गणेश जन्म प्रसंग
गणेश जन्म प्रसंग वह कथा है, जिसमें माता पार्वती ने अपने उबटन से बालक गणेश की रचना की, तथा द्वारपाल के कर्तव्य-पालन में अटल रहने के कारण उन्हें भगवान शिव से युद्ध करना पड़ा, इसी कथा से गणेश जी को गजानन व प्रथम-पूज्य होने की उपाधि प्राप्त हुई।
अध्याय १ · पार्वती द्वारा गणेश का सृजन व शिव से युद्ध
एक बार माता पार्वती स्नान करने से पूर्व चाहती थीं कि कोई भी उनके एकांत में विघ्न न डाले, किंतु उस समय कैलाश पर उनकी रक्षा हेतु कोई उपयुक्त द्वारपाल उपलब्ध न था। तब उन्होंने अपने शरीर पर लगे उबटन को एकत्र कर उससे एक सुंदर बालक की मूर्ति बनाई, तथा अपनी दिव्य शक्ति से उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने उस बालक को अपना पुत्र मानकर उसे आदेश दिया कि जब तक वे स्नान न कर लें, तब तक किसी को भी भीतर प्रवेश न करने दे।
इसी बीच भगवान शिव कैलाश लौटे, तथा भीतर जाने लगे। अपरिचित बालक ने विनम्रतापूर्वक किंतु दृढ़तापूर्वक उन्हें रोकते हुए कहा कि माता पार्वती स्नान कर रही हैं, अतः वे भीतर प्रवेश नहीं कर सकते। शिव को यह सुनकर आश्चर्य व क्रोध दोनों हुआ, क्योंकि वे स्वयं उस भवन के स्वामी थे, और यह बालक उन्हें ही रोक रहा था। उन्होंने पहले अपने गणों को बालक को समझाने व हटाने भेजा, किंतु बालक ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए समस्त गणों को युद्ध में परास्त कर दिया।
अपने गणों की पराजय से क्रुद्ध होकर स्वयं भगवान शिव बालक से युद्ध करने आगे बढ़े। बालक ने साहसपूर्वक उनका भी सामना किया, तथा किसी भी मूल्य पर द्वार न छोड़ने का संकल्प दोहराया। घोर युद्ध के मध्य क्रोधावेश में आकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया, तथा वे भीतर प्रवेश कर गए।
शिव आरती पढ़ें →अध्याय २ · हाथी का शीश व गणपति की उपाधि
स्नान कर बाहर आईं माता पार्वती ने जब अपने पुत्र को शिरहीन अवस्था में देखा, तो शोक व क्रोध से विह्वल हो उठीं। उन्होंने विलाप करते हुए शिव को बताया कि यह बालक कोई साधारण द्वारपाल नहीं, अपितु उन्हीं की काया से उत्पन्न उनका अपना पुत्र था। पुत्र-शोक में डूबी माता का क्रोध इतना प्रचंड हो उठा कि उन्होंने संपूर्ण सृष्टि के विनाश की चेतावनी दे डाली, जिससे तीनों लोकों में हाहाकार मच गया।
अपनी भूल का एहसास होने पर भगवान शिव ने माता को शांत करने का वचन दिया, तथा तुरंत अपने गणों को आदेश दिया कि उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोए हुए पहले जीव का शीश काटकर ले आएं। गणों को सर्वप्रथम एक हाथी का बच्चा इसी अवस्था में सोया मिला, अतः वे उसका शीश ले आए। भगवान शिव ने वह गजशीश बालक के धड़ से जोड़कर अपनी दिव्य शक्ति से उसे पुनर्जीवित कर दिया। इस प्रकार बालक गजानन (हाथी के मुख वाला) कहलाया।
समस्त देवताओं व माता पार्वती ने प्रसन्न होकर बालक को आशीर्वाद दिया। भगवान शिव ने उसे अपने समस्त गणों का स्वामी 'गणपति' घोषित किया, तथा यह वरदान दिया कि किसी भी शुभ कार्य, पूजा या यज्ञ के आरंभ में सबसे पहले उन्हीं की पूजा की जाएगी। द्वार की रक्षा में अपने कर्तव्य के प्रति दिखाई गई अटल निष्ठा के कारण उन्हें 'विघ्नहर्ता' (विघ्नों को हरने वाला) भी कहा गया। इसी कथा की स्मृति में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है।
गणेश आरती पढ़ें →गणेश जन्म प्रसंग के बारे में
यह प्रसंग दो अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में माता पार्वती द्वारा गणेश की रचना, द्वारपाल के रूप में उनकी नियुक्ति तथा भगवान शिव से हुए युद्ध की कथा है। दूसरे अध्याय में हाथी का शीश प्राप्त होने, गणेश जी के पुनर्जीवित होने तथा गणपति व विघ्नहर्ता की उपाधि मिलने की कथा दी गई है।
यह प्रसंग गणेश चतुर्थी पर्व से जुड़ा है। इस पृष्ठ पर दोनों अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
शिव पुराण के बारे में
गणेश जन्म प्रसंग का कोई एक प्रामाणिक मुद्रित 'कथा-पाठ' नहीं है, यह शिव पुराण की रुद्र संहिता तथा स्कंद पुराण में वर्णित एक सुविख्यात व सर्वाधिक सुनाई जाने वाली पौराणिक कथा है। यहां दिया गया शब्दांकन मौलिक रूप से किया गया है, ताकि यह किसी एक वेबसाइट या प्रकाशन के पाठ की अविकल प्रतिलिपि न बने, तथापि घटनाक्रम पुराणों की सुस्थापित परंपरा पर आधारित है।
सामान्य प्रश्न
माता पार्वती ने गणेश जी की रचना कैसे की?
स्नान से पूर्व एकांत चाहने पर, उपयुक्त द्वारपाल न होने के कारण, माता पार्वती ने अपने शरीर पर लगे उबटन को एकत्र कर उससे एक बालक की मूर्ति बनाई, तथा अपनी दिव्य शक्ति से उसमें प्राण डाल दिए।
भगवान शिव ने बालक का सिर क्यों काटा?
माता की आज्ञा का पालन करते हुए बालक ने अपरिचित शिव को भीतर जाने से रोका। अपने ही भवन में रोके जाने से क्रुद्ध शिव ने पहले अपने गणों को भेजा, फिर स्वयं युद्ध कर बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया।
गणेश जी को हाथी का सिर कैसे मिला?
पार्वती के क्रोध को शांत करने हेतु शिव ने गणों को उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोए पहले जीव का शीश लाने भेजा। उन्हें एक हाथी का बच्चा मिला, जिसका शीश बालक के धड़ से जोड़कर शिव ने उसे पुनर्जीवित किया।
गणेश जी को प्रथम पूज्य क्यों माना जाता है?
द्वार की रक्षा में अपने कर्तव्य के प्रति दिखाई गई अटल निष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें समस्त गणों का स्वामी 'गणपति' घोषित किया, तथा वरदान दिया कि किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में सबसे पहले उन्हीं की पूजा होगी।