मुख्यप्रसंगसमुद्र मंथन प्रसंग

समुद्र मंथन प्रसंग

समुद्र मंथन प्रसंग वह कथा है, जिसमें देवताओं व असुरों ने अमृत की प्राप्ति हेतु क्षीरसागर का मंथन किया, इसी मंथन से भगवान शिव का नीलकंठ रूप, माता लक्ष्मी का प्राकट्य तथा चौदह रत्न प्रकट हुए।

अध्याय/

अध्याय · दुर्वासा का श्राप व मंथन की तैयारी

एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवराज इंद्र को एक दिव्य पुष्पमाला भेंट की। इंद्र ने उस माला को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया, किंतु मद-मस्त हाथी ने माला को सूंड से उतारकर पैरों तले कुचल डाला। अपने दिए गए सम्मान के इस अनादर से क्रुद्ध होकर दुर्वासा ने इंद्र को श्राप दिया कि उनसे तथा समस्त देवताओं से लक्ष्मी (श्री) सदा के लिए विमुख हो जाएगी।

श्राप के प्रभाव से तीनों लोकों की समृद्धि क्षीण हो गई, यज्ञ-कर्म बंद हो गए तथा देवता निर्बल पड़ गए। इसी दुर्बलता का लाभ उठाकर राजा बलि के नेतृत्व में असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। पराजित व असहाय देवता भगवान विष्णु की शरण में गए, जिन्होंने उन्हें बताया कि क्षीरसागर का मंथन करने से अमृत प्राप्त होगा, जिसे पीकर देवता पुनः अमर व बलशाली हो सकते हैं, किंतु इस विशाल कार्य के लिए असुरों का सहयोग आवश्यक था।

विष्णु के परामर्श पर देवताओं ने असुरों के साथ अस्थायी संधि की, तथा अमृत को आपस में बांटने का वचन देकर मंथन में उनकी सहायता मांगी। मंदराचल पर्वत को मथानी तथा नागराज वासुकि को नेती (रस्सी) बनाया गया। जब विशाल मंदराचल पर्वत समुद्र में डूबने लगा, तब भगवान विष्णु ने कूर्म (कच्छप) अवतार धारण कर अपनी पीठ पर पर्वत को स्थिर आधार प्रदान किया। इस प्रकार देवता वासुकि के मुख की ओर तथा असुर उनकी पूंछ की ओर खड़े होकर मंथन आरंभ करने को उद्यत हुए।

अध्याय · हलाहल विष व चौदह रत्नों का प्राकट्य

जैसे ही समुद्र का मंथन प्रारंभ हुआ, सबसे पहले भयंकर हलाहल नामक विष प्रकट हुआ, जिसकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। भयभीत देवता व असुर सहायता हेतु भगवान शिव के पास पहुंचे। सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान शिव ने वह समस्त विष अपनी हथेली में लेकर पी लिया, किंतु माता पार्वती ने उसे कंठ से नीचे न जाने देकर वहीं रोक दिया। इस कारण उनका कंठ नीला पड़ गया, तथा वे 'नीलकंठ' कहलाए।

शिव आरती पढ़ें →

विष के शांत होने पर मंथन पुनः आरंभ हुआ, तथा एक-एक कर चौदह अनमोल रत्न समुद्र से प्रकट होने लगे। सर्वप्रथम कामधेनु गाय प्रकट हुई, जो ऋषियों को यज्ञ-कार्य हेतु सौंपी गई। तत्पश्चात श्वेत वर्ण का उच्चैःश्रवा नामक अश्व, तथा चार दांतों वाला ऐरावत नामक श्वेत गजराज प्रकट हुए, जिन्हें इंद्र ने ग्रहण किया। इसके बाद कौस्तुभ मणि प्रकट हुई, जिसे भगवान विष्णु ने अपने वक्षस्थल पर धारण किया, तथा कल्पवृक्ष व पारिजात वृक्ष प्रकट हुए, जिन्हें स्वर्ग में रोपित किया गया।

आगे वारुणी देवी (मदिरा), अप्सरा रंभा तथा चंद्रमा प्रकट हुए, जिन्हें भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया। तदुपरांत स्वयं माता लक्ष्मी परम सुंदर रूप में प्रकट हुईं, तथा उन्होंने समस्त देवताओं व असुरों में से भगवान विष्णु को अपने पति रूप में वरण किया। सबसे अंत में देवताओं के वैद्य धन्वंतरि हाथ में अमृत-कलश लिए हुए प्रकट हुए, यही वह अमृत था, जिसकी प्राप्ति हेतु यह समस्त मंथन किया गया था।

लक्ष्मी आरती पढ़ें →

अध्याय · मोहिनी अवतार व राहु-केतु की उत्पत्ति

अमृत-कलश को देखते ही असुरों ने बलपूर्वक उसे धन्वंतरि से छीन लिया, तथा आपस में यह विवाद करने लगे कि इसे सबसे पहले कौन पिएगा। इस विवाद व असुरों की आपसी फूट का लाभ उठाने हेतु भगवान विष्णु ने अत्यंत मोहक स्त्री 'मोहिनी' का रूप धारण किया। मोहिनी के अद्भुत सौंदर्य पर मुग्ध होकर असुरों ने उन्हीं से अमृत-वितरण का भार सौंप दिया, तथा उनकी बात मानने का वचन दिया।

मोहिनी ने देवताओं व असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बिठाया, तथा अत्यंत चतुराई से केवल देवताओं को ही अमृत-पान कराना आरंभ किया। स्वर्भानु नामक एक असुर यह भांपकर चुपके से देवताओं की पंक्ति में जा बैठा, तथा सूर्य व चंद्रमा के मध्य बैठकर अमृत की एक बूंद ग्रहण कर ली। सूर्य व चंद्रमा ने उसे पहचान कर तुरंत मोहिनी को सचेत किया।

अमृत गले से नीचे उतरने से पहले ही भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से स्वर्भानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। किंतु अमृत की एक बूंद कंठ तक पहुंच चुकी थी, इसलिए सिर व धड़ दोनों भाग अमर बने रहे, सिर वाला भाग 'राहु' तथा धड़ वाला भाग 'केतु' कहलाया, जो आज भी सूर्य-चंद्रमा से बदला लेने हेतु उन्हें समय-समय पर ग्रसने का प्रयत्न करते हैं, जिसे ग्रहण कहा जाता है। समस्त देवताओं द्वारा अमृत-पान कर लेने के पश्चात असुरों को अपने साथ हुए छल का ज्ञान हुआ, जिससे देवताओं व असुरों में भीषण युद्ध छिड़ गया। अमृत के प्रभाव से बलशाली हुए देवताओं ने असुरों को पराजित कर स्वर्ग पर पुनः अपना अधिकार प्राप्त किया, तथा इंद्र को उनका खोया हुआ राज्य वापस मिला।

श्री विष्णु चालीसा पढ़ें →
इसी देवता की चालीसा
श्री विष्णु चालीसा
चालीसा पढ़ें
इसी देवता की आरती
ॐ जय जगदीश हरे आरती
आरती पढ़ें
इसी देवता की कथा
श्री सत्यनारायण कथा
कथा पढ़ें
पाठ दिवस
दीपावली एवं भगवान विष्णु-लक्ष्मी पूजन के प्रसंग पर
आगे पढ़ें · Next
श्री विष्णु चालीसा
चालीसा · ६ मिनट
पाठ खोलें →

समुद्र मंथन प्रसंग के बारे में

यह प्रसंग तीन अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में दुर्वासा के श्राप, देवताओं की दुर्बलता तथा मंथन की तैयारी की कथा है। दूसरे अध्याय में हलाहल विष व चौदह रत्नों के क्रमशः प्राकट्य का वर्णन है। तीसरे अध्याय में मोहिनी अवतार, राहु-केतु की उत्पत्ति तथा देव-असुर युद्ध की कथा दी गई है।

यह प्रसंग दीपावली पर माता लक्ष्मी के पूजन तथा भगवान विष्णु-शिव की उपासना से जुड़ा है। इस पृष्ठ पर तीनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

रचनाकार
श्रीमद्भागवत पुराण
पौराणिक काल (अष्टम स्कंध)

श्रीमद्भागवत पुराण के बारे में

समुद्र मंथन प्रसंग का कोई एक प्रामाणिक मुद्रित 'कथा-पाठ' नहीं है, यह श्रीमद्भागवत पुराण के अष्टम स्कंध, विष्णु पुराण तथा महाभारत में वर्णित एक सुविख्यात व सर्वाधिक सुनाई जाने वाली पौराणिक कथा है। यहां दिया गया शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने, तथापि घटनाक्रम पुराणों की सुस्थापित परंपरा पर आधारित है।

सामान्य प्रश्न

समुद्र मंथन क्यों किया गया था?

दुर्वासा के श्राप से देवता निर्बल पड़ गए थे तथा असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। भगवान विष्णु के परामर्श पर देवताओं ने अमृत प्राप्त कर पुनः बलशाली होने हेतु असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया।

भगवान शिव नीलकंठ कैसे कहलाए?

मंथन से सबसे पहले हलाहल विष प्रकट हुआ, जिसे सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान शिव ने पी लिया। माता पार्वती ने उसे कंठ से नीचे न जाने दिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया, और वे नीलकंठ कहलाए।

समुद्र मंथन से कौन-कौन से चौदह रत्न प्रकट हुए?

कामधेनु, उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, पारिजात, वारुणी, रंभा, चंद्रमा, माता लक्ष्मी तथा अमृत सहित धन्वंतरि, ये प्रमुख रत्न क्रमशः प्रकट हुए, जिनके साथ हलाहल विष भी गिना जाता है।

राहु-केतु की उत्पत्ति कैसे हुई?

स्वर्भानु नामक असुर छल से देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृत की एक बूंद ग्रहण कर बैठा। भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया, किंतु अमृत के प्रभाव से सिर व धड़ दोनों अमर रह गए, सिर राहु तथा धड़ केतु कहलाया।

संबंधित खोज

पाठ विवरण

रचनाकारश्रीमद्भागवत पुराण
संरचना३ अध्याय
पाठ समय८ मिनट