कजरी तीज
कजरी तीज भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष तृतीया को मनाया जाने वाला पर्व है, जिसमें सुहागिन स्त्रियां पति की दीर्घायु व सुखी दांपत्य जीवन की कामना से नीमड़ी माता का पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं।

उत्तर भारतीय (पूर्णिमांत) पंचांग के अनुसार कजरी तीज भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष तृतीया को, तथा दक्षिण भारतीय (अमांत) पंचांग के अनुसार श्रावण मास की कृष्ण पक्ष तृतीया को आती है, दोनों ही गणनाओं में यह वास्तव में एक ही दिन पड़ती है, केवल मास-गणना पद्धति का अंतर है। यह हरियाली तीज के पंद्रह दिन पश्चात, रक्षाबंधन के तीन दिन बाद तथा कृष्ण जन्माष्टमी से पांच दिन पूर्व आती है।
कजरी तीज का महत्व
कजरी तीज को 'बड़ी तीज' भी कहा जाता है, जो श्रावण की हरियाली तीज, जिसे 'छोटी तीज' कहा जाता है, के ठीक विपरीत मानी जाती है। यह पर्व मुख्यतः सुहागिन स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु व सुखी दांपत्य जीवन की कामना से, तथा अविवाहित कन्याओं द्वारा अच्छे वर की प्राप्ति की कामना से मनाया जाता है।
इस दिन को 'कजली तीज' भी कहा जाता है, क्योंकि इस अवसर पर उत्तर प्रदेश व बिहार के क्षेत्रों में ढोलक की थाप पर विशेष 'कजरी' लोकगीत गाने की परंपरा है, जो सावन-भादो की वर्षा ऋतु के सुख-दुख का वर्णन करते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम कजरी/कजली तीज पड़ा।
कुछ क्षेत्रों में इसे 'सातुड़ी तीज' भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन जौ, गेहूं, चने व चावल के सत्तू में घी व मेवा मिलाकर विशेष पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें चंद्रोदय के पश्चात ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है।
कजरी तीज कैसे मनाई जाती है
संध्या समय स्त्रियां सोलह श्रृंगार कर, दीवार के सहारे मिट्टी व गोबर से एक छोटा तालाब-सा आकार बनाती हैं, जिसकी मेड़ घी व गुड़ से बांधी जाती है तथा पास में नीम की टहनी रोप दी जाती है। इसी स्वरूप में नीमड़ी माता, पार्वती जी का एक लोक-रूप, का पूजन किया जाता है, जिसमें मेहंदी, रोली व काजल की बिंदियां लगाकर वस्त्र व मोली अर्पित की जाती है।
पूजन के पश्चात चंद्रमा को जल, रोली, मोली व अक्षत सहित अर्घ्य दिया जाता है, तथा चांदी की अंगूठी व गेहूं के दाने हाथ में लेकर एक ही स्थान पर चार बार घूमा जाता है। यह व्रत सामान्यतः निर्जला रखा जाता है, यद्यपि गर्भवती स्त्रियां फलाहार भी कर सकती हैं।
घरों में झूले सजाए जाते हैं, तथा स्त्रियां एकत्रित होकर झूला झूलते हुए नृत्य व कजरी गीतों का गायन करती हैं। इस दिन गायों का भी विशेष पूजन किया जाता है, आटे की सात लोइयों पर घी-गुड़ रखकर उन्हें गाय को खिलाने के पश्चात ही स्त्रियां स्वयं भोजन ग्रहण करती हैं।
कजरी तीज पूजा विधि
संध्या समय स्नान कर सोलह श्रृंगार करें। दीवार के सहारे मिट्टी-गोबर से तालाब-सा आकार बनाकर नीम की टहनी रोपें, तथा नीमड़ी माता का मेहंदी, रोली, काजल, वस्त्र व मोली से पूजन करें। चंद्रोदय पर चंद्रमा को जल, रोली व अक्षत सहित अर्घ्य दें, तथा सत्तू से बने पकवान ग्रहण कर व्रत का पारण करें।
कजरी तीज के बारे में
कजरी तीज भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष तृतीया को मनाया जाने वाला पर्व है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान व मध्य प्रदेश में विशेष रूप से मनाया जाता है। इस पृष्ठ पर इस पर्व का महत्व, नीमड़ी माता पूजन व चंद्र-अर्घ्य की विधि, तथा कजरी गीतों की परंपरा की जानकारी दी गई है।
यह पर्व सावन की हरियाली तीज व भाद्रपद की ही हरतालिका तीज के साथ, वर्ष की तीन प्रमुख तीज में गिना जाता है। इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
कजरी तीज कब मनाई जाती है?
कजरी तीज प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष तृतीया तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्यतः अगस्त में आती है।
कजरी तीज को बड़ी तीज क्यों कहा जाता है?
श्रावण मास की हरियाली तीज को 'छोटी तीज' कहा जाता है, तथा उसके ठीक पंद्रह दिन पश्चात आने वाली कजरी तीज को उसकी तुलना में 'बड़ी तीज' कहा जाता है।
नीमड़ी माता कौन हैं?
नीमड़ी माता मां पार्वती का एक लोक-रूप हैं, जिनकी पूजा कजरी तीज पर नीम की टहनी व मिट्टी-गोबर से बने तालाब-रूपी प्रतीक के समक्ष की जाती है।
कजरी गीत क्या हैं?
कजरी गीत उत्तर प्रदेश व बिहार की लोकगीत परंपरा हैं, जो सावन-भादो की वर्षा ऋतु के सुख-दुख का वर्णन करते हैं तथा कजरी तीज के अवसर पर ढोलक की थाप पर विशेष रूप से गाए जाते हैं।
यदि चंद्रोदय न दिखे तो व्रत कैसे खोलें?
यदि बादलों के कारण चंद्रमा दिखाई न दे, तो रात्रि लगभग साढ़े ग्यारह बजे आकाश की दिशा में ही अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जा सकता है।