घृष्णेश्वर मंदिर का महत्व
मान्यता है कि कुसुमा नामक एक परम शिव-भक्त महिला प्रतिदिन मिट्टी का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करती तथा एक तालाब में विसर्जित करती थी। उसके पति की सौतन, जो कुसुमा की भक्ति व पुत्र-सुख से ईर्ष्या करती थी, ने एक दिन कुसुमा के पुत्र की हत्या कर उसे उसी तालाब में फेंक दिया। इस भीषण दुःख के बावजूद कुसुमा ने अपनी शिव-भक्ति नहीं छोड़ी तथा अगले दिन भी विसर्जन हेतु तालाब पहुंची। उसकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए, उन्होंने उसके पुत्र को पुनर्जीवित किया, तथा कुसुमा के अनुरोध पर सदैव के लिए वहीं ज्योतिर्लिंग रूप में निवास करने लगे।
इसी कथा के कारण इस ज्योतिर्लिंग को घृष्णेश्वर अथवा घुश्मेश्वर (कुसुमा के एक अन्य नाम घुश्मा से व्युत्पन्न) कहा जाता है। यह बारह ज्योतिर्लिंगों की परंपरागत सूची में बारहवां व अंतिम माना जाता है, तथा आकार में सबसे छोटा होते हुए भी अपने पौराणिक महत्व में किसी से कम नहीं है।
घृष्णेश्वर मंदिर दर्शन की जानकारी
घृष्णेश्वर मंदिर एलोरा गुफाओं से मात्र 1-2 किमी की दूरी पर स्थित है, जो स्वयं एक विश्व धरोहर स्थल (यूनेस्को) है, अतः अधिकांश श्रद्धालु व यात्री दोनों स्थलों का भ्रमण एक ही यात्रा में कर लेते हैं। मंदिर का वर्तमान स्वरूप लाल बेसाल्ट पत्थर से निर्मित है, तथा इसकी स्थापत्य शैली अन्य कई ज्योतिर्लिंग मंदिरों की भांति ही सुंदर नक्काशी से युक्त है।
मंदिर के आकार में छोटा होने के कारण यहां दर्शन में सामान्यतः अधिक समय नहीं लगता, तथा वर्षभर श्रद्धालु सुगमता से आ सकते हैं। छत्रपति संभाजीनगर व एलोरा-अजंता गुफाओं के भ्रमण की योजना बनाते समय इसे अवश्य सम्मिलित करना चाहिए।
घृष्णेश्वर मंदिर कैसे पहुंचें
घृष्णेश्वर मंदिर के बारे में
घृष्णेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक पावन धाम है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में बारहवां व अंतिम माना जाता है। इस पृष्ठ पर मंदिर का पौराणिक महत्व, कुसुमा भक्तिन से जुड़ी कथा, तथा यात्रा व दर्शन से जुड़ी सामान्य जानकारी दी गई है।
इस पृष्ठ की जानकारी बड़े अक्षरों व प्रिंट सुविधा सहित उपलब्ध है।
सामान्य प्रश्न
घृष्णेश्वर मंदिर कहां स्थित है?
यह महाराष्ट्र के वेरुल गांव में, एलोरा गुफाओं से मात्र लगभग 1-2 किमी दूर स्थित है।
घृष्णेश्वर बारह ज्योतिर्लिंगों में कौन-सा स्थान रखता है?
यह परंपरागत सूची में बारहवां व अंतिम ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
घृष्णेश्वर नाम कैसे पड़ा?
यह नाम कुसुमा भक्तिन के एक अन्य नाम घुश्मा से व्युत्पन्न है, उसकी अटूट भक्ति व पुत्र के पुनर्जीवन की कथा से जुड़ा यह ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर अथवा घुश्मेश्वर कहलाता है।
क्या घृष्णेश्वर मंदिर व एलोरा गुफाएं एक साथ देखी जा सकती हैं?
हां, मंदिर एलोरा गुफाओं से मात्र 1-2 किमी दूर है, अतः अधिकांश श्रद्धालु व यात्री दोनों स्थलों का भ्रमण एक ही यात्रा में कर लेते हैं।
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यात्रा हेतु उचित समय
अक्टूबर से मार्च सर्वोत्तम रहता है, जब महाराष्ट्र की भीषण गर्मी से राहत मिलती है। एलोरा गुफाओं के भ्रमण के साथ इसी यात्रा में मंदिर के दर्शन भी किए जा सकते हैं।