मध्यमहेश्वर मंदिर का महत्व
पंच केदार कथा के अनुसार, बैल-रूपी शिवजी भूमि में समाकर पांच भिन्न स्थानों पर पुनः प्रकट हुए थे, मध्यमहेश्वर में उनकी नाभि व उदर प्रकट हुए, जिस कारण यहां शिवजी की नाभि के रूप में पूजा होती है। इसी कारण इस मंदिर को 'मध्य' महेश्वर कहा जाता है, जो पंच केदार में शरीर के मध्य भाग का प्रतिनिधित्व करता है।
मंदिर अपने चौखंबा, नीलकंठ व केदारनाथ शिखरों के विहंगम दृश्य के लिए विशेष रूप से जाना जाता है, तथा यहां तक की यात्रा हरे-भरे बुग्यालों व घने जंगलों से होकर गुजरती है।
मध्यमहेश्वर मंदिर दर्शन की जानकारी
मध्यमहेश्वर तक पहुंचने के लिए रांसी गांव से गौंडार गांव होते हुए लगभग 16-18 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी होती है, जो सामान्यतः 2 दिनों में पूरी की जाती है, तथा मध्यम दर्जे की कठिनाई वाली मानी जाती है। मार्ग में गौंडार गांव में रात्रि विश्राम की व्यवस्था उपलब्ध रहती है।
शीतकाल में भारी हिमपात के कारण मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, तथा पूजा शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ में स्थानांतरित हो जाती है, यही मंदिर केदारनाथ की शीतकालीन पूजा का भी गद्दीस्थल है।
मध्यमहेश्वर मंदिर कैसे पहुंचें
मध्यमहेश्वर मंदिर के बारे में
मध्यमहेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित पंच केदार श्रृंखला का चतुर्थ मंदिर है, जहां शिवजी की नाभि व उदर की पूजा होती है। इस पृष्ठ पर मंदिर का पौराणिक महत्व तथा यात्रा व दर्शन से जुड़ी सामान्य जानकारी दी गई है।
इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
मध्यमहेश्वर मंदिर कहां स्थित है?
यह उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में, रांसी गांव से लगभग 16-18 किमी के ट्रेक द्वारा, लगभग 3,497 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
मध्यमहेश्वर में शिवजी के किस अंग की पूजा होती है?
यहां शिवजी की नाभि व उदर की पूजा होती है, जिस कारण इसे 'मध्य महेश्वर' कहा जाता है।
मध्यमहेश्वर की शीतकालीन पूजा कहां होती है?
शीतकाल में मंदिर बंद रहता है तथा पूजा ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में स्थानांतरित हो जाती है, जो केदारनाथ की भी शीतकालीन पूजा का स्थान है।
मध्यमहेश्वर का ट्रेक कितना कठिन है?
रांसी गांव से लगभग 16-18 किमी का यह ट्रेक मध्यम दर्जे की कठिनाई वाला माना जाता है, तथा सामान्यतः 2 दिनों में पूरा किया जाता है।
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यात्रा हेतु उचित समय
मई-जून तथा सितंबर-अक्टूबर सर्वोत्तम रहता है। शीतकाल में भारी हिमपात के कारण मंदिर बंद रहता है तथा पूजा शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ में स्थानांतरित हो जाती है।