
केदारनाथ मंदिर का महत्व
मान्यता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात पांडव अपने द्वारा किए गए भ्रातृहत्या व गुरुहत्या के पापों से मुक्ति चाहते थे, इसके लिए वे भगवान शिव के दर्शन हेतु हिमालय पहुंचे। भगवान शिव उनसे रुष्ट होकर बैल का रूप धारण कर भूमि में समा गए, किंतु भीम ने उनकी पीठ (कूबड़) को पकड़ लिया, जो केदारनाथ में आज भी एक त्रिकोणाकार शिला के रूप में पूजी जाती है। शिवजी ने अंततः प्रसन्न होकर पांडवों को दर्शन दिए और उन्हें उनके पापों से मुक्त किया।
बारह ज्योतिर्लिंगों में केदारनाथ उत्तराखंड का एकमात्र तथा हिमालय में स्थित सबसे ऊंचा ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इसके साथ ही यह पंच केदार श्रृंखला, पांच शिव मंदिरों का समूह, जो भगवान शिव के बैल-रूप के विभिन्न अंगों को समर्पित हैं, का प्रथम व सबसे प्रमुख मंदिर भी है, जहां शिवजी की पीठ (कूबड़) के रूप में पूजा होती है।
केदारनाथ मंदिर दर्शन की जानकारी
केदारनाथ मंदिर समुद्र तल से लगभग 3,583 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, तथा यहां तक पहुंचने के लिए गौरीकुंड से लगभग 16-18 किलोमीटर की पैदल, खच्चर अथवा हेलीकॉप्टर यात्रा करनी होती है। शीतकाल में भारी हिमपात के कारण मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, तथा अक्षय तृतीया के आसपास पुनः खोले जाते हैं, जिसके पश्चात कार्तिक पूर्णिमा तक ही दर्शन संभव होता है।
मंदिर की स्थापत्य शैली प्राचीन उत्तर भारतीय पद्धति की है, तथा यह विशाल पत्थरों से निर्मित है, जिसने वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा की विनाशकारी बाढ़ में भी अडिग रहकर मंदिर की मूल संरचना को सुरक्षित रखा। श्रद्धालु सामान्यतः बद्रीनाथ यात्रा से पहले अथवा साथ में केदारनाथ के दर्शन करते हैं, चूंकि दोनों धाम उत्तराखंड की क्षेत्रीय 'छोटा चार धाम' यात्रा (यमुनोत्री-गंगोत्री-केदारनाथ-बद्रीनाथ) का हिस्सा हैं, ध्यान रहे, यह आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मूल अखिल भारतीय चार धाम (बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी, रामेश्वरम) से भिन्न, एक क्षेत्रीय परंपरा है।
पूजा, अनुष्ठान एवं प्रसाद
मंदिर में प्रतिदिन प्रातः महाभिषेक होता है, जिसमें शिवलिंग का दूध, दही, घी, शहद तथा मंदाकिनी नदी के जल से अभिषेक किया जाता है, उसके पश्चात श्रृंगार व भोग अर्पित होता है। प्रातः व सायं आरती नियमित रूप से होती है। भक्तों को प्रसाद स्वरूप सामान्यतः चावल (भोग) दिया जाता है। सभी पूजाएं बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन बुक की जा सकती हैं।
स्वास्थ्य एवं सुगमता
केदारनाथ मंदिर लगभग 3,583 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां ऊंचाई से जुड़ी बीमारी (ऑल्टिट्यूड सिकनेस) का खतरा रहता है। सोनप्रयाग जांच चौकी पर सभी यात्रियों की ऑक्सीजन स्तर (SpO2) व रक्तचाप की जांच अनिवार्य रूप से की जाती है, तथा निर्धारित मानक से कम पाए जाने पर आगे की यात्रा की अनुमति नहीं दी जाती। 55 वर्ष से अधिक आयु के तथा हृदय, अस्थमा, मधुमेह अथवा उच्च रक्तचाप से जुड़ी बीमारी वाले यात्रियों को यात्रा से पूर्व चिकित्सकीय जांच कराने की सलाह दी जाती है।
जो श्रद्धालु 16-18 किलोमीटर की पैदल यात्रा करने में असमर्थ हैं, उनके लिए खच्चर, पालकी (डोली) तथा हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध रहती है, छोटे बच्चों व स्वास्थ्य समस्या वाले बुजुर्ग यात्रियों के लिए सामान्यतः हेलीकॉप्टर विकल्प की सलाह दी जाती है।
केदारनाथ मंदिर कैसे पहुंचें
केदारनाथ मंदिर के बारे में
केदारनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक पावन धाम है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों तथा पंच केदार, दोनों सूचियों में गिना जाता है। इस पृष्ठ पर मंदिर का पौराणिक महत्व, पांडवों से जुड़ी कथा, तथा यात्रा व दर्शन से जुड़ी सामान्य जानकारी दी गई है।
इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
केदारनाथ मंदिर कहां स्थित है?
यह उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में, हिमालय पर्वतमाला में समुद्र तल से लगभग 3,583 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
केदारनाथ मंदिर के कपाट कब खुलते व बंद होते हैं?
सामान्यतः अक्षय तृतीया के आसपास (अप्रैल-मई) कपाट खुलते हैं, तथा कार्तिक पूर्णिमा (अक्टूबर-नवंबर) के आसपास शीतकाल हेतु बंद कर दिए जाते हैं। सटीक तिथि प्रतिवर्ष पंचांग अनुसार तय होती है।
केदारनाथ ज्योतिर्लिंग व पंच केदार दोनों में कैसे गिना जाता है?
जैसा कथा में बताया गया है, यहां भगवान शिव बैल-रूप की पीठ (कूबड़) के रूप में पूजे जाते हैं, जिस कारण यह पंच केदार का प्रथम मंदिर है, तथा साथ ही यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक भी माना जाता है, दोनों सूचियां एक ही मंदिर का उल्लेख करती हैं।
केदारनाथ कैसे पहुंचें?
सड़क मार्ग से गौरीकुंड तक पहुंचकर, वहां से लगभग 16-18 किमी की पैदल, खच्चर अथवा हेलीकॉप्टर यात्रा से केदारनाथ पहुंचा जा सकता है।
केदारनाथ व बद्रीनाथ की चार धाम यात्रा में क्या संबंध है?
दोनों उत्तराखंड की क्षेत्रीय 'छोटा चार धाम' यात्रा (यमुनोत्री-गंगोत्री-केदारनाथ-बद्रीनाथ) का हिस्सा हैं, जो आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मूल अखिल भारतीय चार धाम (बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी, रामेश्वरम) से भिन्न, एक क्षेत्रीय परंपरा है।
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यात्रा हेतु उचित समय
मई-जून तथा सितंबर-अक्टूबर सर्वोत्तम रहता है। मंदिर के कपाट सामान्यतः अक्षय तृतीया (अप्रैल-मई) से कार्तिक पूर्णिमा (अक्टूबर-नवंबर) तक ही खुले रहते हैं, तथा मानसून (जुलाई-अगस्त) में भूस्खलन के खतरे के कारण यात्रा से बचना उचित है।
यात्रा पंजीकरण
केदारनाथ यात्रा हेतु ऑनलाइन पंजीकरण व QR ई-पास अनिवार्य है, इसके बिना सोनप्रयाग व गौरीकुंड से आगे यात्रा की अनुमति नहीं मिलती, चाहे पैदल हो, खच्चर/पालकी से हो अथवा हेलीकॉप्टर से। पंजीकरण निःशुल्क है।
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