कालभैरव जयंती
कालभैरव जयंती मार्गशीर्ष मास की कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है, जिस दिन भगवान शिव अपने उग्र स्वरूप कालभैरव के रूप में प्रकट हुए थे, जिन्हें काशी नगरी का कोतवाल (रक्षक) माना जाता है।

इसे उत्तर भारत में मार्गशीर्ष व दक्षिण भारत में कार्तिक मास की कृष्ण अष्टमी कहा जाता है, यह पूर्णिमांत व अमांत पंचांग गणना का अंतर है, तिथि वही रहती है। इसे 'भैरवाष्टमी' अथवा 'काल भैरव अष्टमी' भी कहा जाता है। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।
कालभैरव जयंती का महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी व भगवान शिव के मध्य श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ, जिसमें ब्रह्मा जी के पांचवें मुख ने भगवान शिव के प्रति अपमानजनक व मिथ्या वचन कहे। इससे क्रुद्ध होकर भगवान शिव ने अपने उग्र स्वरूप कालभैरव को प्रकट किया, जिन्होंने अपने नखाग्र से ब्रह्मा जी का वह पांचवां मुख उसी क्षण काट दिया।
चूंकि ब्रह्मा जी को स्वयं ब्रह्म स्वरूप माना जाता है, अतः उनका वध करने से कालभैरव को ब्रह्महत्या का पाप लगा, तथा वह कटा हुआ मुख (कपाल) उनके हाथ से चिपक गया। इस पाप से मुक्ति हेतु कालभैरव भिक्षाटन करते हुए संपूर्ण पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे।
अंततः कालभैरव काशी नगरी पहुंचे, जहां उनका यह पाप नष्ट हो गया तथा कपाल उनके हाथ से गिर गया। इसी घटना के स्मरण में काशी को कपाल-मोचन तीर्थ भी कहा जाता है, तथा भगवान कालभैरव को स्वयं भगवान विश्वनाथ ने काशी नगरी का कोतवाल (रक्षक) नियुक्त किया, जिनकी अनुमति के बिना काशी में कोई प्रवेश अथवा प्रस्थान नहीं कर सकता, ऐसी मान्यता है।
कालभैरव जयंती कैसे मनाई जाती है
भक्तगण इस दिन प्रातःकाल से व्रत रखते हैं, तथा रात्रि में भगवान कालभैरव का विशेष पूजन करते हैं, क्योंकि इन्हें रात्रि व तंत्र-साधना का देवता माना जाता है। काशी के कालभैरव मंदिर में इस दिन विशेष श्रृंगार व आरती का आयोजन किया जाता है।
काले कुत्ते को भगवान कालभैरव का वाहन व दूत माना जाता है, अतः इस दिन काले कुत्तों को भोजन कराना विशेष पुण्यदायी माना जाता है। भक्तगण भैरव चालीसा व भैरव अष्टक का पाठ भी करते हैं।
कालभैरव को भय, शत्रु-बाधा व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाला देवता माना जाता है, अतः इस दिन उनकी उपासना विशेष रूप से संकटों से मुक्ति व सुरक्षा की कामना से की जाती है।
कालभैरव जयंती पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर दिनभर व्रत रखें। रात्रि में भगवान कालभैरव का पूजन करें, भैरव चालीसा व भैरव अष्टक का पाठ करें। संभव हो तो काले कुत्ते को भोजन कराएं। पूजा के पश्चात प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करें।
कालभैरव जयंती के बारे में
कालभैरव जयंती मार्गशीर्ष मास की कृष्ण अष्टमी को भगवान शिव के उग्र स्वरूप कालभैरव के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। इस पृष्ठ पर इस दिवस का महत्व, ब्रह्महत्या व कपाल-मोचन की कथा, तथा काशी से जुड़े संबंध की जानकारी दी गई है।
इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
कालभैरव जयंती कब मनाई जाती है?
कालभैरव जयंती प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास की कृष्ण अष्टमी तिथि को मनाई जाती है, जिसे भैरवाष्टमी भी कहा जाता है।
कालभैरव की उत्पत्ति कैसे हुई?
ब्रह्मा जी के पांचवें मुख द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने पर क्रुद्ध होकर भगवान शिव ने अपने उग्र स्वरूप कालभैरव को प्रकट किया, जिन्होंने उस मुख को काट दिया।
काशी को कालभैरव का कोतवाल क्यों कहा जाता है?
ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होकर काशी में कपाल गिरने के पश्चात, भगवान विश्वनाथ ने कालभैरव को काशी नगरी का रक्षक (कोतवाल) नियुक्त किया, जिनकी अनुमति के बिना काशी में प्रवेश अथवा प्रस्थान नहीं माना जाता।
कालभैरव जयंती पर काले कुत्ते को भोजन क्यों कराया जाता है?
काले कुत्ते को भगवान कालभैरव का वाहन व दूत माना जाता है, अतः इस दिन उन्हें भोजन कराना भगवान कालभैरव की कृपा प्राप्त करने का एक विशेष उपाय माना जाता है।