दशावतार कथा
दशावतार कथा वह कथा है, जिसमें भगवान विष्णु द्वारा धर्म की रक्षा हेतु समय-समय पर लिए गए दस अवतारों, मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध व कल्कि, का संक्षिप्त वर्णन है, जिसकी पृष्ठभूमि में ऋषि भृगु के शाप की कथा भी जुड़ी है।
अध्याय १ · भृगु ऋषि का शाप, और अवतार का प्रयोजन
एक बार देवताओं व असुरों के भीषण युद्ध में असुर पराजित होने लगे, तो वे भागकर ऋषि भृगु के आश्रम में शरण लेने पहुंचे। अतिथि-धर्म व शरणागत-रक्षा के व्रत का पालन करते हुए भृगु ऋषि की पत्नी ने उन असुरों को अपने आश्रम में शरण दे दी। जब भगवान विष्णु को यह ज्ञात हुआ, तो देवताओं की रक्षा हेतु उन्होंने आश्रम में प्रवेश कर भृगु-पत्नी का वध कर डाला।
जब ऋषि भृगु आश्रम लौटे और अपनी पत्नी की हत्या का समाचार पाया, तो क्रोध में आकर उन्होंने भगवान विष्णु को यह शाप दे दिया कि उन्हें बार-बार स्त्री के गर्भ से मनुष्य व अन्य योनियों में जन्म लेना पड़ेगा। भगवान विष्णु ने अपने भक्त के इस शाप को सहज भाव से स्वीकार कर लिया, क्योंकि यह उनके अपने ही उस वचन के अनुकूल था कि जब-जब धर्म की हानि व अधर्म की वृद्धि होगी, तब-तब वे स्वयं अवतार लेकर धर्म की स्थापना करेंगे।
विष्णु चालीसा पढ़ें →इसी प्रयोजन से भगवान विष्णु ने विभिन्न युगों में दस मुख्य अवतार धारण किए, जिन्हें 'दशावतार' कहा जाता है। इनमें से प्रत्येक अवतार किसी विशेष संकट के निवारण व धर्म की पुनर्स्थापना हेतु हुआ। आगे के दोनों अध्यायों में इन दसों अवतारों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है।
अध्याय २ · प्रथम पांच अवतार, मत्स्य से वामन तक
प्रथम अवतार मत्स्य (मछली) के रूप में हुआ, जब हयग्रीव नामक असुर ब्रह्मा जी से वेदों को चुराकर समुद्र की तलहटी में जा छिपा। भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण कर उस असुर का वध किया, वेदों की रक्षा की, तथा प्रलयकाल में राजा सत्यव्रत (मनु) की नौका को भी सुरक्षित मार्ग दिखाया।
दूसरा अवतार कूर्म (कच्छप) था, जब समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया, किंतु वह समुद्र में डूबने लगा। भगवान विष्णु ने कूर्म रूप धारण कर अपनी पीठ पर उस पर्वत को धारण किया, जिससे मंथन निर्बाध रूप से चल सका। तीसरा अवतार वराह (शूकर) था, जब हिरण्याक्ष नामक असुर पृथ्वी को उठाकर समुद्र में ले डूबा। भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर हिरण्याक्ष का वध किया तथा पृथ्वी को अपने दांतों पर उठाकर पुनः यथास्थान स्थापित किया।
समुद्र मंथन प्रसंग पढ़ें →चौथा अवतार नरसिंह (नर-सिंह) था, जब हिरण्याक्ष के भाई हिरण्यकशिपु ने अपने ही पुत्र प्रह्लाद को, जो भगवान विष्णु का परम भक्त था, अनेक यातनाएं दीं। भगवान विष्णु ने आधे मनुष्य व आधे सिंह के नरसिंह रूप में प्रकट होकर, न दिन में न रात में, न घर के भीतर न बाहर, न भूमि पर न आकाश में, तथा न किसी अस्त्र-शस्त्र से, इस प्रकार हिरण्यकशिपु के समस्त वरदानों को निष्फल करते हुए उसका वध कर प्रह्लाद की रक्षा की। पांचवां अवतार वामन (बौना ब्राह्मण) था, जब राजा बलि ने अपने दान-धर्म व शक्ति से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी, तथा विराट रूप धारण कर दो पगों में ही पृथ्वी व स्वर्ग नाप लिए, तीसरा पग बलि के मस्तक पर रखकर उसे पाताल का राज्य प्रदान किया।
अध्याय ३ · अंतिम पांच अवतार, परशुराम से कल्कि तक
छठा अवतार परशुराम था, जो ऋषि जमदग्नि के पुत्र के रूप में जन्मे तथा भगवान शिव से फरसा प्राप्त कर उन क्षत्रिय राजाओं का संहार किया, जो अपनी शक्ति के मद में अत्याचारी हो गए थे। सातवां अवतार श्रीराम व आठवां अवतार श्रीकृष्ण के रूप में हुआ, इन दोनों अवतारों की विस्तृत कथाएं इसी साइट पर उनके अपने पृष्ठों पर उपलब्ध हैं, अतः यहां केवल संक्षिप्त स्मरण दिया गया है।
राम चालीसा पढ़ें →नौवां अवतार भगवान बुद्ध का माना जाता है, जिन्होंने संसार को अहिंसा, करुणा व सत्य के मार्ग की शिक्षा दी। दसवां व अंतिम अवतार कल्कि है, जिनके विषय में मान्यता है कि वे कलियुग के अंत में श्वेत अश्व पर सवार होकर, हाथ में तलवार लिए हुए, अधर्म व पापियों का समूल नाश कर पुनः सतयुग की स्थापना करेंगे, यह अवतार अभी भविष्य में प्रतीक्षित है।
इन दस अवतारों की कथा भाद्रपद मास की शुक्ल दशमी को विशेष रूप से सुनी व सुनाई जाती है, जिसे 'दशावतार व्रत' कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखकर दशावतार की कथा सुनने व भगवान विष्णु के पूजन से समस्त पापों का नाश होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
ॐ जय जगदीश हरे आरती पढ़ें →दशावतार कथा पाठ विधि
भाद्रपद शुक्ल दशमी को प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें, भगवान विष्णु की प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष दीप जलाकर पंचामृत व तुलसीदल अर्पित करें, तथा दशावतार कथा का श्रवण-पठन करें। संध्या समय ॐ जय जगदीश हरे आरती के साथ पूजन का समापन करें।
दशावतार कथा के बारे में
यह कथा तीन अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में ऋषि भृगु के शाप व अवतार लेने के प्रयोजन की कथा है। दूसरे अध्याय में मत्स्य से वामन तक के प्रथम पांच अवतारों का, तथा तीसरे अध्याय में परशुराम से कल्कि तक के अंतिम पांच अवतारों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है।
यह कथा भाद्रपद शुक्ल दशमी को मनाए जाने वाले दशावतार व्रत से जुड़ी है।
इस व्रत का फल
जैसा कथा में ही बताया गया है, इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखकर दशावतार की कथा सुनने व भगवान विष्णु के पूजन से समस्त पापों का नाश होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भागवत पुराण एवं अन्य पुराण के बारे में
दशावतार कथा का कोई एक प्रामाणिक मुद्रित 'कथा-पाठ' नहीं है, भृगु ऋषि के शाप की पृष्ठभूमि तथा दस अवतारों का विवरण भागवत पुराण, विष्णु पुराण व अन्य पुराणों में बिखरा हुआ मिलता है, जिसे यहां एक साथ, मौलिक रूप से संक्षेपित किया गया है। ध्यान दें: श्रीराम व श्रीकृष्ण अवतारों की विस्तृत कथाएं (जन्म, वनवास, लीलाएं आदि) इसी साइट पर उनके अपने पृष्ठों पर पहले से उपलब्ध हैं, तथा समुद्र मंथन प्रसंग भी पृथक पृष्ठ पर विस्तार से दिया गया है, अतः यहां केवल संक्षिप्त परिचय दिया गया है, ताकि विषय-वस्तु की पुनरावृत्ति न हो।
सामान्य प्रश्न
भगवान विष्णु के दस अवतार कौन-कौन से हैं?
मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध व कल्कि, ये भगवान विष्णु के दस मुख्य अवतार माने जाते हैं।
भगवान विष्णु को बार-बार अवतार क्यों लेना पड़ा?
इसकी पृष्ठभूमि में ऋषि भृगु का शाप है, जो उन्हें भृगु-पत्नी के वध के कारण मिला था। साथ ही यह भगवान विष्णु के अपने ही इस वचन के अनुरूप भी है कि जब-जब धर्म की हानि होगी, तब-तब वे अवतार लेकर उसकी पुनर्स्थापना करेंगे।
दशावतार व्रत कब मनाया जाता है?
भाद्रपद मास की शुक्ल दशमी को दशावतार व्रत रखा जाता है, जिसमें विधिपूर्वक पूजन कर दशावतार कथा सुनी जाती है।
कल्कि अवतार के विषय में क्या मान्यता है?
मान्यता है कि कल्कि अवतार अभी भविष्य में, कलियुग के अंत में, श्वेत अश्व पर सवार होकर प्रकट होंगे तथा अधर्म का नाश कर सतयुग की पुनर्स्थापना करेंगे।
क्या दशावतार की सूची में बुद्ध की जगह कोई अन्य अवतार भी माना जाता है?
हां, कुछ वैष्णव परंपराओं में नौवें स्थान पर बुद्ध की जगह बलराम को रखा जाता है, जिन्हें आदिशेष का अवतार माना जाता है, इस मत के अनुसार दशावतार विशेष रूप से स्वयं कृष्ण के ही दस रूप हैं। इस पृष्ठ पर बुद्ध सहित अधिक प्रचलित सूची दी गई है।