अनंत चतुर्दशी (गणेश विसर्जन)
अनंत चतुर्दशी भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाती है, जिस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है, तथा दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन गणेश विसर्जन के साथ होता है।

यह तिथि गणेश चतुर्थी से ठीक दस दिन पश्चात आती है, इसीलिए दस दिवसीय गणेशोत्सव मनाने वाले घरों व सार्वजनिक पंडालों में इसी दिन गणेश विसर्जन किया जाता है। कुछ परिवार डेढ़, पांच अथवा सात दिन में भी विसर्जन कर देते हैं, ऐसे में उनकी विसर्जन तिथि इससे भिन्न होगी।
अनंत चतुर्दशी (गणेश विसर्जन) का महत्व
अनंत चतुर्दशी की कथा महाभारत काल से जुड़ी है। कथा के अनुसार, महर्षि कौंडिन्य की पत्नी सुशीला ने वन में एक स्त्री-समूह से 'अनंत व्रत' की विधि सीखी और चौदह गांठों वाला रेशमी सूत्र अपनी भुजा पर बांधा, जिसके प्रभाव से उनके घर में समृद्धि लौट आई। जब कौंडिन्य को इस सूत्र की शक्ति पर संदेह हुआ और उन्होंने उसे जलाकर नष्ट कर दिया, तो उनका सारा वैभव नष्ट हो गया।
पश्चाताप में भटकते हुए कौंडिन्य को स्वयं भगवान विष्णु ने विभिन्न रूपों में दर्शन देकर अनंत व्रत की महिमा समझाई और श्रद्धापूर्वक पुनः व्रत करने का मार्ग दिखाया। इसी व्रत को महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण के परामर्श पर युधिष्ठिर ने भी वनवास के समय किया था, जिसके पश्चात पांडवों को उनका राज्य पुनः प्राप्त हुआ।
अनंत सूत्र की चौदह गांठें चौदह भुवनों (लोकों) की प्रतीक मानी जाती हैं। पुरुष इसे दाहिनी भुजा पर तथा स्त्रियां बाईं भुजा पर धारण करती हैं, और अगले वर्ष की अनंत चतुर्दशी तक इसे पहने रखा जाता है। इसी तिथि को दस दिवसीय गणेशोत्सव मनाने वाले भक्त गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन भी करते हैं, जो सृष्टि व लय के चक्र का प्रतीक है।
अनंत चतुर्दशी (गणेश विसर्जन) कैसे मनाई जाती है
भक्त प्रातःकाल स्नान कर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप, शेषनाग पर विराजमान अथवा कलश के रूप में, की पूजा करते हैं, तथा चौदह गांठों वाला अनंत सूत्र बांधकर कौंडिन्य की कथा सुनते हैं।
गणेशोत्सव मनाने वाले घरों व सार्वजनिक पंडालों में इसी दिन गणेश जी की प्रतिमा की अंतिम आरती कर, भव्य शोभायात्रा के साथ नदी, तालाब अथवा समुद्र में विसर्जन किया जाता है। 'गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या' के जयकारों के बीच भक्त अगले वर्ष पुनः पधारने की प्रार्थना करते हैं।
महाराष्ट्र में मुंबई सहित अनेक नगरों में यह दिन विशेष भव्यता से मनाया जाता है, जहां लाखों श्रद्धालु सड़कों पर उतरकर गणपति बप्पा को विदाई देते हैं। पर्यावरण की दृष्टि से अनेक स्थानों पर अब कृत्रिम जलाशयों में विसर्जन को प्रोत्साहित किया जाता है।
अनंत चतुर्दशी (गणेश विसर्जन) पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करें तथा चौदह गांठों वाला अनंत सूत्र भुजा पर बांधें। कौंडिन्य की कथा सुनें अथवा पढ़ें। यदि घर में गणेश प्रतिमा स्थापित है, तो अंतिम आरती व भोग अर्पण के पश्चात विधिपूर्वक जल में विसर्जन करें।
अनंत चतुर्दशी (गणेश विसर्जन) के बारे में
अनंत चतुर्दशी भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाने वाला पर्व है, जो भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा तथा दस दिवसीय गणेशोत्सव के समापन, दोनों के लिए जाना जाता है। इस पृष्ठ पर अनंत व्रत की कौंडिन्य कथा, अनंत सूत्र का महत्व, तथा गणेश विसर्जन की परंपरा की जानकारी दी गई है।
गणेश चतुर्थी से जुड़ी अन्य जानकारी हेतु उसका अलग पृष्ठ भी देखें। इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
अनंत चतुर्दशी कब मनाई जाती है?
अनंत चतुर्दशी प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्दशी तिथि को, गणेश चतुर्थी से दस दिन पश्चात मनाई जाती है।
अनंत सूत्र क्या है?
अनंत सूत्र चौदह गांठों वाला एक रेशमी धागा है, जो भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा के पश्चात भुजा पर बांधा जाता है, तथा जिसकी चौदह गांठें चौदह लोकों की प्रतीक मानी जाती हैं।
गणेश विसर्जन अनंत चतुर्दशी को ही क्यों किया जाता है?
जो भक्त दस दिवसीय गणेशोत्सव मनाते हैं, गणेश चतुर्थी से गिनकर दसवां दिन अनंत चतुर्दशी को ही पड़ता है, इसीलिए इसी दिन गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
कौंडिन्य ऋषि की कथा क्या सिखाती है?
यह कथा सिखाती है कि श्रद्धा व विश्वास के बिना किया गया संदेह विनाश लाता है, तथा सच्चे मन से किया गया व्रत व पश्चाताप पुनः समृद्धि व कृपा प्राप्ति का मार्ग खोल देता है।