मुख्यकथाअन्नपूर्णा माता व्रत कथा

अन्नपूर्णा माता व्रत कथा

अन्नपूर्णा माता व्रत कथा निर्धन ब्राह्मण धनंजय के पूर्वजन्म के रहस्य तथा अन्नपूर्णा व्रत के प्रताप से उसे मिली संपत्ति व अंततः शिव-अन्नपूर्णा के साक्षात दर्शन की कथा है, जो मार्गशीर्ष मास में सुनी जाती है और जिसका पूर्ण पाठ यहां उपलब्ध है।

अन्नपूर्णा माता व्रत कथा
अध्याय/

अध्याय · युधिष्ठिर का प्रश्न एवं श्रीराम-लक्ष्मण की कथा

राजा युधिष्ठिर ने वन में श्रीकृष्ण से कहा: हे देवाधिदेव! वनवास में रहते हुए मुझे अन्न को लेकर बड़ा कष्ट भोगना पड़ रहा है। कभी दिन में, कभी रात में, कभी थोड़ा तो कभी बहुत, कभी रूखा-सूखा तो कभी स्वादहीन, ऐसा अनियमित वन्य भोजन ग्रहण करते हुए तथा भूमि पर ही शयन करते हुए, हे केशव! मुझे भूख से अत्यंत पीड़ा होती है। कंद-मूल-फल व साग से जीवन चलाते हुए महीनों बीत गए, पर मेरे चित्त को शांति नहीं मिलती।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: त्रेतायुग में स्वयं भगवान श्रीरामचंद्रजी ने भी पिता दशरथ की आज्ञा से समस्त राज्य त्यागकर सीता व लक्ष्मण सहित दंडक वन में निवास किया था। एक दिन लक्ष्मणजी भोजन की खोज में सारे वन में घूमे, पर उन्हें कुछ भी भोजन प्राप्त न हुआ, अतः संध्या को लौटकर उन्होंने श्रीरामचंद्रजी को प्रणाम किया। उस समय लक्ष्मणजी की आंखों में आंसू भर आए, और वे चुपचाप विस्मित बैठ गए।

तब श्रीरामजी ने अपने भाई से मधुर वाणी में कहा: हे पुत्र, संताप मत करो, क्योंकि यह संसार अपने-अपने भाग्य के अनुसार ही फल पाता है। मनुष्य पूर्वजन्म में जो कुछ दान करता है, इसी जन्म में उसी का फल प्राप्त करता है। जिन्होंने पूर्वजन्म में सुंदर व रसीले भोजन का दान किया, वे ही महाशय इस जन्म में अनेक प्रकार के भक्ष्य-भोज्य पदार्थ प्राप्त करते हैं, और जिन्होंने कभी दान नहीं किया, वे हमारे समान भटकते हैं, देखो, पृथ्वी अन्न से परिपूर्ण होते हुए भी हम अन्न के लिए तरस रहे हैं। हे लक्ष्मण! अवश्य ही हमने ब्राह्मणों को भोजन नहीं कराया, इसी कारण से यह दशा प्राप्त हुई है, अतः प्रारब्ध कर्मों को समझकर चिंता का त्याग करो।

अध्याय · अगस्त्य मुनि द्वारा देवदत्त-धनंजय की कथा

श्रीरामजी इस प्रकार कह ही रहे थे, कि इतने में घटयोनि अगस्त्य मुनि वहां आ पहुंचे। रामचंद्रजी ने उठकर उन्हें प्रणाम किया, और सत्कार के पश्चात सुखपूर्वक बैठे हुए अगस्त्यजी से वही प्रश्न पूछा। अगस्त्यजी ने कहा: मोक्ष प्रदान करने वाली, महादेव को परम प्रिय वाराणसी (काशी) नामक नगरी में दो भाई ब्राह्मण रहते थे, देवदत्त और धनंजय। इनमें देवदत्त तो धनवान था, परंतु धनंजय अत्यंत निर्धन व दुःखी था।

परिवार बड़ा होने के कारण धनंजय को यह चिंता सताती थी कि हाय, मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है जिससे मुझे अन्न भी दुर्लभ हो गया है? उसने स्वयं से प्रश्न किया, क्या मैंने कभी किसी गर्भवती स्त्री या बालक को भोजन दिए बिना ही स्वयं भोजन कर लिया? क्या कोई अतिथि या ब्राह्मण मेरे द्वार से बिना सत्कार पाए ही लौट गया? क्या मैंने धन-लाभ के लोभ में अकाल की कामना करते हुए अन्न का संग्रह किया? क्या मैंने भोजन के समय अन्न की निंदा की, अथवा अभिमानवश उत्तम भोजन को अतृप्त रहते हुए भी त्याग दिया? क्या मैंने श्राद्ध के दिन ब्राह्मण को केवल दिखावे के लिए भोजन कराया?

इस प्रकार अनेक संभावित दोषों पर विचार करते हुए वह कहने लगा, इसी कारण मुझ भरे-पूरे परिवार वाले को अन्नमात्र भी दुर्लभ हो गया है, नित्य भोजन पाने के लिए ही मुझे संघर्ष करना पड़ता है। भूख से व्याकुल अपने बालकों को देखकर मेरा हृदय फटा जाता है, वे अन्य बालकों को खाते देख स्वयं भी मांगते हैं, और मेरी पत्नी मन-ही-मन रोती रहती है। ऐसे दुर्भाग्य से पीड़ित होकर मैं सोचता हूं कि क्या मैं इस पृथ्वी में समा जाऊं। न जाने किस कर्म के फलस्वरूप मुझे यह अटूट दरिद्रता प्राप्त हुई है।

अध्याय · जटाधारी मुनि द्वारा पूर्वजन्म का रहस्य: राजकुमार शत्रुमदन एवं हेरंब

इस चिंता से व्याकुल होकर धनंजय काशी में मणिकर्णिका पर नित्य स्नान कर विश्वनाथ महादेव को प्रणाम करता, मंडप में बैठकर रुद्र-सूक्त का जप करता, तथा रात्रि में कुशा बिछाकर भगवती पार्वती का ध्यान करते हुए शयन करता। इसी नियम में स्थित रहते हुए एक दिन एक जटाधारी शुद्ध ब्राह्मण उसके पास आकर यह कथा सुनाने लगे।

पूर्वकाल में कांचीपुर के राजा शत्रुमदन नामक अपने पुत्र सहित राज्य करते थे, तथा हेरंब नामक एक शूद्र-जाति का व्यक्ति राजकुमार का घनिष्ठ मित्र था। एक दिन राजकुमार शत्रुमदन हेरंब को साथ लेकर आखेट को वन में गए, जहां शूकर, महिष व हिरण आदि अनेक पशुओं का वध किया। इसी बीच एक पर्वत के समान विशाल शूकर वहां आ पहुंचा, जो सेना को ही निगल जाने की भांति भयंकर गर्जना करने लगा।

सहस्रों शिकारी कुत्तों ने उसे घेर लिया, परंतु उस शूकर ने अनेक कुत्तों व घोड़ों को चीर डाला, जिससे सब भाग खड़े हुए। राजकुमार शत्रुमदन ने स्वर्ण-पंख वाले तीव्र बाण से उस पर प्रहार किया, परंतु शूकर उस वार को बचाकर राजकुमार के घोड़े की ओर ही झपटा, जिससे घोड़ा भड़क गया। क्रोधित राजकुमार ने अंततः शस्त्र से उस शूकर का वध कर दिया, परंतु इस पीछा में वे सौ योजन दूर निकल आए थे। केवल हेरंब ही उनके साथ रह सका, क्योंकि उसका घोड़ा भी राजकुमार के घोड़े के समान तीव्रगामी था।

भूख-प्यास से व्याकुल दोनों वीर विश्राम कर ही रहे थे कि कुशा व समिधा लिए एक मुनि वहां से गुजरे। उन्होंने दोनों को अपने आश्रम ले जाकर स्नान कराया, जल पिलाया, तथा पितरों के श्राद्ध व देव-यज्ञ से बचा हुआ अत्यंत पवित्र उंछवृत्ति (भिक्षा में प्राप्त) अन्न भेंट किया। राजकुमार ने अत्यंत प्रसन्नता से वह अन्न ग्रहण किया, परंतु शीघ्र ही प्राप्त संपत्ति के अभिमान में डूबे उनके अनुचरों ने उस शुद्ध अन्न की हंसी उड़ाई और उसमें से बहुत थोड़ा ही खाया। मूर्ख हेरंब ने तो उस अन्न को भूमि पर बिखेरकर उसकी निंदा करते हुए त्याग ही दिया। परंतु राजकुमार ने भूमि पर गिरे उस अन्न को भी बड़े आदर व श्रद्धा से उठाकर खा लिया, तथा पत्तों के दोने को साफ कर उसी में जल भी पी लिया।

मुनि ने कहा: हे धनंजय! वही राजकुमार तुम्हारा बड़ा भाई देवदत्त बनकर धन-धान्य सहित इसी काशी में जन्मा है, और तुम ही वह हेरंब हो, जिसने मुनियों द्वारा भिक्षा में लाए गए शुद्ध अन्न का अनादर किया था, उसी दोष से तुम अन्नहीन व दरिद्र हुए हो। जो लोग अन्न का अनादर करते हैं, वे ही दरिद्र व दुःखी होकर जन्म लेते हैं, अतः बुद्धिमान व्यक्ति को अस्वाद अन्न को भी अमृत के समान भाव से ग्रहण करना चाहिए। अब हे ब्राह्मण, तुम अन्नपूर्णा के इस परम उत्तम व्रत को धारण करो, इसके आचरण से तुम्हें कभी अन्न का दुःख नहीं होगा, और तुम्हारी संपत्ति कभी नष्ट नहीं होगी।

अध्याय · अन्नपूर्णा व्रत की खोज एवं दिव्य स्त्रियों से भेंट

यह सुनते ही धनंजय के मन में अन्नपूर्णा व्रत करने की उत्कंठा जाग उठी, उसकी सारी उदासी दूर होकर उसका चित्त उसी व्रत की खोज में लग गया। उसने दूर-दूर से विद्वानों को बुलाकर उनसे इस व्रत की विधि पूछी, ग्रंथों का गहन अवलोकन किया, परंतु उस परम उत्तम व्रत का कहीं भी पता न चला। अंततः वह इसी खोज में भूमंडल पर भ्रमण करने निकल पड़ा।

अनेक तीर्थों में भटकते हुए वह कामरूप देश पहुंचा, जहां उसने कामाक्षी देवी की पूजा की। वहां से आगे बढ़ते हुए सुमेरु पर्वत के उत्तर में एक सरोवर के तट पर उसने दिव्य वस्त्र धारण किए हुए अनेक सुंदर स्त्रियों को देखा, जो महादेवजी की अर्चना कर रही थीं। उनके निकट जाकर उस ब्राह्मण ने विनयपूर्वक पूछा: हे पतिव्रता देवियो! यह कौन-सा व्रत है, इसकी विधि क्या है, इसे करने से क्या फल मिलता है, तथा किस स्थान व समय पर यह उत्तम व्रत किया जाता है?

स्त्रियों ने उत्तर दिया: सत्-चित्-आनंद स्वरूप परमेश्वर की जो शक्ति है, वह यद्यपि एक ही है, तथापि संपूर्ण चराचर जगत में व्याप्त होकर अनेक रूपों में प्रकट होती है। स्वयं महादेवजी साक्षात विश्वनाथ हैं, और उनकी वही शक्ति भगवती पार्वती हैं, सृष्टि की रचना व पालन करते समय उन्हीं का नाम 'अन्नपूर्णा' है, तथा संहार के समय उन्हीं का नाम 'कालरात्रि' है। इस प्रकार वे एक होकर भी तीन रूपों में प्रकट होती हैं, और उन्हीं अन्नपूर्णा देवी का यह व्रत समस्त मनोरथों को सिद्ध करने वाला है।

उन्होंने विधि बताई, मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी को प्रातः स्नान कर एक कुमकुम-रंगे सूत्र में सत्रह गांठें लगाकर, चंदन-अगर से उसका पूजन कर, अन्नपूर्णा देवी का आवाहन करके उस सूत्र को धारण करना चाहिए। दूर्वा व अक्षत लेकर 'हे अन्नपूर्णे! मुझे अन्न, धन, पुत्र, यश, आयु व आरोग्य दो', इस मंत्र से देवी की पूजा करनी चाहिए, तथा पुरुष दाएं हाथ में व स्त्री बाएं हाथ में यह डोरा बांधे। इसके पश्चात सोलह दिनों तक प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर यह कथा सुननी चाहिए तथा डोरे की पूजा करनी चाहिए। सत्रहवें दिन, मार्गशीर्ष पूर्णिमा को, नए वस्त्र पहनकर धान की बालों से सजे एक कल्पवृक्ष के नीचे जपाकुसुम-वर्ण, त्रिनेत्री, मस्तक पर द्वितीया के चंद्रमा से सुशोभित, चिर-यौवना अन्नपूर्णा देवी की सुंदर मूर्ति स्थापित कर उद्यापन करना चाहिए।

अध्याय · धनंजय का ऐश्वर्य एवं व्रत का भंग

धनंजय ने उन दिव्य स्त्रियों के बताए अनुसार यह व्रत ग्रहण किया, और काशी लौटकर उसका पालन किया। मात्र एक वर्ष के भीतर उसके घर कुबेर के समान संपत्ति आ गई, राजकुमारों जैसे संपन्न सेवक व दासियां उसकी सेवा में लग गईं, तथा युवावस्था में समृद्धि पाकर उसने विवाह भी कर लिया।

ऐश्वर्य में डूबकर वह विलासी हो गया, तथा अपनी छोटी पत्नी के साथ रमण में लीन रहने लगा। एक रात्रि, जब वह अपनी छोटी पत्नी के साथ रति-विलास में मग्न था, तभी उसकी बड़ी पत्नी (सौत) ने उसकी कलाई पर बंधा वह व्रत-सूत्र देख लिया। सौत होने के संदेह से भरकर उसने दासी द्वारा उस डोरे को तुड़वाकर अग्नि में जलवा दिया। धनंजय को इसका पता तक न चला, और जब उसने अपनी कलाई पर डोरा न पाया तो बिना कुछ पूछे, बिना विधि दोहराए, स्वयं ही एक नया डोरा बांध लिया।

परंतु उसी दिन से उसकी लक्ष्मी क्षीण होने लगी, और एक ही वर्ष के भीतर उसका सारा धन नष्ट हो गया। भीख मांगने को विवश हुआ धनंजय चिंता से व्याकुल होकर सोचने लगा, हाय! मेरा वह व्रत-सूत्र किसी ने तोड़ दिया, उसी दिन से मुझ पर फिर दरिद्रता आ घेरी है, अब पहले जैसी भीख भी नहीं मिलती, किससे पूछूं कि मेरी यह लक्ष्मी कैसे नष्ट हुई?

तभी उसे स्मरण हुआ कि कामरूप देश जाकर उन्हीं दिव्य स्त्रियों से इसका कारण पूछा जाए। यह निश्चय कर वह पुनः उसी स्थान पर पहुंचा, परंतु वहां पहले देखी गई नगरी, सरोवर व देवमंदिर का कहीं नामोनिशान न था, चारों ओर घना, निर्जन वन फैला था, जहां न कोई मनुष्य था, न पक्षी तक। इधर-उधर भटककर थके हुए धनंजय ने विचार किया, मेरे हाथ का व्रत-सूत्र टूट गया, मेरा व्रत भंग हो गया, इस पाप से अब मुझे कोई लाभ कैसे प्राप्त हो सकता है? निश्चय ही मेरे ही दुर्भाग्य से विधाता ने वह सब कुछ हर लिया है। स्वर्ग से गिरा, दुःख का भाजन बना मैं अब इन प्राणों की रक्षा करके भी क्या करूंगा, यह भी तो अनेक क्लेश ही देंगे।

अध्याय · शिव-अन्नपूर्णा का दिव्य दर्शन

यों कहकर प्राण त्यागने की इच्छा से वह निकट के एक कुएं की ओर बढ़ा, और स्वयं को उसमें गिरा दिया। परंतु गिरते ही उसकी सारी पीड़ा दूर हो गई, और आगे उसे एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया। उसी प्रकाश के मार्ग पर चलकर वह एक अत्यंत मनोरम प्रदेश में जा पहुंचा, जहां चारों ओर सुंदर उद्यान, लताएं व मृग विचर रहे थे, मयूर नृत्य कर रहे थे, तथा कोयलें मधुर स्वर में गा रही थीं।

आगे बढ़ते-बढ़ते उसने सागर के समान विशाल एक सरोवर देखा, जिसमें कमल खिले हुए थे तथा हंस-चक्रवाक जैसे जलचर जीव विचर रहे थे। सरोवर के मणिजड़ित तट पर देवकन्याएं क्रीड़ा व अर्चना कर रही थीं। वहां से मधुर दिव्य संगीत सुनाई देने लगा, जिसे सुनता हुआ वह ब्राह्मण एक स्फटिक (क्रिस्टल) के महल के निकट पहुंचा।

उस मणि-मंडप में प्रवेश करते ही उसने स्फटिक के समान श्वेत-कांतिमान, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर द्वितीया के चंद्रमा से सुशोभित, जटाजूट व सर्प-आभूषण धारण किए एक दिव्य पुरुष को नृत्य करते देखा। उन्हीं के समक्ष एक रत्नजड़ित पर्यंक पर नवयौवना, दिव्य आभूषणों से अलंकृत, अत्यंत मनोहर एक देवी सुखपूर्वक विराजमान थीं, जिनकी सेवा में अनेक दिव्यरूपा सखियां तत्पर थीं।

यह अद्भुत दृश्य देखकर विस्मित सखियां पूछने लगीं, यह कौन है? भयभीत धनंजय ने भूमि पर गिरकर दंडवत प्रणाम किया, और उसकी बोलती बंद हो गई। यह देख ताम्बूल लिए एक सखी ने उसे सांत्वना देते हुए कहा: हे विप्र! सर्वऐश्वर्य की कामना से तुमने जिनका व्रत किया था, यही वे त्रिलोक-जननी भगवती अन्नपूर्णा हैं, जिनकी आराधना से दुःख व दरिद्रता शांत होती है, और जो प्रसन्न होकर समस्त संपत्तियां प्रदान करती हैं। जो साक्षात नृत्य कर रहे हैं, वे स्वयं सृष्टि-स्थिति-संहार करने वाले महादेवजी हैं, शिव पुरुष हैं, अन्नपूर्णा माया हैं, और तुम जो कुछ भी देख रहे हो, वह सब इन्हीं दोनों के अस्तित्व से है। अलौकिक देव-व्यक्तियों के आचरण को भला कौन जान सकता है, अतः इसमें विस्मय मत करो। हे ब्रह्मन! अब भक्तिभाव से पुनः उसी व्रत का आचरण करो, जिसे तुमने पहले कामरूप देश के सरोवर-तट पर उन सखियों को करते देखा था, इससे तुम्हें अटूट लक्ष्मी, कीर्ति, आयु व बहुत से पुत्र प्राप्त होंगे, इंद्र भी कभी तुम्हारे भाग्य की समानता न पा सकेगा।

अध्याय · अन्नपूर्णा का वरदान एवं व्रत का फल

यह सुनकर धनंजय ने पुनः दंडवत प्रणाम कर कहा: हे देवी! मुझ पर प्रसन्न होकर मेरी दरिद्रता व समस्त दुःख दूर कर मेरा पालन करो, हे मातः! यह अपार संसार-सागर तुम्हारे दर्शन मात्र से ही पार होता है, हे विश्वेश्वरी! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं।

तब भगवती अन्नपूर्णा ने कहा: हे विप्र! जो व्यक्ति इस लोक में मेरे इस शुभ व्रत का आचरण करेंगे, उन्हें चारों ओर से लक्ष्मी की प्राप्ति होगी। उन्हें कभी अन्न का दुःख नहीं होगा, न ही प्रियजनों से वियोग होगा, न ही कभी विपत्ति आएगी, वे कीर्तिमान, रूपवान, उदार व राजाओं से सम्मानित होंगे, तथा धार्मिक व प्रियवादी बनेंगे। मैं ऐसे व्यक्तियों का साथ कभी नहीं छोड़ूंगी, तथा जिन घरों में यह कथा सुनी-सुनाई जाएगी, वहां मैं सदैव विद्यमान रहूंगी। अब तुम पहले की भांति फिर से इस व्रत का आचरण करो, काशीपुरी में विश्वनाथ महादेव के दक्षिण भाग में मेरा मंदिर बनवाओ, वहां मैं तुम पर अनुग्रह करके सदैव निवास करूंगी।

यह सुनकर प्रसन्न महादेवजी बोले: हे द्विजराज! काशी में हमारा परमप्रिय गण, प्रसन्नवदन दंडपाणि, वहां स्थित रहकर देवी की प्रसन्नता हेतु सदैव सत्पुरुषों को अन्न प्रदान करेगा। जो मनुष्य इस लोक में इस व्रत का आचरण करेंगे, उनके कुल में कभी दरिद्रता नहीं होगी, तथा अंत में काशी में देहत्याग कर वे सभी हमारे गण बनेंगे। यह सुनकर धनंजय ने पार्वती व महादेवजी को प्रणाम किया, तथा काशी लौटकर इस व्रत का आचरण किया, और महादेवजी की आज्ञानुसार उसे सब कुछ प्राप्त हो गया।

श्रीकृष्ण ने कहा: हे राजन युधिष्ठिर! यह मैंने तुम्हें व्रतों में सर्वोत्तम व्रत बताया, जिसे करने से स्वयं श्रीरामचंद्रजी को भी अपनी खोई हुई संपत्ति प्राप्त हुई थी। यदि तुम लक्ष्मी, यश व परलोक की प्राप्ति चाहते हो, तो हे महाबाहो! अपने बंधु-बांधवों सहित अवश्य ही इस व्रत का आचरण करो, मैं भी सदा बड़ी भक्ति-श्रद्धा से इस व्रत को करता हूं। जो व्यक्ति समय व साधन प्राप्त होने पर भी इस व्रत को नहीं करते, उन पापियों का हृदय सदैव दग्ध रहता है, और उन्हें सदैव चिंता घेरे रहती है। अंत में, गिरिराज-कुमारी भगवती अन्नपूर्णा को वंदन है, जो वृषभध्वज महादेवजी को गति तथा अपने भक्तों को अभय प्रदान करने वाली हैं, और जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है।

अन्नपूर्णा माता व्रत कथा पाठ विधि

मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी को प्रातः स्नान कर कुमकुम-रंगे सूत्र में सत्रह गांठें लगाकर, अन्नपूर्णा देवी का आवाहन कर उसे धारण करें (पुरुष दाएं हाथ में, स्त्री बाएं हाथ में)। सोलह दिनों तक प्रतिदिन यह कथा सुनकर डोरे की पूजा करें, तथा सत्रहवें दिन मार्गशीर्ष पूर्णिमा को धान की बालों से सजे कल्पवृक्ष के नीचे अन्नपूर्णा देवी की मूर्ति स्थापित कर उद्यापन करें।

पाठ दिवस
मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी से मार्गशीर्ष पूर्णिमा (अन्नपूर्णा व्रत)
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अन्नपूर्णा माता व्रत कथा के बारे में

अन्नपूर्णा माता व्रत कथा निर्धन ब्राह्मण धनंजय के पूर्वजन्म के रहस्य, अन्नपूर्णा व्रत की खोज, तथा व्रत भंग होने के पश्चात शिव-अन्नपूर्णा के साक्षात दर्शन व वरदान की कथा है। इस पृष्ठ पर सात अध्याय हैं, पहले में युधिष्ठिर का प्रश्न व राम-लक्ष्मण की कथा, दूसरे में अगस्त्य मुनि द्वारा देवदत्त-धनंजय की कथा, तीसरे में पूर्वजन्म का रहस्य, चौथे में व्रत की खोज व दिव्य स्त्रियों से भेंट, पांचवें में धनंजय के ऐश्वर्य व व्रत-भंग की कथा, छठे में शिव-अन्नपूर्णा के दिव्य दर्शन की कथा, तथा सातवें में अन्नपूर्णा के वरदान व व्रत के फल की कथा है।

यह व्रत मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पंचमी से आरंभ होकर मार्गशीर्ष पूर्णिमा को संपन्न होता है। इस पृष्ठ पर सभी अध्यायों का पूर्ण पाठ शुद्ध हिंदी में, अक्षर-आकार समायोजन और प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।

अन्नपूर्णा माता व्रत कथा स्वयं अपने अंत में स्वयं को श्रीभविष्योत्तर पुराण के श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर संवाद की कथा बताती है। यहां प्रस्तुत पाठ यू.पी. स्टेट म्यूज़ियम, लखनऊ के दुर्लभ ग्रंथ संग्रह में सुरक्षित एक प्रकाशित हिंदी भाषानुवाद (मुरादाबाद निवासी भट्टाचार्य द्वारा अनूदित) पर आधारित है, जिसका यथावत रूपांतरण यहां दिया गया है, मूल संस्कृत श्लोकों को न लेकर केवल साथ दिए गए हिंदी अर्थ को ही आधार बनाया गया है, तथा स्रोत की गंभीर मुद्रण-त्रुटियों को कथा-प्रवाह के अनुसार यथासंभव सुधारा गया है, कथा की घटनाओं व क्रम में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।

रचनाकार
अज्ञात
पौराणिक कथा (श्रीभविष्योत्तर पुराण, श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर संवाद)

सामान्य प्रश्न

अन्नपूर्णा माता व्रत कथा में कुल कितने अध्याय हैं?

इसमें कुल सात अध्याय हैं, जो एक साथ पूर्ण पाठ के रूप में पढ़े या सुने जाते हैं।

धनंजय ब्राह्मण को दरिद्रता क्यों प्राप्त हुई थी?

पूर्वजन्म में धनंजय हेरंब नामक एक शूद्र था, जिसने मुनियों द्वारा भिक्षा में लाए गए पवित्र अन्न को भूमि पर बिखेरकर उसका अनादर किया था, इसी दोष से उसे अगले जन्म में अन्नहीन दरिद्रता प्राप्त हुई।

अन्नपूर्णा व्रत का सूत्र टूटने पर क्या हुआ?

धनंजय की सौत ने ईर्ष्यावश उसका व्रत-सूत्र तुड़वाकर जला दिया, और धनंजय ने बिना विधि दोहराए ही नया डोरा बांध लिया, जिससे उसी दिन से उसकी संपत्ति क्षीण होने लगी और एक वर्ष में वह पुनः निर्धन हो गया।

अन्नपूर्णा व्रत की कथा में शिव व अन्नपूर्णा का क्या संबंध बताया गया है?

कथा के अनुसार शिव पुरुष हैं और अन्नपूर्णा उनकी शक्ति (माया) हैं, सृष्टि की रचना व पालन करते समय वे 'अन्नपूर्णा' तथा संहार के समय 'कालरात्रि' कहलाती हैं, इस प्रकार वे एक होकर भी तीन रूपों में प्रकट होती हैं।

संबंधित खोज

पाठ विवरण

रचनाकारअज्ञात
संरचना७ अध्याय
पाठ समय१० मिनट