा से इस कामना की पूर्ति हेतु अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
पौष पुत्रदा एकादशी पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लें तथा दिनभर फलाहार व्रत रखें। भगवान विष्णु का पूजन कर विष्णु सहस्रनाम व पुत्रदा एकादशी की कथा का पाठ करें। अगले दिन द्वादशी को शास्त्रोक्त पारण-मुहूर्त में दान देकर व्रत का पारण करें।
पौष पुत्रदा एकादशी के बारे में
पौष पुत्रदा एकादशी पौष मास की शुक्ल एकादशी को संतान-प्राप्ति की कामना से रखा जाने वाला व्रत है। इस पृष्ठ पर इस व्रत का महत्व, राजा सुकेतुमान की कथा, तथा व्रत-विधि की जानकारी दी गई है।
सामान्य प्रश्न
पौष पुत्रदा एकादशी कब मनाई जाती है?
यह व्रत प्रत्येक वर्ष पौष मास की शुक्ल एकादशी तिथि को मनाया जाता है।
पुत्रदा एकादशी वर्ष में कितनी बार आती है?
'पुत्रदा एकादशी' नाम की दो अलग एकादशियां हैं, एक पौष मास की शुक्ल पक्ष में, तथा दूसरी श्रावण मास की शुक्ल पक्ष में, दोनों संतान-प्राप्ति की कामना से रखी जाती हैं।
राजा सुकेतुमान की कथा क्या है?
संतानहीन राजा सुकेतुमान को वन में एक सरोवर के तट पर विश्वेदेव मुनि मिले, जिनके कहने पर उन्होंने उसी दिन पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा। लौटने के बाद रानी चंपका ने गर्भ धारण किया और उन्हें एक तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ।
पुत्रदा एकादशी व्रत में क्या करना चाहिए?
इस दिन फलाहार व्रत रखकर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए, विष्णु सहस्रनाम व एकादशी कथा का पाठ करना चाहिए, तथा अगले दिन शास्त्रोक्त मुहूर्त में व्रत का पारण करना चाहिए।
