
वैद्यनाथ मंदिर, देवघर का महत्व
मान्यता है कि लंकापति रावण ने कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया तथा अपनी आत्मलिंग को लंका ले जाने की अनुमति मांगी, इस शर्त पर कि यात्रा में कहीं भी उसे भूमि पर नहीं रखा जाए। मार्ग में देवताओं ने रावण की शक्ति से भयभीत होकर उसे छल से रोकने की योजना बनाई, एक प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु ग्वाले के रूप में प्रकट हुए तथा रावण को शिवलिंग थमाने हेतु प्रेरित किया, जिसे उसने भूमि पर रख दिया। इस प्रकार शिवलिंग देवघर में ही स्थिर हो गया।
'वैद्यनाथ' का अर्थ है 'वैद्यों (चिकित्सकों) के स्वामी', यहां भगवान शिव को एक दिव्य चिकित्सक के रूप में पूजा जाता है, जो रोग व कष्ट का निवारण करते हैं। यह मंदिर इक्यावन शक्तिपीठों में से भी एक है, जहां मान्यता के अनुसार माता सती का हृदय गिरा था, इस कारण इस मंदिर को 'हृदयपीठ' भी कहा जाता है, जो इसे बारह ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र ऐसा स्थान बनाता है जो शक्तिपीठ भी है।
वैद्यनाथ मंदिर, देवघर दर्शन की जानकारी
वैद्यनाथ मंदिर विश्व के सबसे बड़े पैदल तीर्थ-यात्राओं में से एक, कांवड़ यात्रा, का केंद्र है। श्रावण मास में लाखों 'कांवड़िए' सुल्तानगंज (लगभग 105-109 किमी दूर) से गंगाजल भरकर पैदल यहां लाते हैं तथा शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। इसी अवधि में आयोजित श्रावणी मेला झारखंड के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है।
मंदिर परिसर में शिवलिंग के साथ माता पार्वती को समर्पित मंदिर भी स्थित है, तथा दोनों के मध्य एक पवित्र धागा बंधा रहता है, जो शिव-शक्ति के एकत्व का प्रतीक माना जाता है। श्रावण मास के अतिरिक्त शेष वर्ष मंदिर अपेक्षाकृत शांत रहता है, जब सुगमता से दर्शन किए जा सकते हैं।
वैद्यनाथ मंदिर, देवघर कैसे पहुंचें
वैद्यनाथ मंदिर, देवघर के बारे में
वैद्यनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक पावन धाम है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों तथा इक्यावन शक्तिपीठों, दोनों में गिना जाता है। इस पृष्ठ पर मंदिर का पौराणिक महत्व, रावण से जुड़ी कथा, श्रावणी मेला व कांवड़ यात्रा, तथा यात्रा व दर्शन से जुड़ी सामान्य जानकारी दी गई है।
इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
वैद्यनाथ मंदिर कहां स्थित है?
यह झारखंड के देवघर में स्थित है।
वैद्यनाथ को शक्तिपीठ व ज्योतिर्लिंग दोनों क्यों माना जाता है?
यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, तथा शाक्त परंपरा के अनुसार यहां माता सती का हृदय भी गिरा था, जिस कारण यह इक्यावन शक्तिपीठों में से एक भी माना जाता है, यही एकमात्र ज्योतिर्लिंग है जो शक्तिपीठ भी है।
श्रावणी मेला व कांवड़ यात्रा क्या है?
श्रावण मास में लाखों कांवड़िए सुल्तानगंज से लगभग 105-109 किमी पैदल चलकर गंगाजल यहां लाते हैं तथा शिवलिंग पर अर्पित करते हैं, यह विश्व की सबसे बड़ी पैदल तीर्थ-यात्राओं में से एक मानी जाती है।
रावण की कथा वैद्यनाथ से कैसे जुड़ी है?
मान्यता है कि रावण शिवजी से प्राप्त आत्मलिंग को लंका ले जा रहा था, किंतु देवताओं की चतुराई से वह देवघर में भूमि पर रखा गया तथा वहीं स्थिर हो गया, इसी शिवलिंग को वैद्यनाथ के रूप में पूजा जाता है।
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यात्रा हेतु उचित समय
अक्टूबर से मार्च सर्वोत्तम रहता है। श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) में यहां श्रावणी मेला व कांवड़ यात्रा के दौरान अत्यधिक भीड़ रहती है, दर्शन का अनुभव चाहने वालों के लिए विशेष, किंतु शांत यात्रा चाहने वालों को इस समय से बचना उचित रहता है।