जगन्नाथ रथ यात्रा
जगन्नाथ रथ यात्रा आषाढ़ मास की शुक्ल द्वितीया को मनाया जाने वाला पर्व है, जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा सहित विशाल रथों में सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं।

रथ यात्रा के नौ दिन पश्चात, दशमी तिथि को, भगवान जगन्नाथ की वापसी यात्रा 'बहुड़ा यात्रा' होती है, जिसमें रथ पुनः मुख्य मंदिर की ओर लौटते हैं। सटीक तिथि हेतु नज़दीकी पंचांग देखें।
जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व
'जगन्नाथ' का अर्थ है 'जगत के स्वामी', तथा यह भगवान श्रीकृष्ण का ही एक स्वरूप है, जो विशेष रूप से पुरी में पूजा जाता है। कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने विश्वकर्मा जी से भगवान की प्रतिमा बनवाने का अनुरोध किया, इस शर्त पर कि उन्हें कार्य के दौरान कोई न देखे। रानी की अधीरता के कारण द्वार समय से पूर्व खोल दिया गया, जिससे विश्वकर्मा जी कार्य अधूरा छोड़कर चले गए, और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा की प्रतिमाएं बिना पूर्ण हाथ-पैर के ही रह गईं, जो आज भी इसी अनूठे स्वरूप में पूजी जाती हैं।
वर्ष में एक बार भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन सहित मुख्य मंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर तक की यात्रा करते हैं, जिसे उनकी मौसी का घर अथवा जन्मस्थान माना जाता है। यह यात्रा इस भाव को दर्शाती है कि भगवान वर्ष में एक बार स्वयं अपने भक्तों के बीच, मंदिर की परिधि से बाहर आकर, बिना किसी भेदभाव के सबको दर्शन देते हैं।
तीनों रथों के अपने-अपने नाम हैं, भगवान जगन्नाथ का रथ 'नंदीघोष', बलभद्र जी का 'तालध्वज', तथा सुभद्रा जी का 'दर्पदलन' कहलाता है। प्रत्येक वर्ष ये रथ नीम की लकड़ी से नए सिरे से बनाए जाते हैं, तथा रथ यात्रा पूरी हो जाने के पश्चात इनकी लकड़ी को पवित्र मानकर उपयोग में लाया जाता है।
जगन्नाथ रथ यात्रा कैसे मनाई जाती है
रथ यात्रा के दिन पुरी के गजपति राजा स्वयं सोने की झाड़ू से रथों की सफाई करते हैं, जिसे 'छेरा पहरा' कहा जाता है। यह परंपरा दर्शाती है कि भगवान के समक्ष राजा से लेकर सामान्य भक्त तक सभी समान हैं।
हज़ारों श्रद्धालु मोटी रस्सियों से इन विशाल रथों को खींचते हैं, तथा 'जय जगन्नाथ' के जयकारों के बीच पूरा नगर भक्तिमय हो उठता है। मान्यता है कि रथ खींचने अथवा उसे छूने मात्र से भी विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
नौ दिन पश्चात दशमी तिथि को 'बहुड़ा यात्रा' के साथ भगवान की वापसी होती है। पुरी के अतिरिक्त विश्वभर में इस्कॉन सहित अनेक संस्थाओं द्वारा भी छोटे रूप में रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है।
जगन्नाथ रथ यात्रा पूजा विधि
संभव हो तो पुरी की रथ यात्रा में सम्मिलित होकर रथ को खींचें अथवा दर्शन करें। अन्यथा घर पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा का ध्यान कर श्रीकृष्ण आरती करें, तथा 'जय जगन्नाथ' का जाप करते हुए भगवान की कृपा की कामना करें।
जगन्नाथ रथ यात्रा के बारे में
जगन्नाथ रथ यात्रा आषाढ़ मास की शुक्ल द्वितीया को मनाया जाने वाला पुरी का प्रसिद्ध महापर्व है, जिसमें भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन सहित विशाल रथों में नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इस पृष्ठ पर इस पर्व का महत्व, भगवान जगन्नाथ के अनूठे स्वरूप की कथा, तथा छेरा पहरा व बहुड़ा यात्रा जैसी परंपराओं की जानकारी दी गई है।
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सामान्य प्रश्न
जगन्नाथ रथ यात्रा कब मनाई जाती है?
जगन्नाथ रथ यात्रा प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की शुक्ल द्वितीया तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्यतः जून-जुलाई में आती है।
भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा अधूरी क्यों दिखती है?
कथा के अनुसार, रानी की अधीरता के कारण विश्वकर्मा जी को प्रतिमा-निर्माण का कार्य अधूरा छोड़ना पड़ा था, जिस कारण भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा की प्रतिमाएं आज भी बिना पूर्ण हाथ-पैर के इसी स्वरूप में पूजी जाती हैं।
छेरा पहरा क्या है?
छेरा पहरा पुरी के गजपति राजा द्वारा सोने की झाड़ू से रथों की सफाई करने की परंपरा है, जो भगवान के समक्ष सबकी समानता को दर्शाती है।
बहुड़ा यात्रा क्या है?
बहुड़ा यात्रा रथ यात्रा के नौ दिन पश्चात, दशमी तिथि को होने वाली भगवान जगन्नाथ की वापसी यात्रा है, जिसमें रथ पुनः मुख्य मंदिर की ओर लौटते हैं।